मुनेश त्यागी
हम पिछले काफी समय से भारत में नफरती भाषणों में आई बाढ़ देख रहे हैं। कोई साधु सन्यासी हो, साम्प्रदायिक ताकतों का कोई पदाधिकारी हो, कोई सांसद हो, हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ रहे हैं, गंगा जमुनी तहजीब को मिट्टी में मिला रहे हैं और यह नफरती अभियान जानबूझकर, एक साजिश के तहत चलाया जा रहा है।
इससे समाज में हिंदू मुसलमान का बंटवारा होता है, हिंदुओं में मुसलमानों के खिलाफ नफरत का जहर फैलाया जाता है और फिर यह जहर वोट के रूप में निकलता है, जिससे नफरती भाषाओं का प्रयोग करने वाले सामाजिक राजनीतिक संगठनों को संसद, विधायक और दुसरे पदाधिकारी बनने में मदद मिलती है और इसी साजिश के तहत यह क्रम पिछले काफी समय से जारी है।
भारत की बहुत सारी संस्थाएं पिछले काफी समय से नफरती भाषणों के खिलाफ आवाज उठाती आ रही हैं, इनके खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं, इनका विरोध कर रही हैं और कुछ लोगों ने तो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में इनके खिलाफ मुकदमे भी दायर कर दिए हैं और बहुत सारे लेखक, कवि बुद्धिजीवी अपने लेखों में, अपनी कविताओं में, अपने भाषणों में, अपनी कहानियों में और अपने नाटकों में इनके खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं और इनके खिलाफ जनता को जागृत करते रहे हैं।
जनता में इस मुहिम का फायदा होता हुआ दिख रहा है। इन नफरती भाषणों का विरोध करने वाले लोग शुरू से ही मांग करते चले आ रहे हैं कि इन नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्यवाही की जाए, इन्हें जेल में भेजा जाए और इनके खिलाफ दूसरी उचित कार्रवाई की जाएं। लगता है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ, आवाज उठाने वालों की, आवाज सुन ली है।
अब सुप्रीम कोर्ट ने शासन प्रशासन और पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों से कहा है कि नफरती भाषण देने वालों को गिरफ्तार करो और अगर इनके खिलाफ कोई शिकायत भी नहीं की गई है तो भी पुलिस प्रशासन को इनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए और इन्हें गिरफ्तार करके जेल में भेज देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शासन-प्रशासन को नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ, स्वत संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए। इनके खिलाफ किसी के द्वारा की जाने वाली शिकायत का इंतजार नहीं करना चाहिए।
अब प्रशासन, अगर कोई आदमी नफरती बोल बोल रहा है तो अपने आप ही उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है, उसे गिरफ्तार करके जेल भेज सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा है कि अगर शासन प्रशासन या पुलिस अधिकारी इन नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ समय से, समुचित कार्रवाई नहीं करते हैं तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा और उनके खिलाफ पुलिसकर्मियों के खिलाफ और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय अवमानना कार्रवाई करेगा। इंडियन पेनल कोड के हिसाब से नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ धारा 153 ए, 153 बी, 295ए, 511 और 505 धाराओं में समुचित कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इन आवश्यक आदेशों के साथ-साथ, हम यह भी मांग करेंगे कि नफरती बोल बोल कर समाज में अशांति और नफरत फैलाना, कानून को तोड़ना कानून के शासन का उल्लंघन करना और भारतीय संविधान की आवश्यक प्रस्तावनाओं का निषेध करना, एक संगीन जुर्म है, सामाजिक और राजनीतिक अपराध है, अतः हम यहां मांग करेंगे कि नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए, इन लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी जाए, इन को मिलने वाली तमाम सरकारी सुविधाएं, पैंशन आदि बंद कर देनी चाहिएं और इन्हें कोई भी सरकारी नौकरी नहीं दी जानी चाहिए।
इसी के साथ, हम यही कहेंगे कि समाज को जागरूक होकर ऐसे लोगों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार का प्रयोग करना चाहिए और समाज को यह संदेश देना चाहिए कि जो भी आदमी, समाज में हिंदू मुसलमान के नाम पर नफरत और हिंसा फैलायेगा, भारतीय संविधान की अवमानना करेगा, कानून के शासन को तोड़ेगा, उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा, उसको किसी भी सामाजिक गतिविधि में नहीं बुलाया जाएगा और ना ही उसके यहां लोग जाएंगे।
अगर समाज ऐसा करेगा, सरकार और अदालतें इनके खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर समुचित कानूनी कार्रवाई करती हैं और इनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाती है और उन्हें और इन्हें तमाम सरकारी सुविधाओं, पैंशन आदि से वंचित कर दिया जाता है तो हमारा मानना है कि इन नफरती बोल बोलने वालों पर रोक लगाई जा सकती है और इस प्रकार कानून के शासन का और भारत के संविधान के जरुरी प्रावधानों की रक्षा की जा सकेगी और भारत में ऐसा समाज कायम किया जा सकेगा कि जहां पर हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध पारसी और सब जातियों के लोग मिलजुलकर आपसी भाईचारे से रहेंगे, एक दूसरे के दुख दर्द में काम आएंगे और संविधान के मूल्यों को आगे बढ़ाया जा सकता है और 21वीं सदी के नए भारत का और सांप्रदायिक सद्भावना पर आधारित नए भारत का और नए समाज का निर्माण किया जा सकेगा।





