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केन्द्र का सख्त रुख, 20 जिलों में लगाई कटाई पर रोक…प्रदेश के 28 जिलों में ग्रीनरी हुई कम…

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फॉरेस्ट सर्वे आॅफ इंडिया की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि मप्र में भोपाल सहित लगभग 28 जिले ऐसे हैं, जिनमें ग्रीनरी बेहद कम हो चुकी है। दरअसल इसकी बड़ी वजह है बीते कई सालों में कई सालों में वर्किंग प्लान से ज्यादा पेड़ों की कटाई की जाना। यही नहीं इसकी दूसरी जो वजह मानी जा रही है वह है इन क्षेत्रों में अत्याधिक मात्रा में अवैध कटाई को होना।

भोपाल। मध्यप्रदेश में की जा रही अंधाधुंध कटाई के चलते लगातार तेजी से हरियाली समाप्त हो रही है। यही वजह है कि अब प्रदेश में वन कटाई के मामले में केन्द्र सरकार द्वारा सख्त रुख दिखाना शुरू कर दिया गया है। हाल ही में केन्द्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मप्र के बीस जिलों में पूरी तरह से इस तरह की कटाई पर रोक लगा दी है।
दरअसल प्रदेश में पेड़ कटाई करने के बाद भी उसके एवज में नए पेड़ लगाने में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। इस मामले में प्रदेश सरकार का रुख भी गंभीर नहीं है। यही वजह है कि प्रदेश सरकार द्वारा केन्द्र से एक लाख 24 हजार हेक्टेयर के इलाके में वन कटाई की अनुमति केन्द्र से मांगी थी। खास बात यह है कि प्रदेश का वन महकमा उन जिलों में कटाई की योजना बना चुका था, जिन जिलों के बन क्षेत्रों में पहले से ही ग्रीनरी बहुत कम बची है। इस प्रस्ताव पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पूरी तरह से पेड़ कटाई पर रोक लगा दी है। दरअसल प्रस्ताव में प्रदेश सरकार ने वन महकमे की ओर से 20 जिलों के 2400 कूपों में पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव स्वीकृति के लिए भेजा था।
प्रदेश के 28 जिलों में ग्रीनरी हुई कम
फॉरेस्ट सर्वे आॅफ इंडिया की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि मप्र में भोपाल सहित लगभग 28 जिले ऐसे हैं, जिनमें ग्रीनरी बेहद कम हो चुकी है। दरअसल इसकी बड़ी वजह है बीते कई सालों में कई सालों में वर्किंग प्लान से ज्यादा पेड़ों की कटाई की जाना। यही नहीं इसकी दूसरी जो वजह मानी जा रही है वह है इन क्षेत्रों में अत्याधिक मात्रा में अवैध कटाई को होना।
केन्द्र ने रखी तीन शर्तें
प्रदेश के वन महकमे द्वारा बीते साल मई-जून 2020 में प्रदेश के 20 जिलों में लगभग एक लाख 24 हजार हेक्टेयर में वन कटाई की अनुमति केन्द्र के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल से मांगी गई थी। इस पर आपत्ति लगाते हुए कार्यालय ने सरकार के सामने तीन शर्तें रख दीं। इसमें सबसे बड़ी शर्त यह है कि फॉरेस्ट सर्वे इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार जिन जिलों में ग्रीनरी कम हुई है वहां पेड़ नहीं काटे जाएं। इसके अलावा सूखे पेड़ों को काटने के बदले में हरे वृक्षों को उस जगह पर लगाया जाए। तीसरी शर्त में पेड़ों कटाई के इलाकों की वर्तमान में ग्रीनरी की स्थिति की जानकारी देना शामिल है।

प्रदेश में दो दशक में कम हो गई 44 फीसदी हरियाली

  • करोड़ों खर्च के बाद भी 18 जिलों में हालात हुए खराब
    मप्र देश का शायद ऐसा पहला राज्य है , जहां पर सरकार द्वारा सैकड़ों करोड़ की राशि खर्च करने के बाद भी हरियाली बढ़ने की जगह तेजी से कम हो रही है। इनमें भी प्रदेश के डेढ़ दर्जन जिलों में तो हालात बेहद खराब हो चुके हैं। इन जिलों में दो साल के अंदर ही करीब 60 वर्ग किलोमीटर के दायरे में हरियाली साफ हो चुकी है। यह खुलासा हुआ है भारतीय वन सर्वेक्षण संस्थान की सर्वे रिपोर्ट में।
    इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मप्र में पौधरोपण में होने वाली औपचारिकता और लापरवाही कमी वजह से प्रदेश में हरियाली का दायरा नहीं बढ़ पा रहा है, जबकि इस पर हर साल सरकार द्वारा सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। इस मामले में संस्थान ने प्रारंभिक रिपोर्ट वन विभाग को भेजकर आंकलन करने की नसीहत दी है। विभाग की आंकलन रिपोर्ट मिलने के बाद संस्थान द्वारा इस रिपोर्ट को जारी किया जाएगा। संस्थान द्वारा इस तरह का सर्वे हर दो साल में किया जाता है।
    यह भी है वजह
    प्रदेश के जिन डेढ़ दर्जन जिलों में हरियाली कम हुई है उनमें से अधिकांश जिले आदिवासी बाहुल्य हैं। इन जिलों वन क्षेत्र में जंगलों का अत्याधिक नुकसान पहुंचाया गया है। संस्थान की रिपोर्ट में कहा गया है कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद तेजी से पेड़ों की कटाई हो रही है। यही नहीं इन इलाकों में अतिक्रमण भी तेजी से हो रहा है। वन विभाग से जुड़े सूत्रों की माने तो वर्ष 2017 और 2019 के बीच प्रदेश में 60 वर्ग किमी हरियाली कम हो चुकी है।
    भोपाल में भी हालात खराब
    इस मामले में प्रदेश की राजधानी होने के बाद भी भोपाल में हालात बेहद खराब हैं। यहां पर भी तेजी से हरियाली कम हो रही है। अगर इस हाला का आंकलन करें तो शहर में बीते बीस सालों के अंदर हरियाली में 44 प्रतिशत की कमी आयी है। इसका सीधा असर पर्यावरण में असंतुलन, गिरते जलस्तर और बढ़ते तापमान के रूप में सामने आ रहा है। इसके बाद भी सबक न लेते हुए विकास के नाम पर अब भी आगे लगातार पेड़ों की कटाई जारी रहने का अनुमान है।
    गायब हो चुके हैं करोड़ों पौधे
    खास बात यह है कि सरकारी प्रयासों के तहत वन विभाग और अन्य संस्थानों द्वारा बीते पांच सालों में प्रदेश में 40 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का दावा किया गया है, लेकिन इनमें से आधे पौधे तो मर चुके हैं। यही नहीं वन विभाग के पास जीवित बचे पौधों का भी कोई ठीक-ठीक आंकड़ा तक नहीं है। प्रदेश में करीब ढाई साल पहले जब कांग्रेस की सरकार बनी तो पौधरोपड़ की जांच जरुर शुरू की गई थी, लेकिन तत्कालीन सीएम स्तर पर उस पर फैसला नहीं लिए जाने की वजह से कुछ भी नहीं हो सका और अब सरकार बदलने के बाद मामले को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

Ramswaroop Mantri

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