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ईसाई धर्म और पुनर्जन्म

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डॉ. विकास मानव

    _पुनर्जन्म सिद्धान्त केवल भारत में ही नहीं, विश्व के हर कोने में प्राग्-ऐतिहासिक काल से पाया जाता है । यह केवल हिन्दुओं तथा बौद्ध मत के अनुयायियों में ही नहीं, विश्व के अन्य धर्मों के अनुयायियों में भी पाया जाता है।_

परामनोवैज्ञानिक अन्वेषक रोज़मेरी ऐलन गिल्ली ( Rosemary Ellen Guiley) अपनी पुस्तक ‘ Encyclopedia of Mystical & Paranormal Experience’ ( ‘निगूढ़ एवं परासामान्य अनुभूति विश्वकोष’ ) में लिखती हैंः लोगों में सहस्रों वर्षों से पुनर्जन्म में विश्वास रहा है; यह धारणा विश्व के लगभग प्रत्येक खण्ड में एक न एक समय पर पनपी है।

    विश्व की आधुनिक जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई भाग पुनर्जन्म को किसी न किसी रूप में मूलभूत विश्वास (अवधारणा) के रूप में अंगीकार करता है जो कि हिन्दु, बौद्ध एवं बहुत सी जनजातियों में विशेषकर पाया जाता है।

   पुनर्जन्म में पाश्चात्य विश्वास कम है परन्तु 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसमें वृद्धि हुई है।

रोज़मेरी यह भी लिखती हैं कि बीसवीं शताब्दी में ईसाई देशों में पुनर्जन्म के विश्वास में लगभग एक रफ़तार से वृद्धि हुई है जो कि कुछ एक मतगणनाओं के अनुसार है।

    सन् 1969 में 12 देशों में की गई जार्ज गैलप व्यस्क मतगणना ( George Gallop Poll ) के अनुसार पुनर्जन्म में विश्वास की संख्या नीदरलैंड में 10 प्रतिशत से कैनेडा में 26 प्रतिशत तक की सोपान में रही। अमेरीका में 20 प्रतिशत और इंग्लैंड में 18 प्रतिशत मतगणना पुनर्जन्म के पक्ष में पाई गई।

     रोज़मेरी आगे लिखती हैं कि सन् 1981 के जार्ज गैलप मतगणना के अनुसार अमेरिका में पुनर्जन्म में विश्वास करने वालों की 3% की वृद्धि पाई गई अर्थात् 3 करोड़ 80 लाख ( 38 Million) व्यस्क पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे।

इस मत गणना के अनुसार, ईसाई मत के मुख्य घटकों के अनुयायियों में से लगभग एक चौथाई ने व्यक्त किया कि वे पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं — मैथोडिस्टस 26%, कैथोलिक्स 25% , लथूरनज 22% , प्रोटैस्टैंटज 21%।

      रोज़मेरी आगे लिखती हैं कि प्रशान्त महासागर के द्वीपों की सभ्यता में आदिवासी जनजातियाँ पुनर्जन्म में अटल विश्वास रखती हैं। वे द्वीप हैं : बाली ( इन्डोनेशिया), ओकेनावा ऐनु (उत्तरी जापान), तस्मेनिया (आस्ट्रेलिया), मोरी ( न्यूजीलैंड) तथा फिजी, न्यु कलेडोनिया साॅलोमन आईलैंड और मैकेनिज्म के निवासी।

उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी तथा मध्य अमेरिका की आदिवासी जनजातियाँ भी पुनर्जन्म में पूर्ण विश्वास रखती हैं।

     अफ्रीका के लोग न केवल पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं, यह भी विश्वास करते हैं कि मनुष्य मरणोपरान्त पशु, पक्षी, तिर्यक् या वृक्ष व दानव आदि की योनि भी धारण करता है। मानव जीवन के बाद पुन: मानव जीवन कम, अन्य योनियों मे जन्म की सम्भावना अधिक मानी जाती है।

       रोज़मेरी आगे लिखती हैं कि प्राच्य मिस्री लोग ( Egypitians) का विश्वास था कि मानव आत्मा पशु योनि ले कर अपने को परिष्कृत करती है मानव जीवन पुनः पाने से पहले तीन सहस्र वर्ष पशु आदि योनियों में रहना पड़ सकता है।

     सम्भवत: यूनानी कायाकल्प ( Metamorphosis) की अवधारणा मिस्री मानव से पशु योनि में जन्म की अवधारणा से ली गई है।

     हार्टली बी. ऐलैग्ज़ैन्डर ( Hartley B. Alexander) अपनी पुस्तक ‘North American Mythology of the Arctic Tribes (उत्तरी अमेरिका की आर्कटिक जनजाति)’ में कहते हैं कि किस प्रकार आत्माएं मानव और पशु के रूप में पैदा होती हैं तथा ”कईयों के बारे में ज्ञात है कि सम्पूर्ण पशु जगत् की योनियों में जन्म लेने के पश्चात मानव शरीर में लौटीं।”

       रोज़ मेरी पूर्व ईसाई दार्शनिक जस्टिस मार्टर (Justin Martyr c.100-165) को उद्धृत करते हुए लिखती हैं कि निकृष्ट मानव (ईश्वरीय व्यवस्था से) पशुयोनि में डाले जाते थे।

पुनर्जन्म जन्म सम्बन्धी घटनाओं के सम्बन्ध में रोज़मेरी कहती हैं कि जो पाश्चात्य लोग पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं उन्हें लिंग परिवर्तन आत्मा प्रगति के संदर्भ में मान्य है।

पुनर्जन्म में विश्वास विश्वव्यापी है। प्रो. सी.जे. ड्यूकस, अध्यक्ष प्रकाशन विभाग, अमेरिकन परामनोवैज्ञानिक संस्था, पादरी डब्ल्यू.आर. अल्गर की 1880 की पुस्तक ‘पुनर्जन्म सिद्धान्त की विवेचनात्मक समीक्षा’ (A Critical History of the Doctrine 0f Future Life) का हवाला देते हुए लिखते हैं कि उनका कहना है कि पुनर्जन्म में विश्वास रखने वालों की संख्या उस समय पूर्व में 600 मिलियन ( 60 करोड़ ) थी।

………………….

संदर्भ सूत्र :

1) Encyclopaedia of Mystical & Paranormal Experience (Pages 500-4).

   2) यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने, जो ईसापूर्व पञ्चम् शताब्दी में हुए, मिस्रवासियों की ओर प्रथम पुनर्जन्मवादी के रूप में संकेत किया है परन्तु स्वयं मिस्रवासी मानते हैं कि यह शिक्षा (पुनर्जन्म सम्बन्धी ज्ञान) अथाह पुरातन काल में पूर्व दिशा से आई थी। उनके अभिलेख वर्णन करते हैं कि किस प्रकार देव ओसाइरिस जो गूढ़ ज्ञान की प्रतिमूर्ति हैं, भारत से एक चित्रित बैल के रूप में मिस्र पहुँचे ।

— जो फिशर

(द केस फॉर रीइन्कारनेशन)

Ramswaroop Mantri

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