कनक तिवारी
देश इन दिनों उद्दंड, जबरिया और पूरी तौर पर संविधान विरोधी सिरफुटौव्वल में उलझा दिया गया है। धतरम सरकार का भी हो सकता है। संसार के लोकतांत्रिक इतिहास में कभी नहीं हुआ, और हो भी नहीं सकता, कि विधायिका के एक सदस्य को विधायिका में ही बोलने नहीं दिया जाए। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने पिछले दिनों इंग्लैंड में अपने भाषण में जो कुछ कहा, उसे सुने समझे बिना फतवा जारी किया जाए कि वे भारत के लोकतंत्र के खिलाफ कुछ भी कैसे कह सकते हैं। अव्वल तो उन्होंने खिलाफ कहा नहीं। यदि कह भी देते तो सफाई, स्पष्टीकरण और जवाब देने का उनका संवैधानिक अधिकार सुरक्षित है। वह अधिकार कोई नहीं छीन सकता। न सरकार, न संसद, न सुप्रीम कोर्ट, न अदालत और न खुद संविधान। राजनीतिक हेकड़ी को संसदीय परंपराओं की खाल ओढ़ाकर तिलिस्म के रूप में पेश करने की दादागिरी चल रही है। मंत्री अचानक संविधानरहित तकरीरें करते हैं। राजनीतिक दबाव और आका की खुशमिजाजी के लिए? करोड़ों को न कुछ समझ आता है, न जीत और जीवन की ललक बची है। न ही आने वाली बरबादी का जश्न मनाने से कोई रोक सकता है।
बोलने और अभिव्यक्ति की आजा़दी संविधान ने दी है। वह इस तरह है (1) सभी नागरिकों को, बोलने और अभिव्यक्ति ही आजा़दी का अधिकार होगा। (2) (1) के उपखंड (क) में दिए गए अधिकार के उपयोग से राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ दोस्ताना संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, अदालतों की अवमानना, मानहानि, अपराध के लिए प्रोत्साहन तथा भारत की संप्रभुता और अखंडता के संबंध में विवेकपूर्ण प्रतिबंध जहां तक कोई मौजूदा कानून लागू करता है, वहां तक उसके लागू होने पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे प्रतिबंध लागू करने वाला कोई कानून बनाने से राज्य को नहीं रोकेगी।
संविधान सभा में मूल अधिकारों का अनुच्छेद 19 (तब 13) प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. अम्बेडकर ने पेश किया था। कई संशोधनों को खारिज करते दो महत्वपूर्ण संशोधन मान लिए गए। पहला यह कि मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के सरकारी अधिकार में राजद्रोह शब्द को हटा दिया। यदि राजद्रोह रहता तो बहुत आसानी से सरकार राहुल के खिलाफ फौजदारी मुकदमा बना देती। चीफ जस्टिस रमन्ना की अदालत में बहुत चतुर, चपल मोदी सरकार ने अदालत, जनता और संविधान को झटका दिया। जस्टिस रमन्ना भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (ए) से राजद्रोह को हटाने पर आमादा थे। बार बार सुनवाई होने पर केन्द्र सरकार के तारणधार साॅलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोरा आश्वासन देते समय मांग लिया कि सरकार इस संदर्भ में कुछ सार्थक करना चाहती है और मुनासिब तथा विस्तृत जवाब देगी। अदालतों को ठग लेने की यह सरकारी जुगत लोकतंत्र में कार्यपालिका के पास होती है। चीफ जस्टिस रमन्ना समझ भी गए होंगे। तब भी तथाकथित न्याय हित में केन्द्र सरकार को समय दे दिया। मामला टांय टांय फिस्स हो गया। अब वही ढाक के तीन पात हैं।
संविधान सभा में 1 दिसम्बर 1948 को धाकड़ सदस्य ठाकुर दास भार्गव की डा. अम्बेडकर से झड़प हुई। भार्गव को लगा अम्बेडकर उनके बोलने पर रोक लगाने कटाक्ष कर रहे हैं। झल्लाकर भार्गव बोले ‘जिस तरह आप हस्तक्षेप करते हैं वह बहुत आपत्तिजनक है। धमकी की मुद्रा में आवाज ऊंची कर बोलने का सवाल नहीं है।‘ उपसभापति ने मामला शांत कर दिया। यह ठाकुर दास भार्गव थे जिनके कारण मूल अधिकारों के सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद 19 पर रोक या बंदिश लगाने वाली सरकारी हैसियत को परंतुक से गुजरना पड़ा। भार्गव ने कहा कि सरकार ही कोई भी कानून बना सकती है। तब नागरिक आजा़दी का क्या होगा? सरकारी विवेक, वहम या अकड़ के चलते अगर जनता को मर्यादित रखने के नाम पर प्रतिबंधात्मक कानून बनाए जाएं तो संविधान की हेठी होगी। करोड़ों लोगों के मूल अधिकारों पर बंदिश लगाने का काम किसी को नहीं सौंपा जा सकता। न संसद को न सरकार को। उन्होंने दो टूक पूछा कैसे कह सकते हैं नागरिक आजा़दी पर बंदिश लगाने का अधिकार आखिरकार विधायिका को दे दिया जाए। संसद को अधिकार नहीं हो तब भी वह नागरिक आजा़दी पर कुठाराघात करे? तब केवल सुप्रीम कोर्ट को हक होना चाहिए कि वह फैसला करे। यह जनता के नसीब से जुड़ा मामला है। भार्गव ने सुझाया सरकार द्वारा बनाए जा रहे किसी भी कानून के पहले युक्तियुक्त अर्थात समुचित या उचित जैसा प्रतिबंध लगाना ज़रूरी होगा। उन्होंने कहा मुझे खुशी है अम्बेडकर ने मेरे सुझाव को स्वीकार कर लिया है। फिर कहा युक्तियुक्त शब्द के बदले ‘ज़रूरी‘ या ‘मुनासिब‘ विशेषण डा. अम्बेडकर स्वीकार कर लेते तो उससे जनता की आजा़दी को और सार्थक आयाम मिला होता। अम्बेडकर ने जवाबी भाषण में खुलकर कहा वे ठाकुर दास भार्गव द्वारा सुझाए गए, सरकार पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध को स्वीकार करते हैं क्योंकि वह लोकहित में है।
सवाल उठता है कौन सा कानून संसद ने पारित किया है जिसमें लिखा हो यदि नागरिक विदेशों में जाकर भारत की राजनीतिक स्थिति और सत्ताधारी नुमाइंदों के खिलाफ भी कुछ कहता है, तो उसकी नागरिक आजा़दी का गला घोंटा जा सकता है। अभिव्यक्ति, चुनाव लड़ने, अपनी विचारधारा के प्रति समर्थन देने, विदेश यात्रा, आरोप लगने पर जवाब देने की आजा़दी, ये सब राहुल गांधी की नागरिकता के संवैधानिक अवयव हैं। संविधान में कहां है एक नागरिक अभिव्यक्ति की आजा़दी का अपना अधिकार विदेश जाते ही खो देगा। संसद में हुल्लड़ करना और संसदीय जिरह को स्तर से नीचे गिराकर एक व्यक्ति के समर्थन के नारे लगाना। उसे इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र कैसे कहेंगे? मूल अधिकारों का परिच्छेद अमेरिकी संविधान से लिया गया है। अंगरेजी और फ्रांसीसी संविधानों का मर्म भी है। भारत में इस तरह का संवैधानिक माॅडल इतिहास में नहीं था। कई नेता विदेशी धरती पर भारत के लोकतंत्र के हालात पर टिप्पणी करते रहे हैं कि हाकिम, हुक्कामों और निजाम की हरकतों से उन्हें ऐतराज है। राहुल गांधी ने जो कहा उससे लोकतंत्र मजबूत होता है। जिन्हें कोई समझ नहीं है, वे केवल शोर कर रहे हैं। लोकतंत्र शोरगुल नहीं है। आजा़दी के आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी संसदीय सरकारों को लेकर दुनिया में कई टिप्पणियां दूसरे देश की धरती पर विश्व नागरिक करते रहे हैं। खुद नरेन्द्र मोदी ने पिछली सरकारों पर कई कटाक्ष कई देशों में घूम घूमकर किए ही हैं। अभिव्यक्ति की आजा़दी की शिकायत का मुकाबला अभिव्यक्ति की आजा़दी के तर्कों से ही करना होगा। यही सब चलता रहा तो हिटलर, मुसोलिनी, नादिर शाह, तुर्रम खां जैसे शब्द और उनके मुखौटे बाजार में बड़ी मात्रा में बिकने लगेंगे।
तर्क का सिक्सर तो मारा काज़ी सैयद करीमुद्दीन ने। उन्होंने कहा मूल अधिकारों के प्रतिबंध वाले वाक्यांश को विधायिका की व्याख्या के लिए नहीं सौंपा जा सकता। मूल अधिकार इसीलिए दिए जा रहे हैं कि उसे पल छिन बदलने वाली विधायिका की बनावट पर निर्भर नहीं किया जाए। उन्होंने महत्वपूर्ण सवाल उठाते कहा विधायिका में बहुमतवाद का सहारा लेकर बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यकों पर लगातार अत्याचार कर सकते हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अथवा जनसंख्या में अल्पसंख्यक हों। दुनिया में किसी संविधान में इस तरह की शब्दावली नहीं है। अमेरिका जहां से ये अधिकार लिए गए हैं वहां इन अधिकारों की मीमांसा को सुप्रीम कोर्ट के सुुपुर्द कर दिया गया है जिससे जीतने वाली पार्टी संसद में बैठकर गड़बड़झाला नहीं कर सके।





