हरनाम सिंह
समय, काल, परिस्थितियों के अनुरूप लेखकों की भूमिका सदैव बदलती रही है। सामंत काल में जब क्रूर शासकों द्वारा गरीब, शोषित जनता को निर्ममता से सताया जा रहा था, वर्ण व्यवस्था ने समाज में ऊंच-नीच की गहरी खाई बना दी थी। उस काल में भी मध्ययुगीन कवियों कबीर, सूरदास, रहीम खान खाना से लेकर नामदेव, चंडीदास अपने समय की चुनौतियों का जवाब दे रहे थे।
औपनिवेशिक काल में भी जब देश अंग्रेज शासकों का गुलाम था, उस दौर में भी भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी, मुक्तिबोध सहित अनेक लेखक, साहित्यकार अपनी कलम की माध्यम से जनता को जगा रहे थे। भारतेंदुहरिश्चंद्र कहते थेअंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी
हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई
आगे बढ़कर बिस्मिल अंग्रेजों को चुनौती देते हैं कि
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है…
देश आजाद हुआ पर जन आकांक्षाएं पूरी होती न दिखी तो अली सरदार जाफरी ने सवाल उठाए कौन आजाद हुआ? किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी… शंकर शैलेंद्र ने भगत सिंह के टूटते स्वप्न पर कहा कि
भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की
धूमिल सवाल पूछते रहे कि
क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है
अदम गोंडवी भी पूछते हैं कि
सौ में से सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं
दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है
हमारे पुरखे प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से प्रमुख प्रेमचंद ने कहा था कि ” साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब होता है… आगे वे कहते हैं कि साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है। वह राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं आगे मशाल दिखाती सच्चाई है।” लेखकों का दायित्व है कि देश समाज और व्यक्ति के जीवन में आ रहे परिवर्तनों को स्वर दे, शोषण के नित नए स्वरूप को पहचाने।
जनकवि नागार्जुन कहते हैं कि ” साहित्यकार की दृष्टि जब लाभ की और होती है तो वह शासन के चारों ओर घूमता है। पुरस्कार और प्रसिद्धि के लिए लालायित रहता है। उन्होंने राज्याश्रय को सच्चे साहित्यकार के लिए ठंडी कब्र कहा। प्रगतिशील लेखक संघ अपने पुरखों की सीख को समझते हुए संगठन के सदस्यों को सचेत करता रहा है कि वे पुरस्कार सम्मान के प्रलोभन से मुक्त रहकर शोषित पीड़ित जन के पक्ष में लेखन करते रहें।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की तुलना फासीवाद से की जा रही है, देश में फासीवाद आ रहा है, आ चुका है अथवा फासीवाद का यह कोई नया फॉर्मेट है। इस विवाद से हटकर वर्तमान में जो कुछ देश की जनता देख और समझ रही है वह बेहद खतरनाक है।शासकों का प्रतिक्रियावादी चरित्र हमारे सामने है। काली ताकतों ने जनता को सांप्रदायिक और जातीय आधार पर विभाजित कर सत्ता प्राप्ती का फार्मूला इजाद कर लिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पोषित अनेक संगठन कारपोरेट मीडिया तंत्र के माध्यम से झूठ को सच साबित करने के अभियान में लगे हुए हैं। इनके कारण देश की राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई है। इन ताकतों के चलते देश की साझा संस्कृति, लोकतांत्रिक मूल्य खतरे में हैं।
इन सबके बीच कवियों लेखकों की बेचैनी सामने आती रही है। दुष्यंत कुमार पहले ही कह चुके हैं किवे मुतमईन हैं पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए
कात्यायनी समाज के प्रबुद्ध वर्ग की चुप्पी को रेखांकित करते हुए कहती है कि
कोई भी विकल्प न चुनना, चुप रहना
या सुगम सुरक्षित विरोध की नपुंसक राह ढूंढ लेना
यह सब और कुछ भी नहीं है बर्बरता के पक्ष में खड़ा होने के सिवा
रामधारी सिंह दिनकर पहले ही कह चुके हैं
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध…
ऐसी ही चिंता पाश की भी है जब वे कहते हैं
सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना… हमारे सपनों का मर जाना
देश में फासीवाद का यह दौर कोई आकस्मिक घटना नहीं है। फासीवाद के खतरे को मुक्तिबोध ने आजादी मिलने के पूर्व ही पहचान लिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व उभरे नाजीवाद को उन्होंने भारतीय संदर्भों में समझा। ऐसी प्रवृत्ति भारत में न पनपे इसके लिए मुक्तिबोध ने 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन आयोजित किया था। जिसके प्रमुख वक्ता राहुल सांकृत्यायन थे। याद रखा जाना चाहिए कि उस वक्त देश गुलाम था, गांधीजी जीवित थे। लेकिन 1925 में आर एस एस का गठन हो चुका था। इसी खतरे को मुक्तिबोध ने आजाद भारत में भोगा जब 1962 में सांप्रदायिक संगठनों के दबाव में आकर तत्कालीन राज्य सरकार ने उनकी पुस्तक "भारतीय इतिहास और संस्कृति" पर प्रतिबंध लगा दिया था।
वर्तमान शासकों के दौर में लेखक, पत्रकार तर्क वादियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे, गौरी लंकेश को गोली मार दी गई।वर्तमान में अनेक प्रबुद्ध जन जेलों में अमानवीय परिस्थितियों में मरने के लिए छोड़ दिए गए हैं। शासक समाज को विभाजित करने के पश्चात लेखकों के आंदोलन को भी बांटने का प्रयास कर रहे हैं। सांप्रदायिक आधार पर उर्दू का विरोध संस्कृत के प्रति अनुराग ऐसे ही प्रयास हैं। साहित्य को हिंदू काल और मुस्लिम काल में विभाजित करने के प्रयासों से भी सचेत रहने की जरूरत है।भगत सिंह को इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के रूप में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को बोल कि लब आजाद हैं तेरे… से लेकर लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… मुक्तिबोध को अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे तथा हबीब जालिब को ऐसे दस्तूर को सुबह बेनूर को मैं नहीं मानता… के रूप में जाना और पहचाना जाता है। हमारे समय के लेखकों को भी अपनी कलम को एक शस्त्र और लेखन को नारे में बदलने की जरूरत है।
अंत में हमारे समय के बड़े कवि कुमार अंबुज की कविता की कुछ पंक्तियांमैं बच नहीं सकता भागकर
नहीं छिप सकता किसी कंदरा में
मेरा यह जीवन जीना होगा मुझको ही
और बार-बार कहना होगा
अपने हिस्से का सच
हरनाम सिंह





