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बाबा जी लोगों का खेल खतरनाक है, सावधान रहने की ज़रूरत है

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बागेश्वर बाबा हों या बाबा राम रहीम हों या आसाराम हों. सब हमारे बीच की ही उपज हैं तो ये मत समझिए कि हमने धर्म को गाली दे दी. बाबा को गाली दे दी और अपना काम हो गया. इसकी जड़ें गहरी हैं और हमारी ही साइकोलॉजी में फंसी हुई हैं जो फेसबुक पर आलोचना कर देने से खत्म नहीं होंगी.

ये सब जो व्हाट्सऐप के मैसेज शेयर कररहे हैं न लोग कि जब रेपिस्ट को सजा नहीं मिले तो दीये जलाते हैं और सजा मिलते ही शहर जलाते हैं. इस तरह के संदेशों से ऊपर उठिए. हम और आप भी इसी भीड़ का हिस्सा हैं. 

इतने सतही हैं हम लोग तभी बाबा लोग मजे ले लेते हैं. करोड़ों डकार जाते हैं और हम लोग मजे से आस्था और पता नहीं क्या क्या चैनल देखते रहते हैं. आप ये मत कहिए कि आप नहीं देखते. आप नहीं देखते हम नहीं देखते तो देखता कौन है चलता कैसे है. 

बाबा जी इतनी फिल्में बना लेते हैं जिसमें कुछ नहीं तो दो चार करोड़ खर्च हो जाता है. कहां से आता है. सोचना चाहिए. लेकिन हम आप सोचेंगे नहीं क्योंकि हमको तो वाट्सऐप का संदेश ही फॉरवर्ड करना है. 

आज बाबा का मसला है कल कोई और मसला होगा निंदा करने के लिए. कुछ नहीं तो भारतीय धर्म का कोई त्योहार होगा. तीज हुआ तो पुरुषों को गरिया लीजिएगा. ऐसे ही सतहीपने से चलता रहेगा हमारा आपका.

खैर मैं जो मुद्दे की बात कह रहा था वो ये है की ज्यादातर मामलों में ये बाबा लोग उन्हीं इलाकों में सक्रिय होते हैं या लोकप्रिय होते हैं जहां मिडिल क्लास बढ़ रहा हो. ज़ाहिर है कि गुजरात पंजाब हरियाणा में ज्यादा उभार हुआ. ये काम यूपी बिहार में कम हुआ क्योंकि वहां जनता ही गरीब थी. गरीब जनता आध्यात्मिक हो जाती है. बाबा उनके लिए अध्यात्म वाले हो जाते हैं. 

जनता के पास पैसा होता नहीं है तो बाबा की प्रोग्रेस भी कम हो पाती है. गुजरात में, हरियाणा में ऐसा नहीं है. जनता के पास पैसा है. पहचान नहीं है. इसको ऐसे देखिए किसी शहर में मिडिल क्लास बढ़ रहा है. उसके पास पैसा बिजनेस का है पढ़ाई का नहीं है तो उसे पहचान चाहिए क्योंकि गल्ले पर बैठ कर पहचान तो मिल नहीं रही. पैसा भले मिल रहा है.

ऐसे में बाबा लोग काम आते हैं. आपको एक पहचान देते हैं. धंधे की बेइमानी का एक हिस्सा बाबा को देकर साइकोलॉजिकल छुट्टी मिलती है कि गलत नहीं किया. 

बाबा राम रहीम के मामले में लोग कह रहे है कि दलित समुदाय है तो क्या दलित समुदाय के पास पैसा नहीं है. है पैसा. पैसा नहीं होता तो बाबा के पीछे अठारह सौ गाड़ियां नहीं आती.

बिहार में दलित समुदाय के पास पैसा ही नहीं है तो कोई बाबा भी नहीं है. अंबेडकर जी हैं. वो कहते हैं संविधान पढ़ो. वो फिल्म थोड़े बनाते हैं लव चार्जर. बाद बाकी साइकोलॉजी वाला कोई बताएगा कि मास हिस्टीरिया क्या होता है. 

ये मास हिस्टीरिया छोटे स्तर पर आपको रॉक स्टारों की महफिल में दिख जाएगा वही ब्रिटनी स्पीयर्स और मैडोना के में तो बड़े स्तर पर ये बाबा लोग हैं और सबसे खतरनाक तो नाज़ी जर्मनी का उदाहरण है ही……

ऐसा ही है बाबा लोगों का खेल भी. कुछ पढ़े लिखे लोगों को देखा कि बाबा का सपोर्ट भी कर रहे हैं. ये सब चंपक लोग हैं. इनका काम ही है दूसरे लोगों को मूर्ख बनाना. ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए हम सभी को.

मैं कई बार मूर्ख बना हूं बाबा लोगों के चक्कर में. मैं बाबा लोगों के पास जाता हूं. उनकी राय भी मांगता हूं लेकिन मेरा उसूल है कि कहां तक राय माननी है और कहां पर रूकना है. अध्यात्म में रूचि है. कुंभ मेला हर चार साल पर जाता हूं. गंजेड़ी बाबाओं से लेकर जंगल में रहने वाले बाबाओं और ज्योतिषाचार्यों की भी संगत की है.

लेकिन धर्म को लेकर दिमाग साफ है वही करूंगा जहां तक किसी और को कष्ट न हो. 

वैसे अगर वाकई बाबाजी लोगों में रूचि है तो एक मानदंड है. माप लीजिए. जो बाबा किसी काम के बदले में पैसा मांगे वो फर्जी है. एकदम सिंपल हिसाब किताब है. 

अगर बिना मांगे आप पैसा दे रहे हैं और वो पैसा लेकर खुश हो रहा है तो भी बाबा ठीक नहीं है.

ये बाबा जी लोगों का खेल खतरनाक है. सावधान रहने की ज़रूरत है. बचिए मास हिस्टीरिया से. वाट्सऐप से तो जरूर बचिए. ये आपको बीमार नहीं बहुत बीमार कर रहा है है. ऐसा नहीं होता तो मेरे की पढ़े लिखे फेसबुकिया मित्र एक ही मैसेज शेयर नहीं कर रहे होते. कुछ तो अपने मन से लिख ही देते.

बाद बाकी ठीक है..अमरीका में भी बहुत बाबा लोग है. एक  बिक्रम योगा सिखाते थे. खूब पैसा बनाए. फिलहाल जेल में  है Jey Sushil #घोरकलजुग #डाटावाणी

Ramswaroop Mantri

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