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यथास्थितिवाद के अय्याश प्रेतों का उत्सव-काल

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पुष्पा गुप्ता

      _दुनिया बदलने की कुछ कोशिशों की विफलता से जो बुद्धिजीवी यह नतीज़ा निकाल लेते हैं कि दुनिया तो ऐसे ही चलती रहेगी , इसे बदलने की कोशिशें बेकार हैं, वे  इतिहास के खण्डहरों में छतों से लटके हुए बौद्धिक चमगादड़  हैं,  सत्ता के विचार-केन्द्रों और संस्कृति-प्रतिष्ठानों में दीवारों पर टँगी तस्वीरों के पीछे रहने वाली छिपकलियाँ हैं, शाही घरों के भव्य बैठकख़ानों में रखे एक्वेरियम में तैरती रंग-बिरंगी मछलियाँ हैं, मालिकों के प्यारे शरारती नन्हे-मुन्ने जेबी कुत्ते हैं।_

       जो कहते हैं कि समाजवाद एक त्रासद यूटोपिया है, एक विफल स्वप्न है, बीसवीं सदी का विफल प्रयोग है, वे पूँजीवाद के जर्जर ओवरकोट के पुरातन निवासी सुखी चिल्लर हैं, परजीवी पेटुओं के बावर्चीख़ाने में इधर-उधर दौड़ लगाते उल्लसित तिलचट्टे हैं, अँधेरे कोनों के निवासी परमसंतुष्ट आध्यात्मिक-दार्शनिक छछून्दर हैं।

      जो ज़िन्दगी के क्रूर निर्मम यथार्थ से अलग निष्कलुष सुन्दर शब्दों का जादू रचते हैं, वे सामूहिक सम्मोहन रचने वाले मायावी जादूगर हैं जो रुमाल से कबूतर निकालते हैं, अपनी घड़ी आपकी जेब में पहुँचा देते हैं और अपनी मानसिक बीमारियों और अपराध-बोध  को आपके दिमाग़ में रोप देते हैं।

ये ऐसे वैयाकरण हैं जो भाषाशास्त्र का ऐसा नया विधान रचते हैं कि लोगों को यथार्थ विभ्रम लगने लगता है और विभ्रम यथार्थ।

      ऐसे सभी बुद्धिजीवी बहुत शातिर उठाईगीरे होते हैं जो शब्दों, मुद्राओं, रूपकों, बिम्बों की चमक से आपको चमत्कृत और अभिभूत करके आपकी चेतना के भूगर्भ-कक्ष में आवाजाही करने लगते हैं और कभी-कभी रात को रुकने लगते हैं। फिर बड़ी कुशलता से, एक-एक करके वे आपकी सारी तर्कणा, आपकी स्मृतियों, सपनों, कल्पनाओं को गायब कर देते हैं और उनकी जगह मिलते-जुलते रंग-रूप वाले मिथ्याभासों को रख देते हैं। वे बाहरी हवा और रोशनी और मौसमों के रंगों और ध्वनियों को आपके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह बताते हुए सारी खिड़कियों और रोशनदानों को बंद करवा देते हैं और आपको अँधेरे का इसक़दर आदी बना देते हैं कि रोशनी की एक लकीर भी ग़लती से भीतर आ जाये तो आपकी आँखों में सुई की तरह चुभ जाती है।

       युवाओं के बीच दिमाग़ी और सांस्कृतिक नशे की गोलियाँ और इंजेक्शन ये उसी तरह बेचते हैं, जैसे कालेजों-स्कूलों के बाहर ड्रग्स बेचने वाले छात्रों को अपने जाल में फँसाते हैं।

इनका सौन्दर्यशास्त्र एक बीमार, बर्बर, क्रूर और वीभत्स सौन्दर्यशास्त्र है जो हत्यारे के छुरा भोंकने के कौशल, टेबल पर सजाये गये स्त्रियों के यौनांगों और पाखाने की गोलियों को खेतों-मैदानों में लुढ़काते गुबरैलों के कला-कौशल में सौन्दर्य का संधान करता है।

       ये गंद में लोटते सूअरों की तरह खाये-अघाये लोग हैं। ये पूँजी के कोठे की मालकिन के टुकड़ों पर पलने वाले सांस्कृतिक भँड़वे और दल्ले हैं। इनकी नफ़ासत, तहज़ीब, ज़ुबान और लिबास से धोखा खाने की ज़रूरत नहीं है। 

       जितने भी सोशल डेमोक्रेट्स, बुर्जुआ लिबरल्स, एनजीओ के टुकड़खोर सुधारवादी, पुराने समाजवादी पजामे के नाड़े और गाँधीवादी खण्डहरों-बावड़ियों के निवासी ब्रह्मराक्षस हैं, जितने भी नववामपंथी और उत्तर-चुत्तरवादी टाइप ओझा-गुनी, पण्डित-पुरोहित हैं, जितने भी पद-पीठ-पुरस्कार-सम्मान के लोभी मंगन और महापात्तर बाम्हन, भिखमंगे और चारण-भाट हैं, ये सभी इन्हीं श्रेणियों के लोग हैं।

 वीरेन डंगवाल से शब्द उधार लेकर कह सकते हैं कि ‘संस्कृति के दर्पण में मुस्काती इन शक़्लों को पहचानना’ होगा। जितना भ्रम में रहेंगे, जितनी देर करेंगे, इनके साथ जितनी उदारता, लिहाज और शराफ़त का बर्ताव करेंगे, उतना ही मँहगा पड़ेगा।

       ये विचारों के जेबकतरे, सपनों के हत्यारे, कल्पनाओं के बहेलिया हैं। सत्ताधारियों के बौद्धिक भाड़े के टट्टू हैं, व्यभिचारी, विलासी, लंपट और दारूकुट्टे हैं। इनमें से सोशल डेमोक्रेट्स और संसदीय जड़वामनों के बौद्धिक अनुगामियों के अतिरिक्त,  बचे हुओं में से सत्तर प्रतिशत भूतपूर्व क्रान्तिकारी वामपंथी हैं, वर्ग-संघर्ष के मैदान से पूँछ उठाकर या दबाकर भाग खड़े हुए कायर-कुण्ठित गीदड़ हैं।

       ये छँटे हुए “शरीफ़” बदमाश होते हैं, ऊँचे दर्जे की हरामी चीज़ होते हैं। लिहाज़ा जो भी इनकी ज़्यादा संगत करेगा वह उस ख़तरनाक वायरस से संक्रमित हो जायेगा जिसके कई म्यूटेंट्स/वैरिएंट्स सोशल डेमोक्रेसी, लिबरलिज़्म, पोस्ट-माडर्निज़्म, पोस्ट-मार्क्सिज़्म, आइडेंटिटी पालिटिक्स, एनजीओ रिफार्मिज़्म आदि-आदि के रूप में चारों ओर फैले हुए हैं।

       संस्कृति की गंगा में भी पूरे देश में  फूली हुई लाशें उतरा रहीं हैं और ऊपर आसमान में गिद्ध-चील-कौव्वे मँड़रा रहे हैं। बहुत सफ़ाई की ज़रूरत है। बहुत मेहनत की ज़रूरत है!

Ramswaroop Mantri

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