शशिकांत गुप्ते
होलिका दहन के दूसरे दिन रंगों का त्यौहार मनाया जाता है। त्यौहार मनाने वाले,सभी लोग एक दूसरे को रंग लगाते हैं,गले मिलते हैं।
गीतकार आनद बक्षी रचित गीत की ये पंक्तियां याद आती है।
गिले शिकवे भूल के दोस्तों
दुश्मन भी गले मिल जातें हैं
रंगों के इस त्यौहार के दिन समाज में वैमनस्यता को दर किनार कर सौहाद्र पूर्ण माहौल दिखाई देता है।
सौहाद्र पूर्ण माहौल जहन में सहिष्णुता,उदारता,और व्यापक सोच रखने से तैयार होता है।
इस संदर्भ में सन 1960 में प्रदर्शित फिल्म कोहिनूर के इस गीत का स्वाभाविक ही स्मरण हो गया।
इस गीत की विशेषता यह है कि,यह गीत अपने देश की धर्मनिरपेक्षता को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करता है।
इस गीत को लिखा है, गीतकार शकील बदायुनी ने इस गीत के संगीतकार है,,नौशाद अली
इसे गया है गायक मोहम्मद रफी और गायिका लता मंगेशकर ने।
इसे गीत को फिल्माया है, ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार* और ट्रैजेडी क्वीन मीना कुमारी पर।
दिलीप कुमार का असली नाम है मोहम्मद यूसुफ खान और मीना कुमारी का असली नाम है,
मज़हबीं बानो
गीत की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है।
तन रंग को जी,आज मन रंग को
उमंग भरे रंग प्यार के ले लो
आज नगरी में रंग है बहार है
गली गली देखो रस की फुहार है
महत्वपूर्ण पंक्ति:-
पिचकारियों में रंग भरा प्यार है
इस रंग में जीवन रंग लो
गीत की पंक्तियों में सौहद्र को बरकरार रखने के लिए जो शाब्दिक संदेश है,इसे व्यवहारिक रूप से अमल में लाने के लिए
आमजन में व्यापक सोच पैदा करने की आवश्यकता है।
व्यापक सोच सिर्फ और सिर्फ वैचारिक क्रांति से ही संभव है।
वैचारिक क्रांति से ही आमजन के मानस से यथास्थितिवाद समाप्त होगा,और परिवर्तन संसार का नियम है,यह सूक्ति चरितार्थ होगी।
परिवर्तन अवश्यंभावी है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





