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आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को दस फीसदी आरक्षण का फैसला वैध है या अवैध फैसला सात नवंबर को

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आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को दस फीसदी आरक्षण का फैसला वैध है या अवैध, इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ आगामी 7 नवंबर, 2022 को फैसला सुना सकती है। इसकी वजह यह कि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू. यू. ललित का कार्यकाल आगामी 8 नवंबर को समाप्त हो रहा है। संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस दिनेश महेश्वरी, जस्टिस एस. रवींद्र भट, जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस जे. बी. पारदीवाला शामिल हैं। जनहित अभियान व 32 अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर पीठ ने करीब एक सप्ताह तक लगातार सुनवाई की। 

जनवरी, 2019 में भारत सरकार ने संसद में 103वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था, जिसे दोनों सदनों ने पारित कर दिया था। इस संशोधन के तहत संविधान के 15वें अनुच्छेद में एक नया उपखंड (6) जोड़ा गया, जिसके कारण आर्थिक आधार पर कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार सरकार को प्राप्त हुआ। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए भारत सरकार ने आर्थिक आधार पर कमजोर वर्गों के लिए सरकारी सेवाओं और उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में दस फीसदी आरक्षण लागू कर दिया।

भारत सरकार के इस पहल को सुप्रीम कोर्ट में पहले भी चुनौती दी गयी थी। 5 अगस्त 2020 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.ए. बोबड़े, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी अैर जस्टिस बी.आर. गवई की पीठ ने इस मामले को संविधान पीठ को हस्तांतरित करने का न्यायादेश दिया था।

मेडिकल प्रवेश में ओबीसी के 2163 सीटों पर हकमारी

नीट के जरिए मेडिकल संस्थानों में दाखिले के संदर्भ में एक बार फिर पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित 2163 सीटों पर हकमारी की गई। इस संबंध में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के सांसद पी. विल्सन ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया अग्रवाल को पत्र लिखा है। अपने पत्र में विल्सन ने कहा है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की काउंसेलिंग प्रक्रिया को सही तरीके से नहीं अपनाया गया। इसके कारण केवल 6 सीटों पर ओबीसी अभ्यर्थियों का चयन हो सका और 2163 सीटें सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को आवंटित कर दिया गया। अपने पत्र में विल्सन ने कहा है कि पहले भी ओबीसी को उसका वाजिब हक नहीं मिलता रहा है। उन्होंने सरकार से इस बारे में गंभीरता से जांच कराने की मांग की है।

पी. विल्सन, सांसद, डीएमके

विल्सन ने उठाया पदोन्नति में ओबीसी के लिए आरक्षण का सवाल  

संविधान के अनुच्छेद 16 के उपखंड (4 अ) और (4 ब) के जरिए जिस तरह से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के लोगों को पदोन्नति में आरक्षण दिया जाता है, उसी तरह पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) भी इसका हकदार है। डीएमके के सांसद पी. विल्सन ने केंद्रीय विधि मंत्री किरेन रिजिजू को भेजे अपने पत्र में कहा है कि आज भी ग्रुप ए और ग्रुप बी के पदों पर ओबीसी की हिस्सेदारी बहुत कम है। अलग-अलग मंत्रालयों व सरकारी संस्थाओं में यह हिस्सेदारी 5 से 12 फीसदी ही है। ऐसे में ओबीसी की हिस्सेदारी बढ़े, इसके लिए सरकार संविधान संशोधन विधेयक लाए।  

स्मृति दिवस के मौके पर याद किये गये रामनरेश राम

1960 के दशक के मध्य में जगदीश मास्टर, रामेश्वर अहीर और रामनरेश राम की तिकड़ी ने मध्य बिहार में वामपंथी आंदोलन का आगाज किया था। इनमें जगदीश मास्टर और रामेश्वर अहीर को अपनी शहादत क्रमश: 1972 व 1974 में देनी पड़ी। उनके बाद रामनरेश राम ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। बीते 26 अक्टूबर, 2022 को रामनरेश राम की 12वीं स्मृति दिवस पर पटना स्थित भाकपा माले के राज्य कार्यालय में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में माले के राज्य सचिव कुणाल, किसान महासभा के महासचिव राजाराम सिंह, केडी यादव, विधायक गोपाल रविदास, विधायक संदीप सौरभ सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे। 

रामनरेश राम स्मृति दिवस के मौके पर श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल

अपने संबोधन में कुणाल ने कहा कि रामनरेश राम भोजपुर में गरीब-भूमिहीन किसानों व समाज के कमजोर वर्गों के क्रांतिकारी उभार के मुख्य शिल्पीकार थे। भोजपुर में रणवीर सेना के नेतृत्व में सांप्रदायिक-सामंती ताकतों के गठजोड़ के खिलाफ जनता के सफल प्रतिरोध आंदोलन से लेकर ग्रामीण व खेत मजदूरों को राष्ट्रीय स्तर पर एक क्रांतिकारी ताकत के रूप में संगठित करने तक, उन्होंने एक के बाद एक चुनौतीपूर्ण दौर में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन का नेतृत्व किया। कुणाल ने आगे कहा कि रामनरेश राम ने अपनी जिंदगी के अंतिम 15 वर्षों में लगातार सहार विधानसभा से जनता को प्रतिनिधित्व किया और भाकपा-माले विधायक दल के नेता बने। 

Ramswaroop Mantri

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