पुष्पा गुप्ता
_भारतीय राजनीति में अकल से बड़ी भैंस हो चुकी है। आपकी मर्ज़ी, भैंस को जिस तरफ़ हाँक दीजिए। जनता मान लेगी, कि नेताजी ने जो कहा, सही कहा होगा। यदि आप किसी पार्टी-वार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं, किसी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तो कृपया इस आलेख को मत पढ़ियेगा. क्योंकि, मैंने कुछ कड़वी बातें लिख दी है._
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देवंतारा को जानते हैं आप? क्योंकि भारत की लीडरशिप को केवल इंडोनेशिया के करेंसी नोट में गणेश जी की छपी आकृति में दिलचस्पी थी, इसलिए किसी को इसकी फुर्सत नहीं थी कि उसी नोट पर बड़े आकार में नमूदार राष्ट्रीय नेता देवंतारा के बारे में जानकारी ले। पिछले बहत्तर घंटे से लक्ष्मी-गणेश जी का जाप दिल्ली व देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर टीवी चैनलों पर अनहद चल रहा था। देश में दूसरी बार गणेशजी चर्चा के केंद्र में लंबे समय तक विराजमान रहे। सितंबर 1995 में पत्थर के गणेशजी जब दुग्धपान कर रहे थे, तब भी ऐसी ही हाहाकारी चर्चा हुई थी।
अब चूंकि सोशल मीडिया है, तो चर्चा ने दानवाकार रूप घारण कर लिया है। आम आदमी पार्टी के समर्थक-शैदाई इसे उपलब्धि मान रहे हैं कि हमारे नेता ने ऐसा प्रक्षेपास्त्र दाग दिया, जिसकी चर्चा देश-विदेश में होने लगी है।
इंडोनेशिया में 1998 में छपे 20 हज़ार के करेंसी नोट पर गणेशजी के बाजू में जिस चेहरे को चंद लोगों ने देखा, वो पत्रकार की हजार देवंतारा (जन्म 1889, मृत्यु 1959) हैं। इंडोनेशियाई द्वीपसमूह को डच अधिकार से मुक्ति के लिए देवंतारा ने सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन छेड़ा था। पचास के दशक आते-आते देवंतारा नेशनल हीरो हो चुके थे। मुद्रित मीडिया में उनके लेख उपनिवेश विरोधी भावनाओं से ओत-प्रोत होते थे, जिसका लोग इंतज़ार किया करते थे। देवंतारा का बोएदी ओएटोमो (डच इंडीज की पहली देशी राजनीतिक संस्था और जिसने इंडोनेशियाई राष्ट्र जागृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी) के साथ घनिष्ठ संबंध थे।
13 जुलाई 1913 को देवंतारा ने ‘डी एक्सप्रेस‘ अखबार में ‘इफ आई वेयर ए डचमैन‘ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख में डच उपनिवेशवादियों द्वारा लगातार हो रहे शोषण की उन्होंने मज़म्मत की थी। डच अधिकारी इसे पचा नहीं पाये, और की हजार देवंतारा को पकड़ कर नीदरलैंड ले गये। नीदरलैंड में अपने निर्वासन के दौरान देवंतारा ने यूरोपीय शिक्षक प्रमाणपत्र प्राप्त किया।
वह मोंटेसरी और फ्रोबेल जैसे शिक्षा के अग्रदूतों के विचारों से परिचित हुए। कुछ साल बाद देवंतारा जब इंडोनेशियाई द्वीपसमूह वापस आए, तो सबसे पहले उन्होंने अपने भाई के साथ योग्यकार्ता में एक स्कूल की स्थापना की। योग्यकार्ता, जावा द्वीप का नगर है, जिसके पास विश्वविख्यात नगर बोरोबुदुर है। योग्यकार्ता को कला और शिक्षा का केंद्र माना जाता है, और हर साल दूसरी मई को इंडोनेशिया में शिक्षा दिवस मनाते हैं।
गणेशजी वाला करेंसी नोट भी दो मई 1998 को जारी किया गया था, उस नोट के पीछे योग्यकार्ता स्कूल के उस क्लासरूम की तस्वीर मुद्रित है, जहां पत्रकार व कॉलमनिस्ट की हजार देवंतारा ने बच्चों को पढ़ाया था।
मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में गणेश ज्ञान और बु़ि़द्ध के प्रतीक माने जाते हैं। इस सोच को चोल राजाओं के समय विकसित की गई थी, जिसके प्रणेता राजेन्द्र-प्रथम थे। राजेन्द्र प्रथम (1012 से 1044 ईस्वी) चोल राजवंश का सबसे महान शासक था। सातवीं से 13वीं सदी तक सुमात्रा और मलक्का जलडमरूमध्य तक राज करनेवाले चोल वंशी श्रीविजया साम्राज्य के राजाओं ने गणेश में आस्था को मज़बूत किया था।
इस इलाक़े में इस्लाम के आगमन के बाद भी इस आस्था से छेड़छाड़ नहीं की गई। काश, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस ऐतिहासिक अवधारणा को बताते। आधुनिक इंडोनेशिया के आर्थिक रणनीतिकारों की मंशा यदि देवी-देवताओं की तस्वीर के माध्यम से धन समृ़िद्ध की होती, तो करेंसी नोट पर लक्ष्मी की आकृति अवश्य छापते।
जनता मान लेगी, कि नेताजी ने जो कहा, सही कहा होगा। जिस करेंसी नोट को लेकर यहां गुब्बारे फुलाये गये हैं, वो इंडोनेशिया से कब के ग़ायब हो चुके। गणेशजी वाला नोट बरसों से चलन में नहीं है। जब वो नोट चलन में आया उससे एक साल पहले से 2 जुलाई 1997 को आसियान फाइनेंशियल क्राइसिस की शुरूआत हो चुकी थी। भयावह मुद्रा संकट, बेरोज़गारी से जूझते इंडोनेशिया में चार से 15 मई 1998 तक लगातार दंगे हुए थे, और सुहार्ताे को इस्तीफा देना पड़ा था।
21 मई 1998 को बीजे हबीबी ने इंडोनेशिया में राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। बावज़ूद सत्ता परिवर्तन के, 1999 में पूर्वी तिमोर संकट आ गया। हिंसा जारी थी, और अलगाववादी रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। अगस्त 1999 में यूएन के हस्तक्षेप से मतसंग्रह कराने की कवायद होने लगी। यह सब बताने का मकसद यह है कि जो लोग यह समझते हैं कि गणेश-लक्ष्मी की तस्वीर छापने से आर्थिक स्थिरता और समृद्धि आ जाएगी, उन्हें धर्मभीरू जनता को केजरीवाल जैसा काइयाँ नेता और कठदिमाग़ बना रहा है। मुझे तो हैरानी है कि इस सोच के व्यक्ति ने आईआईटी और आईआरएस कैसे क्लियर किया होगा?
आपको बीजेपी से बड़ी लकीर खींचनी है, तो कुछ भी उल-जुलूल बोल दो। इतनी ही हिंदू देवी-देवताओं को लेकर जोश है, तो दिल्ली में मुख्यमंत्री आवास से लेकर, विधानसभा भवन का नाम लक्ष्मी-गणेश भवन रख दीजिए। दिल्ली सरकार के हर लेटरहेड पर ‘श्रीलक्ष्मीजी-गणेशजी सदा सहाय‘ मुद्रित करवा दीजिए।
जब-जब चुनाव आता है, तो लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ इमोशनल अत्याचार शुरू हो जाता है। यही केजरीवाल कभी रामलीला मैदान के मंच पर गाते दिखे थे, ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा। ‘ ऐसे कई अवसर आये जब केजरीवाल इस गीत को गाकर अपनी इंसानपरस्त, सर्वधर्म समभाव वाली छवि बनाते गये।
क्या वह सब लोगों को बेवकूफ बनाने के वास्ते था? केजरीवाल के इस छदमावतार से उनके पुराने साथी भी हैरान हैं। उनमें से एक आशुतोष ने रिएक्ट किया कि मैं इस वाले केजरीवाल को तो जानता भी नहीं था। वोट की राजनीति कैसे एक नेता को रूपांतरित करती है, उसके अकेले उदाहरण अरविंद केजरीवाल नहीं हैं।
केजरीवाल स्वयं को बड़ा हिंदू साबित करने में तुले हुए हैं। गोकि गुजरात हिंदुत्व अजेंडे की प्रयोगशाला रही है, इसलिए हिंदूवाद वहां राहुल गांधी जैसे नेताओं में भी हिलोरे मारने लगता है। केजरीवाल तो इस मायने में उनसे कई क़दम आगे हैं। केजरीवाल ने गुजरात दौरे के दौरान खुद को कभी हनुमान का कट्टर भक्त बताया, कभी कहा कि मेरा जन्म जन्माष्टमी के दिन हुआ है।
भगवान ने मुझे कंस की औलादों व असुरी शक्तियों के दमन के लिये भेजा है। सीएम केजरीवाल कभी विशेष वेशभूषा मे सोमनाथ मंदिर तथा द्वारकाधीश मंदिर में जाते हैं, कभी गाय को अजेंडे पर लाते हैं। दुर्भाग्य देखिए, बेसहारा गायों की जो दुर्गति दिल्ली में है, वो कभी केजरीवाल के संज्ञान में नहीं आया। केजरीवाल का जो हिंदू कार्ड गुजरात में नजर आता है, वैसा दिल्ली व पंजाब के चुनावों में नजर क्यों नहीं आया था?
अब केजरीवाल के अजेंडे में अयोध्या, मथुरा-काशी, ताजमहल, कुतुबमीनार सब आ जाएगा।
एक समय था जब केजरीवाल अयोध्या में विवादित स्थल पर अस्पताल बनाने की वकालत करते थे। वो बोलते थे, ‘मैं आईआईटी खड़गपुर की देन हूं। यदि तब मंदिर ही बने होते, तो मैं इंजीनियर नहीं बन पाता।‘ लेकिन अब केजरीवाल हिन्दुत्व की ताल ठोक रहे हैं। कांग्रेस को जब लगने लगा कि यह गुजरात-हिमाचल में हमारा वोट कुतरने वाला है, तो आम आदमी पार्टी को संघ व बीजेपी का बी टीम बताने लगी। सही है।
केजरीवाल एंड कंपनी को कीजिए एक्सपोज, मगर राहुल गांघी जब टीका-चंदन के साथ देवालयों में प्रस्तुत होते है, धर्मगुरूओं के साथ फोटोफ्रेम में दिखते हैं, उसकी वजह भी बताते जाइये। कांग्रेस समर्थक कुतर्क कर सकते हैं कि ज़हर ही ज़हर को काटता है। मगर भाई, इस प्रक्रिया में पूरा समाज और राजनीतिक वातावरण कितना ज़हरीला हो चुका है, सोचा है कभी?
अब तो उस दल-जमात को देखने को आँखें तरस गई, जो कहे कि हमारा अजेंडा न तो धर्म है, न रहेगा। आप कहेंगे, ‘वामपंथी और समाजवादी हैं न इस वास्ते।‘ 3 जनवरी 2022 को सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा था कि अगर हमारी सरकार होती तो एक साल में राम मंदिर तैयार खड़ा होता। अखिलेश यादव को सपने में भी भगवान श्रीकृष्ण आने लगे थे। वही हालत लालू प्रसाद और उनके सुपुत्र की चुनावी मंच पर हो जाती है। ममता बनर्जी भी चुनाव में चंडी पाठ करने लगती हैं।
तमिलनाडु में सीपीएम के स्टेट जनरल सेक्रेट्री के. बालाकृष्णन ने 4 अप्रैल 2022 को बयान दिया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व बीजेपी के नेताओं को काउंटर करने के वास्ते हमारे कामरेड मंदिर महोत्सव में हिस्सा लेंगे। दरअसल, यह देश देखते-देखते, चलते-फिरते पागलखाने में परिवर्तित हो चुका है।
आठ वर्षों के इस कालखंड का सही से आकलन कीजिए, तो लगेगा कि सत्ताधारी नेताओं से अधिक प्रतिपक्ष, धर्म के अफीम में गोते लगा रहा है। केवल इसलिए कि जो जनता उन्हें नकार चुकी है, वो इन्हें भी बीजेपी की तरह आस्थावान मानकर दोबारा से स्वीकार कर ले। इस रात की सुबह होती नहीं दिख रही है। अब किसी के बयान पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।
एक तीर छोड़ता है, उसके बरक्स दूसरा नेता शब्दभेदी वाण लेकर तैयार खड़ा है। ये लोग बयानों से विकिरण फ़ैलाते हैं, और बोलते हैं कि हम राष्ट्र निर्माण कर रहे हैं।
करेंसी पर लक्ष्मी-गणेश की तस्वीर से समृद्धि आ जाती, सेंसेक्स में उछाल आ जाता, तो डॉलर, पौड, यूरो, यूआन पर देवताओं का मुद्रण आरंभ करने में वो देर नहीं लगाते। ऐसी मूर्खतापूर्ण बयानों से दावोस में विश्व आर्थिक फोरम के रणनीतिकारों का आप मनोरंजन कर सकते हो, उन्हें दिशा देना दूर की बात है। एशियन डेवलपमेंट बैंक ने 21 सितंबर 2022 को इंडोनेशिया की आर्थिक स्थिति पर रिपोर्ट जारी की थी। काश, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एडीबी की उस रिपोर्ट को एकबार देख लेते।
महंगाई और बेरोज़गारी से बेबस इंडोनेशिया आर्थिक भूचाल के कगार पर है, 2023 में भी संभल जाए तो बड़ी बात है!





