
नरेंद्र कुमार मौर्य
मशहूर चित्रकार अवधेश वाजपेयी ने हरिशंकर परसाई पर शानदार चित्र बनाए और राजकमल प्रकाशन ने उनका कैलेंडर बना दिया. आज इसका विमोचन था सो हम भी पहुंचे. पहली बार अवधेश जी से मिलने का मौका मिला. अवधेश जी जितने बड़े चित्रकार हैं, उतना ही अच्छा लिखते भी हैं. उन्होंने अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा. जो सबके दिलों में उतर गया. उसमें चिंतन मनन और जानकारी की जो गहराई थी उसने चकित कर दिया. बीज वक्तव्य राजीव कुमार शुक्ल का था. वे बहुत अच्छा बोलते हैं. उन्हें पहले भी सुना है. मुख्य व्याख्यान डाल्टनगंज से आए इप्टा के शैलेंद्र जी का था. उन्होंने भी ग़ज़ब कर दिया. बहुत ख़ूब बोले और आज के दौर में परसाई जी के लेखन की प्रासंगिकता को रेखांकित किया.
कितने ही नये लोगों से मुलाक़ात हुई. उनमें विवेचना के अरुण पांडे, प्रहलाद अग्रवाल, विवेक श्रीवास्तव, प्रशांत शामिल हैं. भाई देवेंद्र सुरजन, राजीव कुमार शुक्ल और दिनेश चौधरी सपत्नीक आए थे, उनसे मिला. फिर केके नायकर, राजेन्द्र दानी, पंकज स्वामी, विवेक चतुर्वेदी, हिमांशु राय, नरोत्तम, तरुण गुहा नियोगी आदि से मिला. हो सकता है कई नाम छूट रहे हों, उम्मीद है वे मुझ जैसे भुलक्कड़ को माफ़ कर देंगे.
एक शानदार आयोजन में शामिल होकर और सबसे मिलकर अच्छा लगा.
अब अपनी एक ग़ज़ल अवधेश वाजपेयी नाम के इस नायाब चित्रकार को समर्पित करता हूँ. आप भी देखें ग़ज़ल में पेंटिंग कैसे की जाती है-
नहीं तस्वीर में कोई कमी हो,
बनाओ होंठ तो उनमें हंसी हो.
चलो इक घर पहाड़ी पर बनाएं,
उसी घर में कहीं बहती नदी हो.
करीने से मिरा हुजरा बनाना,
दरीचे से झलकती रौशनी हो.
वहीं पर हम बड़ा पौधा लगा दें,
वो जिसकी डाल फूलों से लदी हो.
रसोई से धुआँ उठता दिखाओ,
वहाँ रोटी बनाता आदमी हो.
बड़ा आंगन जहाँ उड़ते परिंदे,
वहीं पर बीच में ढोलक रखी हो.
खड़ी हो नाजनीं दर पर हमारे,
मगर गोरी नहीं वह सांवली हो.
मुसाफ़िर के लिए रस्ता बनाओ,
मगर उसमें ग़ज़ब कारीगरी हो.
रखो तुम मेज पर क़ागज न कोरा,
उसी में दर्ज अपनी शायरी हो.





