सुधा सिंह
इस व्यक्त (दृश्य) जगत् को जानने और अव्यक्त,अदृश्य को जानने की विधा अलग-अलग है। जब हम वेदों का अध्ययन करते हैं तो नाना प्रकार के यज्ञ(यत्न,प्रयत्न,कर्मादि) से उत्पन्न भोगों की स्थिति,प्राप्ति,चेष्टा,भोगों के प्रकार,भोंगो के निर्माण की विधि और उनके फल के बारे मे पता लगाते हैं।
इसीलिए वेदों को विज्ञान कहा गया है।यह अवश्य है कि इस समय वेद की सभी शाखाएं उपलब्ध नही हैं और वेदों मे वर्णित विधिविज्ञान को समझने वाला भी कोई नही है। वेदों के उच्चारण करने की विधि का जिन पुस्तकों मे उल्लेख है उसे ,,शिक्षा,,के नाम से जाना जाता है। जिन पुस्तकों मे यज्ञयाग आदि की विधि का उल्लेख है वह कल्प है।
गृह्यसूत्र आदि की गणना कल्प के अंतर्गत ही है।वैदिक और लौकिक शब्दों का उपदेश,प्रकृति प्रत्यय,विभागपूर्वक शब्द साधन की प्रक्रिया,शब्दादि बोध के प्रकार और शब्दप्रयोग आदि के नियम का उपदेश व्याकरण है। वैदिक शब्दों का जो कोष है,जिसमे अमुक शब्द अमुक वस्तु का वाचक है यह बात कारण सहित बताई गयी है उसका नाम निरूक्त है।
यहाँ तक का हमारा जो अध्ययन और ज्ञान है वह अपरा विद्या है। यानी अभी हम पराविद्या(परमात्मा) के बारे मे कुछ नही जानते,केवल सुनकर कुछ लोग मानते हैं। इस बीच सुनाने वाले भी पुराण लेकर सामने हाजिर हैं,हमारी स्मृति वैसी बनती जा रही है जैसे साहित्य हम पढ़ते हैं और जिस वातावरण मे हम रहते हैं।
शास्त्र वेद व्याकरण ज्योतिष तो कोई पढ़ाता नही केवल ज्ञान की अंतिम सीमा पुराण तक सीमित हो गयी। वोटिंग कराया जाय तो बहुमत भी इन्ही का होगा । अब समस्या यह है कि हम तो अभी प्रकृति मे उलझे हैं उसकी भी सैकड़ों शाखाएं,मंदिर,मस्जिद,गिरिजाघर कल्चर भी आ गया बीच मे।
भक्ति से परमात्मा को रिझाने मनाने हम प्रयासरत हैं तो परमात्मविषयक बोध के लिए इस शरीर मे स्थित आत्मा को अवसर ही नही मिला। अब आज की विद्या(वर्तमान) मे गूगल, यूट्यूब, मोबाइल जैसे पण्डित भी आ गये है, सो कन्फूज्ड होने का युग आ गया, क्योंकि स्वबोध तो कुछ हुआ नही, थोड़ा-बहुत पुस्तक बोध हुआ वह भी कथावाचकों से।
लेकिन हमने स्वयं की प्रयोगशाला मे प्रवेश करने का कभी साहस ही नही किया। इसे श्रुतिमत से समझें तो :
अन्धं तमः प्रविशन्ति येsविद्यामुपासते।
ततो भूयं इव ते तमो य उ विद्यायाँ् रताः।।
हमारी उपासना ही पूरी की पूरी अविद्या है, क्योंकि कर्मकाण्ड और कर्म से ऊपर उठना तो हुआ नही सो मारे जा रहें अपना-अपना ज्ञान। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म सवकी बात मष्तिस्क है पर वह अक्षर नही है और,,किं कर्म किं कर्मेति कवयोsप्यत्र मोहिताः।
बड़े-बड़े ज्ञानी इस गुत्थी नही सुलझा पा रहे है तो ईश्वर से दूरी बढ़ाने के अनेक उपादान उपलब्ध है, लेकिन नजदीकि बढ़ाने का एक भी नही है, फिर,,शास्त्रं तस्य करोति किम्,,वाली बात हो गयी। यही घनचक्कर दूरी बढ़ा रहा है।





