शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी ने मुझे रंग लगाया और व्यंग्यात्मक में शब्दों कहा, बुरा मानो तब भी होली है।
सीतारामजी ने कहा आज संकीर्ण विचारों को आत्मसात करने वाले अधिनायकवादी अमले ने आमजन की बोली पर ही हमला बोला है।
मैने सीतारामजी के समर्थन में प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी यह शेर पढ़ा।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
सीतारामजी ने कहा अब आह भरने का समय है।
अब मुल्क के रहबरो आइना दिखाना की जुर्रत करना है।
इस मुद्दे शायर दुष्यंत कुमार का यह शेर प्रासंगिक है।
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो
इस बहकती हुई दुनिया को संभालने के लिए यकायक इस फिल्मी गीत का स्मरण हुआ।
सन 1961 में प्रदर्शित फिल्म रामू दादा के इस गीत को लिखा है,गीतकार मजरूह सुलतानपुरी ने।
बम बबम बबम बम बम लहरी
लहर लहर नदिया गहरी
जीवन नदिया बहती जाए
शाम सवेरे दोपहरी
गीत की निम्न पंक्तियों में आमजन को आगाह किया है।
नाव चला मत मस्ती में
तुफानो की बस्ती में
लोभ की मारी दुनिया वाले
नाग है तेरी कश्ती में
इनका काटा पानी न मांगे
दुनिया है इतनी ज़हरी
वर्तमान में नफरत का जो माहौल पैदा किया जा रहा है। इस माहौल पर निम्न पंक्तियों में संदेश है।
नफ़रत से मन क्यूँ है भरा
“प्रेम से मिल इंसान ज़रा
वर्तमान में आमान को जो कोरे सब्जबाग दिखाए जा रहें हैं। इन सब्ज़बागों से सावधान करती निम्न पंक्तियां है।
जग की बाते दूर के ढोल
कान तेरे कच्चे मत खोल
आत्मा तेरी गूंगी बहरी
बम बबम बबम बम बम लहरी
अंत में शायर अनवर जलालाबादी का निम्न शेर एकदम सटीक है।
चिरागों कब हवा की दोगली फितरत को समझोगे
*जलाती है यही तुमको यही तुमको बुझाती है
होली के अवसर पर खास पेशकश।
शायर: हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था
मेरी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था…
शायर की बेगम: का जवाब
तुम तो थे ही गधे, तुम्हारे भेजे में कहां दम था
वहां कश्ती लेकर गए ही क्यों, जहां पानी कम था…
बुरा भी मानो तो मेरी बला से। आज वाकई लोकतंत्र की कश्ती को बचाना अनिवार्य हो गया है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





