दुनिया अब आठ अरब से अधिक आबादी की हो गई है। इस खबर पर खुश हुआ जाए या चिंतित, ये विचारणीय मुद्दा है। अगर आबादी के इस आंकड़े को उपलब्धि माना जाए तो यह खुशी की बात है, लेकिन आबादी की बढ़ती रफ्तार पर नजर डाली जाए तो चिंता के सिवाय दूर-दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता। चिंता इस बात की कि जिस एक अरब की आबादी को दो अरब तक पहुंचने में 130 साल लगे, वहीं सात अरब की आबादी को आठ अरब पहुंचने में सिर्फ 12 साल लगे। आबादी बढ़ने की यदि यही रफ्तार रही तो अगले 25 साल में हम कहां होंगे, इसका तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

आबादी का बढ़ना यूं चिंता की बात नहीं लेकिन कुछ देशों में आबादी के बढऩे की गति चिंता में डालती जरूर है। ऑस्ट्रेलिया की आबादी 1991 में एक करोड़ 80 लाख थी जो अब बढक़र ढाई करोड़ हो गई है। यानी 30 साल में 70 लाख की आबादी बढ़ी। दूसरी तरफ भारत है। 1991 में हम 89 करोड़ थे जो अब बढ़कर 141 करोड़ हो गए हैं। यानी हमारी आबादी बीते तीस साल में 52 करोड़ बढ़ी। 1991 में चीन की जनसंख्या 114 करोड़ थी जो अब 145 करोड़ पहुंची है। मतलब साफ और समझने योग्य है। तीन दशक में चीन की आबादी 31 करोड़ बढ़ी जबकि हमारी 52 करोड़। देश में आबादी बढ़ने की रफ्तार यही रही तो 2025 में हम चीन को पीछे छोडक़र पहले स्थान पर आ जाएंगे। चिंता की बात यह है और इसे सरकारों के साथ आम आदमी को भी समझना होगा। देश जितना विकास कर रहा है उतना नजर नहीं आ रहा। आजादी के 75 साल बाद भी यदि पूरी आबादी को दो समय का भोजन नहीं मिल रहा हो, पीने का साफ पानी नहीं उपलब्ध हो तो बढ़ती आबादी डराती जरूर है।
आज दुनिया की करीब आधी आबादी सिर्फ सात देशों में रहती है। भारत आबादी पर नियंत्रण के प्रयास तो कर रहा है लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में 2050 तक दुनिया के अनेक देशों की आबादी कम होने की उम्मीद जताई गई है। दुनिया के दूसरे देशों से हमने बहुत कुछ सीखा है। जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में भी अगर कुछ सीख पाएं तो अच्छा रहे। अन्यथा आर्थिक विषमता देश में सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर सकती है। आबादी बढ़ तो रही है लेकिन संसाधनों पर हक चंद लोगों का ही बना हुआ है। आधी आबादी तो अब भी रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद में उलझी है।





