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लोकतंत्र : गरीबों और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए झंझटों का पहाड़

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 पुष्पा गुप्ता

      _बात मेरी-आपकी नहीं, उनकी है जो सरकारी राशन पर जी रहे हैं। ऐसे परिवार के बच्चों का भविष्य क्या है? जो नागरिकता छोड़ सकते हैं छोड़ रहे हैं। इनके पास कट्टर हिन्दू होने के अलावा कोई विकल्प है?_

      नोटबंदी के कारण लोगों का धंधा-व्यापार खराब हुआ, कमाई कम हुई और किस्तें न चुका पाने के कारण तरह-तरह की परेशानी हुई। सबका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। बैंकों की कमाई कम हुई, एटीएम घट गए और कई बैंक गायब हो गए। कुछ का विलय भी हुआ। जिनके कर्जे माफ हुए, कम में सौदा हुआ या जो सजा जुर्माना भुगत रहे हैं उनकी बात छोड़ दूं तो बैंकिंग महंगा हुआ, ब्याज दर घट गई।

        अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर आए इसके लिए जरूरी है कि बंद कारोबार फिर शुरू हों या उतने नए कारोबार शुरू हों। इसके लिए सरकार क्या कर रही है, मैं नहीं जानता पर नए झंझट जानता हूं, झेल रहा हूं।   

       दूसरी ओर, बैंकों का काम काफी आसान और कम हुआ। अब बैंक का सारा काम-धाम मशीन से, इंटरनेट बैंकिंग के जरिए, खुद खाता धारकों द्वारा कर लिया जाता है।

 नेट बैंकिंग ठीक से काम करे तो पासबुक अपडेट कराने की जरूरत नहीं है ब्रांच जाने की भी नहीं। रिटर्न फाइल न करना हो तो कहां से आए-कहां गए इसका हिसाब भी नहीं चाहिए। फिर भी बैंक ने शुल्क बढा दिए हैं। और डिजिटल लेन-देन जरूरी है इसके लिए बैंक-खाता सब जरूरी है। लेकिन अब चेकबुक जरूरी नहीं है।

      एटीएम से पैसे निकालने का शुल्क लगता है। अपने बैंक वाले से नहीं तो दूसरे से निकालने पर और अपने बैंक का दूसरा एटीएम आस-पास है ही नहीं। लेकिन सब चल रहा है। 

     जनता खुश है उसे कोई दिक्कत नहीं है। हो भी तो कोई सुनने वाला नहीं है। जनधन खाते खुलवाए गए थे, बीमा कराया गया पर कोरना से मरने वाले कितने लोगों को इस मुफ्त के या सस्ते या मोदी जी की मेहरबानी से हुए बीमा का लाभ मिला इसकी खबर नहीं दिखी।

कायदे से तो यह भरपूर प्रचार का मामला है पर प्रचार भी नहीं। “फलाने जी कोरोना से अचानक मर गए, बेरोजगार थे, बैंक में कोई बचत भी नहीं थी पर मोदी जी के बीमा से परिवार को इतने लाख मिल गए। परिवार अपने प्रिय को खोकर भी खुश है।” ऐसा प्रचार होना चाहिए था पर हुआ नहीं।

       दिखा तो बिल्कुल नहीं। कोरना से मरने वालों को मुआवजा तो छोड़िए, बीमा का पैसा मिला कि नहीं कोई नहीं जानता। 

      कहने की जरूरत नहीं है कि जनधन खाता या प्रचार से प्रभावित होकर खाता खोलने वालों का हाल किसी को पता नहीं है। जब बैंक के शुल्क मुझे अखर रहे हैं, मैंने अपने फालतू खाते बंद कर दिए, बैंक वालों के दबाव में नए खाते नहीं खोल रहा हूं तो आम आदमी भी परेशान ही होगा पर उसकी कोई खबर नहीं है। अखबारों में शिकायत कॉलम होता था अब नहीं होता।

कहीं कोई सुनवाई नहीं है। और वित्तमंत्री कह चुके हैं पप्पू बंगाल में हैं। नौकरी नहीं है तो धंधा दुकान चलाना मजबूरी है। पर खाता खोलना ही मुसीबत है, खर्चीला तो है ही। 

     एक छोटे कारोबारी को फर्म के नाम से खाता चाहिए, कम से कम पांच हजार रुपए, पैन कार्ड, आधार कार्ड, के अलावा पते के सबूत के लिए सबसे सस्ता, शॉप एंड इंस्टैबलिशमेंट ऐक्ट में पंजीकरण जरूरी है। इसके भी दस हजार। यह सब खुद कर ले उसके लिए कंप्यूटर जरूरी है। पुराना भी हो तो 20 हजार। सब मिलाकर कम से कम 35 हजार रुपए हों तो आदमी कारोबार के लिए सोचे और यह पैसा कारोबार के लिए नहीं, सोचने या शुरू करने के लिए ही चाहिए।

         ईज ऑफ डूइंग बिजनेस – का प्रचार है लेकिन काम कैसा भी हो, टीडीएस कटेगा और आपका पैसा फंसता जाएगा जो साल भर का एक साथ ही मिल सकता है। 

       उसकी वापसी के लिए रिटर्न फाइल करना जरूरी है। सब कीजिए करवाइए, अपने नाम से खाता खोलिए उसे आधार पैन से लिंक करवाइए और तब आपका पैसा आपको मिलेगा जो कटना ही नहीं चाहिए था। नया झंझट यह भी कि अभी तक टीडीएस का जो पैसा आयकर रिफंड से मिलता था वह संयुक्त खाते में आ जाता था।

       ऐसेसी का मुख्य खातेदार होना जरूरी नहीं था। पर अब चालू खाते में कम लेन-देन हो तो शुल्क लग रहा है, टीडीएस वापस लेने के लिए बैंक में फर्म के खाते से अलग, कारोबारी या स्वत्वाधिकारी के नाम से अलग खाता चाहिए भले उसे इसकी जरूरत नहीं हो। उसका भी खर्च लगेगा।

Ramswaroop Mantri

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