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असम्भव है सत्य को झुठलाना?

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शशिकांत गुप्ते

आज क्या लिखा जाए? यह प्रश्न जैसे ही जेहन में उपस्थित हुआ,मैने अपने सामान्यज्ञान का उपयोग किया। मेरे मानस में सामन्यज्ञान जागृत होते ही, समझमें आ गया ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है।
अपने देश में असंख्य चिंतक, विचारक,साहित्यकार हुए है,और मौजूद भी हैं।
विचार का प्रवाह अनवरत रहता है।
मौजूदा विचारहीनता के मौहल में,जहाँ झूठ का बोलबाला है।
ऐसे समय प्रख्यात क्रांतिकारी कवि बाबा नागर्जुन का स्मरण होता है। बाबा नागर्जुन की यह कविता प्रासंगिक है।
“सत्य को लकवा मार गया है”
वर्तमान राजनैतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक,साहित्यिक और धार्मिक हर एक क्षेत्र पर व्यंग्य का प्रहार करती नागार्जुनजी की यह कविता है।

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक
लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है
जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
(आज के संदर्भ में अघोषित इमरजेंसी?)
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह
यह कविता प्रषित करने के बाद,यह भी लिखना अनिवार्य है।
सत्य परेशान हो सकता है,पराजित नहीं
यह बात भी सत्य है कि, बाबा नागार्जुन के समय ईडी, सीबीई,आयकर और अन्य जांच एजेंसियां नहीं थी?
एक विशेष टिप्पणी।
संत कबीरसाहब का यह दोहा,लेख का निष्कर्ष है।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
समझने वाले समझ गएं हैं,जो ना समझे वो…….?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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