संजय वर्मा
विज्ञान दिवस पर सभागृहों से लगाकर अखबारों तक इसका कहीं कोई जिक्र नहीं , इसलिए क्योंकि सौतेले बेटे से काम पूरा लिया जाता है पर उसे सम्मान नहीं दिया जाता , प्यार नहीं किया जाता। प्यार तो हम भावना से करते हैं । विज्ञान तर्क करता है , भावना के आड़े आता है , असुविधा जनक प्रश्न उठाता है । हम मिथकों के आगोश में कहानियों की थपकियों के सहारे सुकून से सोना चाहते हैं , विज्ञान बेदर्द नशे का दुश्मन है । तो इसलिए हम उसे इस्तेमाल कर लेते हैं , श्रेय नहीं देते । विज्ञान को गरियाने के लिए हम विज्ञान के ही बनाए हुए माइक और वीडियो का इस्तेमाल कर लेते हैं । बीमार होते हैं तो उसके पास जाते हैं , स्वस्थ हो कर कहीं और मत्था टेक आते हैं । कितना सुकून है वो ज़माना भूलने में , जब हजारों लोग हैजे से मर जाते थे । चेचक , टी बी तो बहुत बड़ी बात है , एंटीबायोटिक के आविष्कार से पहले मामूली घाव होने पर भी लोग मर जाते थे । कोरोना में कोई चमत्कार काम नहीं आया, अब हम बच गए हैं , तो उसके लिए कहानियां गढ़ ली हैं ।

नए बच्चे इंजीनियरिंग डॉक्टरी की पढ़ाई करते हैं ताकि नौकरी मिल जाए फिर अपने अंधविश्वासों की आरामगाह में लौट जाते हैं । मेरे एक मित्र की इंजीनियर बेटी ने एक दिन मुझे सुहाग चिन्हों से बीमारी दूर करने का विज्ञान समझाया ।
अच्छी बात यह है , कि इसके लिए सिर्फ पुरानी सोच वाले अंधविश्वासी और रूढ़िवादी लोग ही नहीं बल्कि नए जमाने के पर्यावरणविद चिंतक और लेखक भी शामिल हैं ।आबोहवा की चिंतन बैठक में ये लोग उन्हीं हवाई जहाजों से पहुंचते हैं जिनसे पैदा हुए प्रदूषण का रोना हमेशा रोते हैं । लेखक बरसों से लिख रहे हैं – बहुत हुआ , अब प्रकृति की ओर लौटना चाहिए ; पर इस संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए कीबोर्ड कंप्यूटर मोबाइल का सहारा लेते हैं । सबको सुख भी चाहिए , गरियाने की सुविधा भी ।इसमें कोई नई बात नहीं है । दुनिया हमेशा से ऐसी ही थी । लोगों ने गैलीलियो से माफी मंगवाई , तर्क की बात करने वालों को जिंदा जला दिया ।
इस घटा घोप में ,पता नही वो कौन लोग थे जिन्होंने संविधान की धारा 51 ए में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने को नागरिकों का कर्तव्य बताया । आज जब हर ओर चमत्कारों का जय घोष है , संविधान के इस प्रावधान पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ।
अपनी रोम यात्रा के दौरान मुझे एक गाइड आंखे झुका कर बता रही थी कि हम यूरोप वाले चौथी शताब्दी से लेकर करीब एक हजार साल तक अंधविश्वासी और अज्ञानी रहे । हमने औरतों को डायन कहकर जलाया , जादू टोने किए । यह हमारा डार्क एज था । फिर एक दिन कुछ लोगों को ज्ञान विज्ञान की किताबें मिली, वे रेनेसां के जरिए विज्ञान तक लौटे । मुझे उसकी बात आज इसलिए याद आई कि डार्क एज की भी एक एज होती है ।
मेरे प्यारे विज्ञान तुम्हारा टाइम आएगा।




