माँ!ममतामय आंचल में
फिर से मुझे छुपा लो
बहुत डर लगता है मुझे
दुनिया के घने अंधकार में।
माँ!फिर से अपने प्यार भरे
अहसासों के दीप
मुझ में आकर जला दो।
माँ!खो न जाऊ कहीं
दुनिया की इस भीड़ में
माँ!फिर से हाथ थाम मेरा
कदम से कदम मिला
मुझे चलना सीखा दो।
माँ!डरा सहमा सा रहता हूं
मतबलखौर लोगों की भीड़ में
माँ!अपना ममतामय आंचल
उड़ा मुझे फिर से अपनी
प्यार भरी लोरी गा सुला दो।
राजीव डोगरा
(भाषा अध्यापक)
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गाहलिया
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