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ठण्ड में स्नान निरोधक चिंतन

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 सुधा सिंह

     ऐसा किसी भी ग्रन्थ में लिखा हुआ नहीं है कि मानव मात्र को रोज स्नान करना चाहिए। मुझे यह वाक्य पढ़ते हुए तीन-चार दशक तो हो ही चुके हैं, जिसमे कहा गया है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जायेगा। ऐसी अवस्था में आप जितना पानी का अपव्यय करेंगे, दुनिया उतनी ही युद्ध की ओर सरकती जायेगी।

       भारत गाँधी का देश है और कोई भी सच्चा भारतीय कभी भी यह नहीं चाहेगा कि अपने यहाँ से जगत में हिंसा का संदेश जाये। भारत की आबादी कोई 125 करोड़ है। इतने लोग प्रतिदिन स्नान करें तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारा मुल्क कितने गैलन पानी को रोज बर्बाद कर देगा।

       रोज नहाना एक तरह का श्रेष्ठतावाद है। रोज नहाने के पीछे रोज नहाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि यह जाहिर करना होता है कि हम रोज नहाते हैं और इसलिए श्रेष्ठ हैं। ये मूलतः वे लोग होते हैं जिन्हें और कोई काम-धाम नहीं होता।

सुबह उठकर वे बस नहाने की चिंता में लग जाते हैं और खासतौर पर संयुक्त परिवार में सबसे पहले नहाकर इस तरह ढिंढोरा पीटते हैं गोया ओलोम्पिक से स्वर्ण पदक खींच लाये हों। नहा लेने के बाद भी उनकी चिंता सिर्फ अगले दिन नहाने की ही होती है।

     ये स्नानजीवी होते हैं और सिर्फ स्नान करने के लिए जीते हैं। मोहन जोदड़ो की खुदाई में पाए गए बड़े-बड़े स्नानागारों से ऐसा मालूम पड़ता है कि प्राचीन सभ्यता में भी इस किस्म के लोग पाये जाते थे, जिन्हें सिवाय नहाने के और कोई काम नहीं था।

      एक जमाने में जब बिहार की सड़कों को अभिनेत्रियों के गालों की तरह चिकनी बनाये जाने का अभियान चल रहा था, हेमा मालिनी ने भी उक्त श्रेष्ठतावाद की हिमायत की थी जबकि सदी के महानायक दूसरे खेमे में खड़े दिखाई पड़ते हैं।

      फ़िल्म ‘सत्ते पे सत्ता’ के सात नायक श्रेष्ठतावाद के खिलाफ छेड़ी जाने वाली मुहिम के प्रतीक हो सकते थे। इनमें से एक नायक स्पष्ट रूप से यह ऐलान करता है कि उसे पानी से घिन आती है। आगे अभिनेत्री अपने रूप-लावण्य के बल पर उक्त मुहिम को ध्वस्त कर देती है जो एक बडे आंदोलन का रूप ले सकती थी।

        अभिनेता संजीव कुमार अपने संगीत प्रेम के कारण नहाने की हिमायत करते हैं। उन्हें गाना नहीं आता था पर गाना आये या न आये फिर भी गाने के लिए उन्हें ठंडे पानी से नहाना पड़ता था। नहाने की वजह से ही हमारी महान संस्कृति को क्षति हुई है। निर्देशक जबरदस्ती झरनों में नायिकाओं के स्नान-दृश्य दिखाकर युवा पीढ़ी को पथ-भ्रष्ट करते रहे।

कॉलेज के हॉस्टल वाले दिनों में अपने यहाँ ‘थ्री इडियट्स’ के चतुर की तरह एक सयाना लड़का था। उसे रोज सुबह 5 बजे ठंडे पानी से नहाने की बुरी आदत थी।

      इतना ही नहीं, नहाने के बाद वह सबके कमरों में जाता और लड़कों से पूछता कि, “भाई, नहा लिया क्या।” पूछने का मकसद सिर्फ यह होता कि लोग पलट कर यह पूछें कि, “नहीं। तुमने नहा लिया?” वह गर्व के साथ कहता, “हाँ! मैं तो 5 बजे ही नहा चुका हूँ।”

       एक दिन वह मिलिंद नामक लड़के के हत्थे चढ़ गया। हमेशा की तरह पूछा, “भाई! नहा लिया क्या?” मिलिंद ने फौरन कहा, “हाँ, नहा लिया।” अब चौंकने की बारी उसकी थी। पूछा, “कब नहा लिया?” जवाब मिला, “परसों ही नहा लिया था।” वह दोबारा उसके कमरे में नहीं गया।

दूसरा किस्सा हॉस्टल के बाहर कमरा साझा करने वाले तीन दोस्तों का है। एक लड़के के गाँव से कोई चाचा टाइप के परिचित सज्जन आ धमके। बहुत दिनों तक टिके रहने के अलावा रोज प्रतिदिन नहाने पर उपदेश भी झाड़ते।

       लड़कों की आजादी में खलल पड़ रहा था पर वे टलने का नाम नहीं ले रहे थे। फिर एक दिन झोला उठाकर चले गये और इस आकस्मिक प्रस्थान के पीछे लड़कों का यह संवाद था :

     एक : “लोग पता नहीं कैसे 15 -15 दिनों तक नहीं नहाते। मुझे तो 14 वें दिन से ही खुजली शुरू हो जाती है।”

     दो : “कुछ लोग होते हैं ऐसे। इधर तो ये है कि 10 दिनों तक न नहाओ तो अंतर्वस्त्रों में नमक जमा हो जाता है।”

    तीन : ” थोड़ा नमक देना। सब्जी में कम पड़ गया है।”

न नहाने के विषय में हिंदी साहित्य में कोई समृद्ध रचना दिखाई नहीं पड़ती है। रवींद्र कालिया की “गालिब छूटी शराब” में कुछ बाथरूम-सीन हैं, पर उसका संदर्भ अलग है। लेखक और हिंदी सिनेमा के रसिया प्रहलाद अग्रवाल ने एक मजे की बात बतायी।

        प्रगतिशील आंदोलन के अच्छे दिनों में कमांडर कमला प्रसाद अक्सर बड़े-बड़े साहित्यकारों को सतना बुलाया करते थे और उनके ठहरने का इंतज़ाम किसी न किसी आंदोलन के साथी के घरों में होता था। एक बार नागार्जुन आये। कमला जी ने प्रहलाद जी से कहा कि बाबा को अपने घर में टिका लें।

       प्रहलाद जी ने साफ मना कर दिया। कमला जी ने कारण पूछा तो जवाब मिला कि, “एक घर में दो घिनहे नहीं रह सकते।” कहते हैं कि बाबा नागार्जुन भी रोज नहीं नहाने के शौकीन थे।

जगजीत सिंह गज़लें गाते हुए बीच-बीच मे लतीफे भी सुनाते थे। उनके एक दोस्त उन्हें अपना एक नया घर दिखाने ले गये। बड़े उत्साह के साथ एक-एक चीज दिखा रहे थे। बाथरूम भी ले गए। वहाँ तीन नल लगे थे।

      एक ठंडे पानी का और दूसरा गर्म पानी का। जगजीत ने पूछा, “तीसरा किस लिये है।” दोस्त ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, “कभी-कभी नहीं नहाने की भी इच्छा होती है न!”

   ठण्ड पड़ने लगी है। बढ़ने भी लगी है। आपके बाथरूम में तीसरा नल न हो तो फौरन लगवा लें।

Ramswaroop Mantri

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