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मेगास्थनीज की इंडिका और भारतीय आजीवक समाज

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 पुष्पा गुप्ता 

      _मेगास्थनीज मगध में यूनान का राजदूत था ।‌ उसने इंडिका लिखी ।‌ Indicà, India से बना है ।‌ जिस तरह ink मतलब स्याही होता है , उसी तरह Indian मतलब काला होता है ।‌इंडिया किसी देश का नाम नहीं है । यह यहां के रहने वाले लोगों के रंग का नाम है । बाद में इस देश को इंडिया  कहने लगे ।‌ गोरे लोग अपने स्कूल में जब पढ़ते होंगे तो ,इंडिया को काले लोग का देश समझते होंगे ,जैसे हम अफ्रिका को समझते हैं।_

    लेकिन भारत में – I love my india कह लोग – बाग काले लोग से घृणा करते हैं और शादी – ब्याह के लिए गोरी से गोरी और गोरा से गोरा लड़की – लड़का ढूंढ़ते हैं।‌ 

      वैसे ,मेगास्थनीज के समय इस देश का नाम मगध था । सवाल है कि क्या कारण है कि मगध जैसे शक्तिशाली राज के दरबार मे रहकर ,उसने इस देश का नाम मगध नहीं लिखा , इस देश के लोगों पर indica लिख डाला ।‌इससे सोचा जा सकता है कि राजदूत होने के बावजूद ,उसमें राजा के प्रति  और राजतंत्र के प्रति कोई सम्मान नहीं था।‌ वह यहां के लोगों के बारे में लिख रहा था । अजीब बात है कि यहां के इतिहासकार , उस समय के राजा के बारे में ज्यादा पढ़ते हैं , उस समय के लोगों के बारे में कम।

चंद्रगुप्त मौर्य की सत्यता जांचने के लिए इतिहासकार मेगास्थनीज को आधार स्तंभ मानते हैं ।‌ अगर मेगास्थनीज को हटा दिया जाए तो चंद्रगुप्त का कोई अस्तित्व नहीं है । पुरातात्विक तो बिल्कुल नहीं ।‌ एक महान भाषाशास्त्री कहते हैं कि ऋ और द्र शब्द पाली में है ही नहीं । बाद में ब्राह्मणों ने ऋ और द्र बनाया ।‌ इस तरह सोचे तो उस समय चंद्रगुप्त कोई था ही नहीं ,जो भी होगा ,चन्दगुपत मोरय  होगा ? पाली आम लोगों की भाषा थी और उनकी मानें तो यहीं सरकारी भाषा थी ।‌ सवाल है कि चंद्रगुप्त कोई था ही नहीं तो उसका नाम का अनुवाद sandrocottus कैसे हो गया ,इसमें भी तो dr है । इसी dr और द्र से साम्यता की वजह से इतिहास फिक्स कर दिए कि यहीं चंद्रगुप्त था।‌

       वैसे फिक्स होने से पहले इसपर काफी विवाद हुआ ।‌  लोगों ने कहा कि  sandrocottus ही चंद्रगुप्त कैसे हैं । इतिहास पढ़िए ,इसका authentic जवाब अभी भी आपको नहीं मिलेगा। 

       खैर ,चंद्रगुप्त का वंशज चला और उसी वंशज में एक हैं महान अशोक ,जिसके authenticity के लिए मेगास्थनीज की तरह कोई तीसरा स्रोत नहीं है , पहला और आखिरी स्रोत अशोकावदान है जिसे एक ब्राह्मण ने संस्कृत में लिखा है ।  अब इस अशोक पर दलित लट्टू रहते हैं ।‌ वे सोते जागते इसी अशोक  राज की यूटोपिया रचते हैं और  स्वपन देखते हैं ! 

मेगास्थनीज ने इंडिका लिखा और उसका मूल स्वरुप नष्ट हो गया । उसके कुछ अंश उसके चेले अपने किताब मे उद्धृत किए और बताया कि मेगास्थनीज अपनी इंडिका में यह लिखा ,वह लिखा । इतनी सी बात को लोग eloborate. कर इतना बड़ा इतिहास बना डाले।‌

वहीं लोग जिनके पास अपनी कोई ऑथेंटिसीटी नहीं है ,पूछते हैं कि आजीवकों के इतिहास कहां मिलेगा ,कहां लिखा है ,इसका प्रमाण क्या है ! उसके ग्रंथ कहां है , उस धर्म में पुरोहित कैसे बनते हैं ! 

      _मेगास्थनीज ने दो बाते लिखी पहली कि इंडियन लोग में लिखने का हुनर नहीं विकसित हुआ था ,वे लोग लिखना नहीं जानते थे । बात सही भी है ,अशोक से पहले हमें किसी चीज का लिखित पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता । मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिलता है । लेकिन अशोक और हड़प्पा युग में कम से कम १००० साल का फासला है ।‌ हड़प्पा युग वाले लिखते भी होंगे तो अपनी लिपी भूल गए होंगे । इसी लिए तो आजकल उन्हें कोई पढ़ नहीं पाता।‌_

       मेगास्थनीज ने सही लिखा है कि उस समय भारतीय को लिखना नहीं आता था । लेकिन उसके साथ उसने लिखा है कि इंडियन समाज मे सात वर्ग थे । मतलब उसे यह नहीं पता था कि इंडियन समाज में कोई वर्ण – व्यवस्था थी और उसके केवल चार ही वर्ग थे ।  यहीं ब्राह्मणवादी इतिहासकार फंस जाते हैं और तरह – तरह की बात बनाने लगते हैं ।‌वे कहते हैं कि मेगास्थनीज विदेशी था ,उसे यह पता नहीं था कि यहां के समाज में चार वर्ण हैं ।वे अपने समाज के हिसाब से हीं यहां के लोगो को देखता था।

   अर्थ यह हुआ कि अपने वर्ण – व्यवस्था का पक्ष रखने के लिए  मेगास्थनीज पर ही सवाल खड़ा कर देते हैं ।‌ यह काम रोमिला थापर ने भी  किया है।‌

_मेगास्थनीज इंडियन समाज  को सात  भागो में बंटा हुआ देखता है :_

1 – philosopher – दार्शनिक 

2 – cultivator – कृषक 

3. Herdsmen – पशुपालक 

4.   Artisan and trader – कारीगर और व्यापारी ,यानी जो कारीगर था वहीं व्यापारी था।

5.soldier – सैनिक 

6.oversser – अधिदर्शक यानी निर्माण कार्य का मुआयना करने वाले 

7.councillor – परिषद सदस्य ,काउंसलर होंते थे मतलब निर्णय की शक्ति केवल राजा में केंद्रित नहीं थी । हो सकता है कि गणतंत्र पूरी तरह खत्म नही हुआ हो।‌

सोचने वाली बात है कि यह समाज के सात विभाग केवल आजीवक समाज का था । इसका प्रमाण जैन और बौद्ध ग्रंथ देते हैं । वे कहते हैं कि आजीवक पूरन कश्यप समाज को सात भाग में बांटता है । समाज के सात विभाग प्रकृति के सात रंग के आधार पर है।  

श्वेत रंग – दार्शनिक आजीवक  के लिए चाहे वह पुरूष हो या महिला.

 धवल ( supreme white ) – उनके लिए जो आजीवक धर्म की महान हस्तियां थी जैसे मक्खली गोसाल , किस्स संकिच्च , नंद वच्च.

 हरा रंग  -आजीवक  गृहस्थ के लिए.

काला रंग -जो कसाई  पेशा अपनाता , जैसे मछली मारना ,सूअर मारना , भेड़ मारना ,हत्या करना , जल्लाद , शिकारी , कैद करने वाले.

ब्लू रंग :- बौद्ध जो चोर की तरह रहते थे ( भिक्षा मांगना धन का अपहरण करना ही है ,चौर्य कर्म ही है ) ,चोर जो कर्म में विश्वास करते थे । अर्थात आजीवक कर्म में विश्वास करने वाले को चोर कहते थे ।‌ उनके लिए ब्लू रंग यानी नीला रंग तय किए थे। 

लाल रंग – निग्रंथों के लिए तय किए जो केवल एक वस्त्र यानी लंगोट पहनते थे। इस हिसाब से देखे तो लाल लंगोट पहनने वाले हनुमान जी जैन हुए , उन्हें महावीर भी कहा जाता है।

वैसे यह विभाग जैन और बौद्धों ने पूर्ण कश्यप का नाम लेकर बुराई करने के लिए कहा है । आजीवक समाज बौद्धो और जैनियों से पुराना समाज है।    

     _सवाल है कि जब आजीवकों के समय जैन और बौद्ध थे ही नहीं तो आजीवक उनका क्लासिफिकेशन क्यों करते । चूंकि जैन और बौद्ध यह दिखाना चाहते थे कि कि आजीवक हमें बुरा- भला  कहते हैं और उन्होंने हमारा भी क्लासिफिकेशन किया है । इसलिए उन्होंने रंगो के आधार पर समाज का वर्गीकरण किया । सवाल यह है कि रंग के आधार पर सात विभाजन होते ,छ : और पांच क्यों ?_

         इस सवाल का जवाब मेगास्थनीज के समाज के सात वर्गों में विभाजन से मिल जाता है । यह भी स्पष्ट है होता है कि समाज में सात विभाजन वाला समाज ,आजीवक समाज था ।‌ इसका प्रमाण एक और है । आप बराबर की पहाड़ी पर जाइएगा तो वहां सतघरवा गुफा भी है ।‌ यह सतघरवा मतलब सात घर समाज के सात विभाग हीं हैं ।‌ आजीवक हर चीज को सात भाग में बांटते थे।

       इसलिए उन्होंने सात दिन के सप्ताह बनाए ।‌ सात प्रकृति के रंग है ,इसलिए इसपर सवाल मत कीजिए की सात ही क्यों बनाए। सात मिलकर सफेद होता है और सफेद मतलब उजाला और उजाला का मतलब दिन। अगर ब्राह्मणवाद रात है तो आजीवक दिन।

Ramswaroop Mantri

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