मंजुल भारद्वाज
अम्बेडकर क्या सिर्फ़ एक ‘विशेष वर्ग’ के हैं? क्या संविधान केवल एक ‘विशेष वर्ग’ के लिए न्याय की पैरवी करता है? क्या समतामूलक, न्यायसंगत समाज देश की ज़रूरत नहीं है? क्या समाज को उसकी रुढियों से, कुरीतियों से विसंगतियों से आज़ाद करने वाला ‘अम्बेडकर’ का चिंतन केवल एक ‘विशेष वर्ग’ की चेतना को जगाने मात्र तक सीमित है? या मूलतः ‘अम्बेडकर’ का चिंतन शोषण मुक्त समाज का चिंतन है…
सदियों से चलते आए धर्म और जात की रुढियों को समता, समानता और न्याय के लिए संविधान..आईन..और उसके निर्वहन के लिए संवैधानिक संस्थानों का निर्माण ‘आधुनिक भारत’ की नीव हैं .
‘अम्बेडकर’ का चिंतन हर शोषित की पुकार है, न्यायसंगत समाज की आवाज़ है ..उससे मात्र एक ‘विशेष वर्ग’ तक सीमित करना ‘अल्पकालिक’ चुनावी फायदा हो सकता है ..पर दीर्घ में उनके चिंतन के विरुद्ध होगा.
आइये जन्म के संयोग को चुनौती देने वाले इस योद्धा के चिंतन को न्यायसंगत समाज के चिंतन के रूप में देखें और उनके सपनों को साकार करें !





