अग्नि आलोक
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आधारभूत चिंतन : ज्योतिषी वह है, जिसमें ज्योति है!

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ज्योतिषाचार्य पवन कुमार

ज्योतिषी कौन है ? जिसमें ज्योति है। ज्योतियुक्त है. ज्योति क्या है ?
ज्यो धातुभ्वादि आत्मने ज्यवते. (मार्गदर्शन करना, परामर्श देना अर्थ वाली) + क्तिन् प्रत्यय = ज्योति। ज्योति का अर्थ हुआ-मार्गदर्शक/गुरु। बिना प्रकाश के मार्ग दिखायी नहीं पड़ता। बिना ज्ञान के जीवन में गति नहीं होती। इसलिये जो ज्ञान/ प्रकाश से युक्त है, वह ज्योतिषी है।
जब अन्तःकरण प्रकाशयुक्त होता है तो वह ज्योतिष कहलाता है। ज्योतिष भीतरी आँख है। इसे वेदों की आँख कहा गया है। यह आँख जिसके पास है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। यह आँख जिसमें नहीं है, वह अन्धा है। अन्धे का कथन मिथ्या होता है। अन्धे द्वारा किया गया वेदार्थ अविश्वसनीय है।

संसार में अन्धे बहुत हैं। ये जन्मान्ध नहीं हैं। इनकी आँखों में अहंकार की अपारदर्शी झिल्ली चढ़ गई है। अहं के मोतियाबिन्द से ग्रस्त ये भी प्रणम्य हैं। मैं इन्हें प्रणाम करता हूँ। राम नाम लेने वाला संत इस रोग का चिकित्सक है। अहंकारी ऐसे वैद्य से दूर भागता है।
ऐसा वैद्य जो नाम जप रूपी औषधि से अन्तर्चक्षुओं का अन्धत्व मिटाता है, वह गुरु है। गुरवे नमः।
ज्योति शास्त्र (ज्ञान काण्ड) में रुचि रखने वाले के पास ज्योति होती है। ज्योति कहते हैं, दीप को। यह दीप प्रकट ब्रह्म है। श्री. पं. जी महाराज के निकट दीप जलता रहता है। सम्प्रति #व्यासपीठ पर मैं बैठा हुआ हूँ। मेरे सम्मुख ज्योति जल रही है। इसके द्वारा भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान होता है।
सभी प्रश्नों में, सभी कार्यों में विशेषरूप से दीपक की प्रसन्नता (ज्योति) के द्वारा भविष्य कथन करना चाहिये।
ऐसा कहा गया है :
सर्वप्रश्नेषु सर्वेषु कर्मस्वपि विशेषतः।
प्रसादेनैव दीपस्य भविष्यच्छुभमादिशेत् ॥

दीपक का शरीर है-स्नेह, मध्य में स्थित वर्तिनी है- आत्मा, उसकी ज्वाला है- आयु, ज्योति की विमलता मलिनता उसके सुख-दुःख है, पात्र है-उसका घर, मन्द और तेज गतिवाली हवा क्रमशः उसकी मित्र शत्रु है ऐसा महान् देवता रूपी दीपक प्रश्नकर्ता के भविष्य की चुपके से सूचना देता है।

स्नेहो यस्येह देहो भवति तदुदरे वर्तिनीवतिरात्मा ।
ज्वाला चायुस्तदीये विमलमलिनते सौख्यदुःखे क्रमेण ॥
पात्रं गेहं समीरो मृदुपरुषगुणो बन्धुशत्रुस्वरूप।
प्रष्टुः प्रायेण वृत्तं पिशुनयति महादेवतात्मा स दीपः॥

संत ज्याला मोठी ज्योतवाल स्थिति ज्योतिवाला कान्तिमान् शब्द रहित, सुन्दर, दक्षिणावर्ती गतिवाला, वैदूर्यमणि वा स्वर्ण सदृश आभावाला दीपक निकट भविष्य में लक्ष्मी के आगमन की सूचना देता है। जिसकी सुन्दर और ऊंची ली हो, वह भी धनधान्यपूर्ण करने वाला होता है।

असंहत (बिखरी हुई) ज्योतिवाला, चिनगारी के समान छोटी ज्योतिवाला, चट-चट शब्द करने वाला/ फड़फड़ाता हुआ, अस्थिर (हिलती हुई) ज्योतिवाला/कम्पायमान, मन्दकिरणों से युक्त, वामावर्ती गतिवाला, तेल भरा होने पर भी शीघ्र बुझता हुआ, बार-बार बुझ जाने वाला दीपक भविष्य में होने वाले अपकर्ष वा अशुभ फल को कहता है।
दीपक की शिखा (लौ): पूर्वाभिमुख होने पर, अभीष्ट दायक नैर्ऋत्य कोण में, विस्मृतिकारक #अग्निकोण में होने पर, अग्नि भय दक्षिण दिशा में, प्राण नाशक पश्चिम दिशा में, शान्तिदायक वायव्य में, सम्पत्ति नाशक उत्तर में, स्वास्थ्य / सम्पत्ति जीवन दायक ईशान कोण में, कल्याण करने वाली।
होती है।

ऊंची स्थिर शिखा स्थायी रूप से उत्कर्षदात्री होती है। दीपक #अग्नि देवता का साक्षात् विग्रह है। यह लग्न रूप है। जैसा दीप है, वैसी लग्न समझना चाहिये। बिना किसी गणना के दीप द्वारा भविष्य बतलाना बहुत सरल है।
सूर्यमण्डल में अग्नि है हमारे सम्मुख के लघु दीप में भी अग्नि है। दोनों की ज्योति एक है। विराट् एवं स्वराट् को इसने धारण कर रखा है।
विराड् ज्योतिरधारयत् स्वराड् ज्योतिरधारयत्।
( यजुर्वेद १३ । २४)
अग्नि इसी से प्रकाशमान / रश्मिवान् है। ‘अग्निज्योतिषा ज्योतिष्मान् रुवमो वर्चसा वर्चस्वान्।’ ( यजुर्वेद १३ । ४०)

इसलिये प्रार्थना की जाती है कि मुझे ज्योति दो।
‘ज्योतिर्मे यच्छ।’ ( यजुर्वेद १४ । १७)
यह ज्योति अनिर्वचनीय होने से ‘क्व’ है त्रिगुणात्मक होने से इसे प्रियंका त्रिवृत तथा मधुर कहा गया है।

क्व त्री चक्रा त्रि वृतो रथस्य क्व त्रयो बन्धुरो ये सनीडाः।
(ऋग्वेद १ । ३४।९)
क्व = ब्रह्म ।
चक्र = घेरा।
वृत = आवरण ।
बन्धुर= बाँधने वाली रज्जु/बन्धन
रथ = किरण।
नीड =धाम।
त्रि=३

ज्योति जला कर सामने रख कर धर्म कर्म किये जाने की प्राचीन परम्परा है। पूजा में दीप के समक्ष ऐसा कहा जाता है ‘भी दीप | देवस्वरूपत्वं कर्मसाथी हाविघ्नकृत्। यावत् कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव॥
सात्विक जन दीप को साक्षात् विष्णु मान कर प्रार्थना करते हैं :
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युद्यग्निश्चतारकाः।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिः ब्रह्मदीपाय नमोस्तु ते॥ १ ॥
दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सूर्यदीप ! नमोस्तु ते॥ २ ॥
शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुखसम्पदम् । शत्रुबुद्धि विनाशं च दीपज्योतिर्नमोस्तु ते॥ ३ ॥

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पार्थिव दीप में धुआँ होता है, जब कि नभस्थ दैवदीप सूर्य में धुआं नहीं होता। प्रकृति का प्रथम विकार महत्तत्व इस दीप की लौ है।
इस लौ से ऊपर उठने वाला धुआँ प्रकृति का द्वितीय विकार अहंकार है। सूर्य में अहंकार कहाँ ? हमारे द्वारा प्रज्ज्वलित दोप में अहंकार का अभाव कहाँ ? हम में अहंकार है। परमात्मा में अहंकार नहीं है। अहंकार का होना शुभ नहीं। दीप में धुएँ का होना भी शुभ नहीं। व्यक्ति में अहंकार का अभाव संभव नहीं।
दीप में धुएँ का न होना भी सम्भव नहीं। यह अहंकार सात्विक हो, धुआँ अत्यल्प एवं विरल हो तो शुभ है। किस में, कितना, किस प्रकार का अहंकार है यह उसके द्वारा स्थापित दीप से निकलने वाले धुएँ की मात्रा एवं रंग पर निर्भर करता है। गोघृत के दीप में अत्यल्प धुआँ होता है।
यह दीर्घायुदायक है। घर-घर में जलने वाले दीप को तथा हृदय में जलने वाले ज्ञान दीप को मैं प्रणाम करता हूँ।

अन्धकार से प्रकाश की उत्पत्ति होती है। चतुर्थ स्थान अन्धकार, पाताल है। दशम स्थान, प्रकाश, आकाश है। ज्योति का अर्थ इसीलिये कीर्ति, यश, प्रतिष्ठा, मान है। वेद कहता है-यशस्वी बनो।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
(-कृष्ण यजुर्वेद, चाक्षुषीविद्या)

प्रकाश है, ज्ञान। ज्ञान बिना यह जीवन व्यर्थ है। जो व्यक्ति ज्ञानोन्मुख नहीं वह तुच्छ है। (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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