इरशाद हिंदुस्तानी, बैतूल
सरकार अवैध लोगों की पहचान के लिए पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करना चाहती है। नागरिकता संशोधन कानून ( CAB – Citizenship Amendment Bill) बनाने के बाद मोदी सरकार की नजर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स ऑफ इंडिया (NRC) देश भर में लागू करवाने पर है। ऐसे में लोग अपनी नागरिकता को लेकर पुख्ता सबूत जुटाने की जुगत में लगे रहे हैं। ऐसे में हम आपको एक ऐसे रजिस्टर से रुबरू कराने वाले है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि लोगों की दर्जनों पीढ़ियों का हिसाब किताब दर्ज है। जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भाट यानी रावजी गांव-गांव घूम रहे हैं। वह भी कोई छोटा मोटा रजिस्टर लेकर नहीं बल्कि एक क्विंटल से ज्यादा वजनी पोथियां लेकर वे लोगों की वंशावली बांच रहे हैं।
आइए सबसे पहले जानते हैं ये भाट, रावजी या जागा है क्या…?
राजस्थान के कई जिलों में खासतौर पर चित्तौड़गढ़ में कई परिवार दर्जनों जातियों और समाजों की वंशावली जुटाकर रखते है। करीब 40 गांव में यह कुनबा जाट, गुर्जर, पंवार, यादव, सुनार, राजपूत कुंबी, बनिया, ब्राह्मण जैसी जातियों की वंशावली को अपनी पोथियों में संजोकर रखते हैं। रावजी या भाट कहलाने वाले ये लोग पीढ़ी दर पीढ़ी का रिकार्ड अपनी पोथियों में दर्ज करते है। जिसे तीन और पांच सालों में जाकर उन परिवारों को बताया और सुनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर समझे तो जानकारी दी जाती है की उनकी 12वीं पीढ़ी में कौन शख्स कहां रहता था। फलां पीढ़ी में घर का मुखिया कौन था और कब, कौन, कहां पैदा हुआ और उसकी शादी किस वंश में कब हुई।

25 गांव की पोथी पढ़ते हैं करण
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के गांव गंगरार के 32 वर्षीय करण परिहार ऐसे ही शख्स है। जो इन दिनों बैतूल में ये पोथियां पढ़ने का काम कर रहे हैं। रावजी परिवार में जन्मे करण बैतूल जिले में पंवार समाज की पोथियां पढ़ते हैं। उनके कुनबे ने उन्हें यहां 25 गांव की जिम्मेदारी दी है। उनकी ही तरह परिवार के अन्य लोगों के पास अलग-अलग शहर, कस्बे और गांव की जिम्मेदारी है। जो गांव-गांव पोथियां ले जाकर समाज के लोगों को उनकी वंशावली से रुबरू कराते हैं।
आठ बड़ी-बड़ी पोथियों में लोगों के बाप, दादाओं, परदादाओ और उनकी भी कई पीढ़ियों का रिकार्ड करण के पास मौजूद है। फिलहाल उनके पास एक क्विंटल दस किलो वजन की पोथियों में पवार समाज के 25 गांव की 12 पीढ़ियों में हुए हर शख्स का। लेखा जोखा है। जिसे वे घर घर जाकर सुनाते है की उनकी किस पीढ़ी में कौन मुखिया था। कुल की वंशावली बताने का यह गुर करन को अपने बाप दादाओं से मिला है। यही नहीं पोथियां भी उन्हीं से मिली है। जिससे वे पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पीढ़ियों का हिसाब किताब आगे बढ़ा रहे हैं।

1650 सालों का पुख्ता रिकार्ड
करण के मुताबिक बैतूल जिले में वे पंवार समाज की पोथी पढ़ते है। इस समाज का इतिहास विस्तृत है। पवार आबू पर्वत पर रहते थे।यहां से चित्तौड़गढ़ में मोरी पंवार का किला में रहना शुरू किया। महमूद गजनवी चित्तौड़ पर आक्रमण के बाद पंवार सन 965 में धार आकर बस गए। यही से वे मध्यप्रदेश के बालाघाट, छिंदवाड़ा, बैतूल, गोंदिया, भंडारा जिलों में फैल गए। उनके पास यही सन 965 से अब तक का रिकार्ड सुरक्षित है। 1650 सालों में जहां जहां भी पंवार समाज के लोगों फैले है। ये भाट वहां जाकर उनका रिकॉर्ड इकट्ठा कर उन्हें पोथियों में दर्ज करते हैं।
पोथियों में दर्ज होती है यह जानकारी
भाटो के पास सुरक्षित इन पोथियों में परिवारों से जुड़ी कई प्रमाणिक जानकारियां होती है। जिसमें परिवार की कुल देवी, देवताओं का नाम, उनकी वंशावली,परिवार प्रमुख का नाम, परिवार का सरनेम, परिवार के मुखिया व अन्य पुरुषों की शादियां किन महिलाओं से किन गोत्र में शादी हुई है। किस स्थान पर विवाह हुए है। इनमें तीन कुल का नाम जोड़ा जाता है। घर में पैदा हुए नए सदस्य का नाम भी पोथी में लिखा जाता है। 73 साल की सरस्वती बाई बताती है की वे पिछले 55 साल से पोथी की जानकारी भाट से सुनती चली आ रही है। इससे उनकी पुरानी पीढ़ी के नाम स्मरण हो जाते है।
नई पीढ़ी की 21 वर्षीय आकांक्षा का कहना है की उन्हें इस पोथी से अपनी 9 पीढ़ियों के दादा परदादाओं के नाम पता चल गए। यह जानकारी और कहीं नहीं मिल सकती। उन्हें पहले सिर्फ तीन पीढ़ियों की जानकारी थी। इससे पता चल जाता है को हमारा परिवार कहां कहां रहा। हम इंडिया के ही वाशिंदे है। आकांक्षा के पिता बताते है की इस पोथी से उन्हें पता चल जाता है की परिवार कहां से शुरू हुआ।बैतूल आने के बाद परिवार के सदस्य कहां कहां गए। राजस्व दस्तावेजों में बमुश्किल तीन पीढ़ी का रिकार्ड ही मिल पाता है। पर यहां तो हम दस से 12 पीढ़ी के नाम पते मिल जाते है।

ऐसे पड़ी भाटो की जरूरत
अपने परिवार का इतिहास जानने, भाई भाई के जमीन संबंधी विवादों में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बुलाने पर, नई रिश्तेदारी करते समय, सरनेम की जानकारी के लिए, पहली पीढ़ी से कितनी दूरी है,जानने के लिए भाट की जरूरत पड़ती है। इन भाट का पंजीयन जयपुर के वंशावली संरक्षण संस्थान में दर्ज किया जाता है। जहां से प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बाद वे वंशावली बाचते है।
ऐसे पढ़ी जाती है पोथी
परिवारों में पोथी पढ़ने की भी एक प्रक्रिया है। सबसे पहले भाट संबंधित घर में जाकर,परिवार प्रमुख को पोथी सुनाने के लिए आमंत्रण देते हैं। जब वे तैयार हो जाते है तो एक निश्चित समय तय किया जाता है। इस तय समय पर भाट इस घर परिवार के सरनेम वाली पोथी लेकर पहुंचते है। जहां सबसे पहले पोथी और भाट की पूजा अर्चना की जाती है। वहां भाट कुल के उद्भव से लेकर अंतिम सदस्य तक का नाम , परिवार में की गई शादियों का ब्यौरा पेश करते है। इस वाचन के बाद भाट को भोजन कराने के बाद उन्हें अपनी क्षमता अनुसार भेंट दी जाती है।

पंवार समाज का यह है ब्यौरा
पवांर समाज में 72 सरनेम होते है। इनमें 72 गौत्र वर्धा तटीय पंवार, जबकि 36 बैनगंगा तटीय पंवारों के है। चित्तौड़गढ़ में समाज की कुल देवी कालिका मैया का मंदिर है। इनमें सूर्यवंश, चंद्रवंश, मौर्यवंश, अग्निवंश जैसे चार वंश है। ये क्षत्रिय राजपूत पंवार है। राजा जगदेव की 7 पीढ़ियों बाद राजा भोज का जन्म हुआ था।




