शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी को बचपन की याद आ गई। मैं उनसे मिलने गया,तो देखा सीतारामजी ताश पत्तों का महल बना रहे थे।
मैने आश्चर्य से पूछा,यह आपको क्या हो गया है? यह बचकानी हरकत कर रहे हो?
सीतारामजी ने जवाब दिया,जब देश में विकास की रफ्तार और प्रगति की गति कागजी घोड़ों की शक्ति के वेग से नापी जाती है,तब ताश के पत्तों का महल बनाना कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं।
मैने का ताश के पत्तों का महल
तो मुंह से फुक ने से ही भरभरा के गिर जाता है।
सीतारामजी ने कहा ताश के पत्तों का महल प्रतीक रूप में बनाकर, मैं यही तो कहना चाहता हूँ।
कागजी घोड़ों की शक्ति के वेग से कागजी घोड़ों को सिर्फ कागज पर ही दौड़ाया जाता है।
नतीजा निम्न शेर में बयां होता है।
ग़ज़ब किया तिरे वअ’दे पे ए’तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
(शायर दाग़ देहलवी)
कोई शख्स ऐसा भी हो सकता है देश में,
वादा नहीं पयाम नहीं गुफ़्तुगू नहीं
हैरत है ऐ ख़ुदा मुझे क्यूँ इंतिज़ार है
(शायर लाला माधव राम जौहर)
गुफ्तुगु भी मन ही मन में वह भी अदृश्य होकर रेडियों के माध्यम से।
इसलिए आमजन के दुःखी होने का कारण शायर मिर्जा ग़ालिब के इस शेर में है।
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
बहुत से भक्त ऐसे भी हैं।
शायर शहरयार फरमाते हैं।
तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा
आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा
बहुत से लोग तंज करते हुए कहतेंं हैं।
कोई वा’दा वो कर जो पूरा हो
कोई सिक्का वो दे कि जारी हो
(शायर जमीलुद्दीन आली)
सीतारामजी की बातें सुनकर मैं समझ गया कि, वे पत्तों का महल क्यों बना रहें हैं।
व्यंग्य की बात सांकेतिक होती है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





