रेंग रहे हैं इस धरती पर
मानव रूपी ऐसे कीड़े
जो डरते हैं संघर्षों से
जो घबराते तूफानों से
ढूंढ रहे हैं ऐसा कोना
जहां न हो जीवन का रोना।
ऐसे ढोंगी ऐसे कायर
आंहे भरे कराहे पालें
इस आशा में रहे भटकते
पा जाएं सुख सुविधा दौलत
मोल बिना, बिन हाथ हिलाए
सुख घर बैठे भागा आए।
यह सब बातों के व्यापारी
सुंदर शब्दों के अधिकारी
जहां-तहां से चोरी करके
घटिया- घटिया भाव जुटाते
उन्हें ओढ़ते उन्हें बिछाते
उन पर अपनी सेज सजाते
ये घटिया , ये बोने लोग
है इनको बातों का रोग।
–मैक्सिम गोर्की





