अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

कबूतरों के साथ द्वंद

Share

 पुष्पा गुप्ता

     सप्ताह भर कोहरे के बाद खिलखिलाती धूप में छत पर सुखाने के लिए गेहूं डालने के बाद, मैं अपने अन्य कार्य निपटाने कमरे के अन्दर आ गई। कुछ समय बाद सूखते हुए गेहूंओं को उलटने-पुलटने के उद्देश्य से मैं पुनः छत पर गई। ज्यों ही मैं छत तक पहुंचने वाली अंतिम सीढ़ी पर चढ़ी, त्यों ही कबूतरों का एक झुंड गेहूं चुग, भरभराकर उड़ा। पल-भर तो मैं समझ ही नहीं पाई कि यह क्या हुआ?

     _पर तितर बितर हुए गेहूं, और उन पर पड़ी बीट को देखकर मैंने अनुमान लगाया कि- कबूतरों से गेहूओं को बचाने के लिए पहरेदारी करने बैठना ही पड़ेगा। मेरे बैठते ही लगभग 25 से 30 निडर  कबूतरों का झुंड गेहूं पर बैठने का प्रयास कर ही रहा था कि मैंने उनके प्रयास को नाकाम कर दिया।_

       नाकाम होने के बाद भी वे शेर-दिल कबूतर गेहूं के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहे। ऐसा लगता था मानो वे मुझे मुंह चिढाकर कह रहे हों, तुम हमारा क्या बिगड़ लोगी?

 मैंने भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कबूतरों को गेहूं की पहुंच से दूर भगा दिया। मैं अब बड़े चैन के साथ बैठकर मोबाइल चलाने लगी।

      मोबाइल मोह में उलझा मेरा ध्यान, अचानक गेहूं की ओर गया, तो देखा- इस बार पहले की तुलना में दुगुने कबूतर गेहूं चुग रहे थे, उन घुसपैठियों को मारने का लक्ष्य लेकर मैं आंधी की तरह उनकी ओर दौड़ी।

      लेकिन वे पलक झपकते ही तूफान की तरह उड़ गये, मै “अपना सा मुंह लेकर रह गई”। कबूतरों का अदम्य साहस और पराक्रम देख मैंने “दांतों तले उंगली दबा ली”। बचपन में पढ़ी बहेलिया और कबूतरों की कहानी झूठी लगने लगी।  मैंने सूखते हुए गेहूंओं की ओर देखा तो मन बहुत द्रवित हुआ।

      गेहूंओं ने अपने पैर चादर से बाहर फैला दिए थे, लगता था चादर पर जितने गेहूं के दाने हैं उतनी ही कबूतरों की बीट है। गंदगी को साफ करने के उद्देश्य से मैंने शेष गेहूं धोकर पुनः सुखाने रख दिए। और बड़ी सतर्कता से शस्त्र रुपी डंडा हाथ में लेकर एक कमांडो की तरह तैनात हो, मैंने निगाह कबूतर रुपी दुश्मन पर टिका दी।

      लगभग 2 घंटे बाद मैं पानी पीने कमरे के अंदर गई। लेकिन “दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है” की तर्ज़ पर चालाकी दिखाते हुए मैंने गेहूं को चादर से ढककर कबूतरों से बचाने का पुख्ता इंतजाम कर दिया। मैं पानी पीकर तृप्त भी नहीं हो पाई, कि अपनी छत पर बैठी पड़ोसन की आवाजें आने लगी- कबूतरों ने गेहूं  खा दिए आदि।

       मैं छत की ओर भागते हुए सोच रही थी कि- मैंने तो कबूतरों से गेहूओं को बचाने का अभेद्य किला बनाया था, तो फिर उन्होंने कैसे उसे छिन्न-भिन्न किया होगा? इस प्रश्न पर विचार करने से पहले ही मैं पवन-वेग से छत पर पहुंच गई। और कबूतर भगाने लगी। परंतु इस बार मेरे उड़ाने पर भी कबूतर उड़े नहीं;  बल्कि मेरे द्वारा की गई किलेबंदी को धराशाई कर, ढकी हुई चादर पर ऊपर से ही चञ्चु-प्रहार से  छेद करके निडर होकर गेहूं चुगते रहे। पर मैंने भी अपना शस्त्र घुमाकर, जुबान की चाबुक  चलाकर उन्हें उड़ा दिया।

      बीच-बीच में मुझे हमारे पूर्वज राजा शिवि और दधिचि आदि जैसे दानवीरों की याद भी आई, पर मैं तो गेहूं-सुरक्षा के लिए राजा हरिश्चन्द्र के समान डंडा लेकर तैनात थी। और “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्”  का पालन कर रही थी। भगीरथ तपस्या के बाद भी लगभग दो-तीन किलो गेहूं बचा नहीं पाई।

       छत की रैलिंग और आस-पास लगे बिजली के खंभों व तारों पर बैठे सीमा-प्रहरी के समान कबूतर भी मुझ पर पैनी नजर बनाकर गेहूंओं पर धावा बोलने का मौका ढूंढ रहे थे। इधर मुझे भी कभी वे आतंकवादी, कभी उग्रवादी, कभी माओवादी, कभी विद्रोही आदि लगने लगे थे।

     कबूतरों की सुन्दरता के लिए सुनी बातें और विशेषण अब  झूठे लगने लगे। लगभग सूर्यास्त के साथ ही मेरे और कबूतरों के बीच छिड़ा “भोजन के लिए यह द्वंद” समाप्त हो गया।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें