अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

कुछ विशेष समुदाय संपत्ति और गरिमा से वंचित हों तो यह संयोग नहीं साजिश

Share

डॉ सलमान अरशद

दलितों और मुसलमानों का बहुसंख्यक ग़रीब है, एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके पास किसी भी तरह की कोई संपत्ति नहीं है, यहाँ तक कि मकान बनाने के लिए ज़मीन का एक टुकड़ा तक नहीं, ये लोग फुटपाथ पर रहते हैं, या सार्वजनिक ज़मीन पर झोपड़ी बनाकर। 

जब एक या कुछ विशेष समुदाय संपत्ति और गरिमा से वंचित हों तो इसे संयोग नहीं साजिश समझना चाहिए। कुछ लोग ये तर्क दे सकते हैं कि किसी समय दलित समुदाय के लोग राजा रहे हैं, लेकिन इससे आज की हक़ीक़त नहीं बदलती। 

आज़ाद भारत में डिसीजन मेकिंग पावर सवर्ण पृष्ठभूमि से आये लोगों के हाथ में रही और इनमें भी बहुसंख्य सवर्ण हिन्दुओं की रही, इनमें भी ब्राह्मण पृष्ठभूमि से आये लोगों की। आज भी कोर्ट, अफसरशाही, सियासी दल आदि में अगर डिसीजन लेने की ताकत ब्राह्मण पृष्ठभूमि से आये लोगों के हाथ में है तो इसे संयोग तो कत्तई नहीं कहा जा सकता। 

एक बड़ा समूह ऐसे लोगों का है जो समझता है कि मुसलमानों और दलितों पर हमला महज़ वोट के लिए किया जाता है, (आजकल दलित और पिछड़े ही प्रायः मुसलमानों पर हमले में शामिल होते हैं) लेकिन ये सच नहीं लगता। 

आज़ाद भारत में मुसलमानों और दलितों की हैसियत दूसरे समुदायों की तुलना में कमज़ोर हुई है, याद रहे कि मुसलमानों की बहुसंख्या किसी समय दलित ही हुआ करती थी, सम्मान पाने के लिए बड़ी संख्या ने धर्म बदला था। 

सार्वजनिक विकास के काम अगर मुस्लिम बस्तियों तक नहीं पहुँचते, आरक्षित पदों पर अगर आज भी सूटेबल कैंडिडेट नहीं मिलता, प्रशासन और कोर्ट का रवैया अगर व्यक्ति का धर्म देख कर तय होता है, मीडिया को सिर्फ मुसलमानों की बुराई नज़र आती तो ये सब महज़ संयोग नहीं हो सकता। 

जब सांप्रदायिकता का ये आलम नहीं था तब भी मेरठ ईदगाह, हाशिमपुरा, मलियाना और नेल्ली जैसे नरसंहार होते थे और शासन- प्रशासन में बैठे लोग अपराधियों को बचाते थे। कुल मिलाकर शासन, प्रशासन, कोर्ट और मीडिया का भेदभावपूर्ण व्यवहार कम होने के बजाय लगातार बढ़ ही रहा है। 

एक सोच ये भी है कि पूँजीवादी लूट को सुनिश्चित करने के लिए इस सियासत को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे सहमत हूँ, लेकिन सवर्ण हिन्दुओं की सर्वोच्चता के सेंटिमेंट पर आधारित सियासत जो आज अपने चरम पर है वो आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले शुरू हुई थी और उसने अपने वक़्त की हर ताक़त का इस्तेमाल किया, आज वो पूँजीवादी निजाम का इस्तेमाल कर रही है और इस्तेमाल हो भी रही है। 

अब सवाल ये है कि इन हालात का हल क्या हो सकता है ? सियासी फ़लसफ़े में मार्क्सवाद को छोड़ दिया जाए तो कोई भी ऐसा फ़लसफ़ा नहीं है जो हर तरह के मनावजातित असमानता को मिटाने की बात करता हो। इसलिए समानता, न्याय और गरिमा पर आधारित समाज की कोई भी कल्पना मार्क्सवादी दर्शन पर चल कर ही हासिल की जा सकती, किसी और तरीक़े से नहीं। 

भारत में जो लोग आज मार्क्सवादी सियासत कर रहे हैं उन में एक बड़ी तादात ऐसी है जो जाति का ज़हर ढोये जा रही है। 

दरअसल इंक़लाब एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। आप पहले ख़ुद को बदलते हैं और बदलाव भी निरंतर चलता रहता है, साथ ही अपने आसपास के माहौल में जितना बदलाव निजी प्रयासों से हो सकता है, आप करते हैं, फिर पार्टी या संगठन के स्तर पर भी राजनीतिक एवम सांस्कृतिक प्रयास साथ साथ और निरंतर चलता रहता है। फिलहाल कममुनिस्ट कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या इस तरह काम करती हुई नज़र नहीं आती। इस पर सोचना होगा। 

(रात किसी साथी से हुई बातचीत का सार, आपकी सुविचारित राय का स्वागत है) 

~ Dr. Salman Arshad

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें