पुष्पा गुप्ता
वर्ष 2015 के जनवरी महीने में दुनिया की एक दर्जन से ज्यादा बड़ी हस्तियों- वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों, दार्शनिकों और प्रोफेसरों ने मिलकर एक खुला खत जारी किया था।
इसमें कहा गया था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), यानी कृत्रिम बुद्धिमता जिस तरह से विकसित हो रही है, वह दुनिया के लिए ही नहीं, मानवता के लिए भी खतरा साबित हो सकती है।
उन्होंने इस पर रोक लगाने की मांग की। इस पत्र पर दस्तखत करने वालों में स्टीफन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिक और एलन मस्क जैसे उद्योगपति भी शामिल थे।
मगर अभी वह साल पूरा भी नहीं बीता था कि एलन मस्क ने पाला बदला और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को विकसित करने के लिए सैन फ्रांसिस्को में बनी एक कंपनी ओपेनएआई के संस्थापक और प्रमुख निवेशक बन गए।
यह बात अलग है कि तीन साल के भीतर ही उन्होंने इस कंपनी के निदेशक पद से कुछ मतभेदों के चलते इस्तीफा दे दिया।
अब इसी ओपेनएआई कंपनी ने चैटजीपीटी नाम की व्यवस्था विकसित की है, जिसे लेकर वे तमाम सवाल फिर सामने आ गए हैं, जो आठ साल पहले उस खुले खत में उठाए गए थे। चैटजीपीटी ऐसा बहुत कुछ कर सकता है, जिसे पहले इंसान ही कर सकते थे।
वह इंसान की तरह सोचता है, उसी की भाषा में बोलता है, सवालों के जवाब भी उसी की तरह देता है और समस्याओं के समाधान भी वैसे ही बताता है।
कृत्रिम बुद्धिमता की नैतिकता को लेकर बहुत सारे सवाल शुरू से ही उठाए जाते रहे हैं, वे सारे सवाल तो अपनी जगह हैं ही।
इस बीच एक नई चिंता भी उठ खड़ी हुई है, वह है इसकी वजह से पैदा होने वाली बेरोजगारी का सवाल। डर है कि चैटजीपीटी जैसी व्यवस्थाएं अगर और विकसित हुईं, तो पढ़े-लिखे लोगों के वैसे रोजगार कम हो जाएंगे, जिन्हें ‘ह्वाइट कॉलर जॉब’ कहा जाता है।
हालांकि, यह कहा जा रहा है कि इससे कई तरह के रोजगार भले ही कम होंगे, लेकिन रोजगार के कई नए अवसर भी पैदा होंगे। ठीक वैसे ही जैसे एक दौर में कंप्यूटर ने किया था।
बहुत से लोग जब मान बैठे थे कि इससे रोजगार के अवसर कम होंगे, तो ऐसे अवसर दरअसल बढ़ गए, क्योंकि कंप्यूटर ने उत्पादकता को बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को एक विस्तार दे दिया था। तर्क है कि यही काम कृत्रिम बुद्धिमता भी कर सकती है।
मगर कोविड महामारी के बाद की दुनिया में इस तरह के तर्क लोगों को बहुत आश्वस्त नहीं कर पा रहे। खासकर तब, जब महामारी के दौरान बेरोजगार हुए लोगों की एक बहुत बड़ी फौज आज भी अपनी रोजी-रोटी की तलाश में भटक रही है। और, एक बार फिर एआई पर रोक लगाने की मांग उठने लगी है।
क्या सचमुच इस पर रोक लग सकती है? एआई से बहुत पहले जेनेटिक इंजीनियरिंग के मानव पर प्रयोग के खिलाफ बहुत कुछ कहा, सुना और लिखा गया था। वैज्ञानिकों में इसे लेकर एक आम सहमति भी बनती दिखाई दी थी। फिर भी इसे रोका नहीं जा सका।
विज्ञान और तकनीक की छोटी-बड़ी लहरों को इस तरह रोकना संभव भी नहीं होता। सभी को लगता है कि अगर उसने तकनीक विकसित नहीं की, तो कोई दूसरा इसका फायदा उठा लेगा।
नतीजा यह होता है कि सभी उसे विकसित करने में जुट जाते हैं। एलन मस्क जैसे वे लोग भी, जो शुरू में उसके विरोधी होते हैं। वैसे भी ज्ञान किसी भी तरह का हो, उसके विकास को रोकना खतरनाक भी हो सकता है और प्रतिगामी भी।
समस्या वैसे पूरी तरह से विज्ञान और तकनीक की है भी नहीं। समस्या उस सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की है, जो हमने बना ली है। लंबे दौर तक दुनिया को आश्वासन देने वाला एक आर्थिक सिद्धांत था, जिसे ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ कहा जाता था।
यह सिद्धांत कहता था कि जब विकास तेजी से होगा, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढे़गा, तो उसके फायदे छन-छनकर नीचे सभी लोगों तक पहंुचेंगे ही। सूरज जब बीच आसमान पर चमकेगा, तब उसकी रोशनी हर कोने तक पहुंच जाएगी।
मगर पिछली एक सदी के अनुभव ने यह बता दिया है कि दुनिया के बहुत से अंधेरे कोने अभी तक रोशनी की बाट जोह रहे हैं; जबकि इस बीच तरक्की भी खूब हुई है और जीडीपी में वृद्धि भी काफी तेजी से हुई है।
इसे हम अपने देश में ज्यादा अच्छी तरह से देख सकते हैं। उदारीकरण के बाद से अब तक हमने विकास का एक लंबा दौर देख लिया है। इस विकास के लिए एक और शब्दावली का प्रयोग किया जाता है- जॉबलेस ग्रोथ, यानी विकास का ऐसा दौर, जिसमें जीडीपी के आंकड़े तो बहुत तेजी से बुलंद हुए, लेकिन उस अनुपात में रोजगार के अवसर नहीं बढ़े।
सिर्फ इतना ही नहीं हुआ। तकनीक के कारण बढ़ी उत्पादकता और विकास दर से आई समृद्धि चंद लोगों के हाथ ही सिमटी रही है। समृद्धि का यह हिमपात सिर्फ ऊंची चोटियों तक सीमित रहा, नीचे तलहटी तक इसकी सर्द सिहरन और कंपकंपी ही पहुँची।
धन का यह केंद्रीकरण उस दौर में कुछ ज्यादा ही बढ़ा है, जिसे हम साइबर युग कहते हैं। इस दौर में गरीबी भले ही कई जगहों पर घटी हो, लेकिन विषमता बढ़ी है।
यही कारण है कि एआई की पदचाप बहुत से लोगों में खौफ पैदा करती है। लोग ऐसे दौर की कल्पना करते हैं, जब ज्यादातर जगहों पर सिर्फ मशीनें काम करेंगी और ज्यादातर लोग सिर्फ बेरोजगार होंगे। बेशक, यह सिर्फ एक खौफनाक यूटोपिया है और शायद ऐसा होगा भी नहीं, लेकिन हमारे पास जो वर्तमान है, और जो भविष्य दिख रहा है, उसमें इसके विरुद्ध खड़ा कोई ठोस आश्वासन भी तो नहीं है।
यह आशंका तब और डराती है, जब कुछ अर्थशास्त्री ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ की बात करते हैं। इसका अर्थ यह है कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो सभी लोगों को सरकार की तरफ से एक निश्चित रकम या आमदनी दी जा सकती है, ताकि उनका गुजारा चल जाए।
क्या अंतिम आदमी तक खुशहाली पहुंचाने के सपने से अब अर्थशास्त्र ने भी नमस्कार कर लिया है? विषमता दूर करने और अंतिम आदमी तक खुशहाली पहुंचाने के नए रोडमैप की जितनी जरूरत हमें आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी।
क्या इसकी तलाश का काम भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के हवाले ही करना पड़ेगा?





