मुनेश त्यागी
कल अतीक और अशरफ को प्रयागराज में पुलिस कस्टडी में होने के बावजूद तीन हत्यारों शनि, अरुण और लवलेश ने पत्रकार बनकर मौत के घाट उतार दिया है। इससे लगभग सारे देश प्रदेश में सनसनी फैल गई है। अतीक और अशरफ की हत्या करने के बाद हत्यारों द्वारा जय श्रीराम के नारे लगाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोस जनक है। यह यूपी में कानून के शासन, संविधान और न्याय प्रक्रिया की हत्या है।
इस हत्याकांड के बाद कुछ भोले भाले लोग अपराधियों को दंड देने में लगने वाली देरी और भ्रष्टाचार की आशंका को, अतीत की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और इस गैरकानूनी हत्या का समर्थन कर रहे हैं। अपराधी अपराधी होता है उसमें हिंदू या मुसलमान नहीं ढूंढना चाहिए और हत्या और हत्यारों की तरफदारी करना, हमें जंगली बर्बर और बना देंगे। अपराधी अपराधी होता है। उसमें हिंदू या मुसलमान न ढूंढें । कानून को और अदालतों को अपना काम करने दें। मानवीय सभ्यता का यही तकाजा है।
मुसलमान ही माफिया है और बहुसंख्यक हत्यारे, अपराधी और माफिया दूध के धुले हुए हैं, बहुसंख्यकों की और सरकार की, यह मानता और सोच, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नफरत की मुहिम को बढ़ाने वाली है, अपराधों को रोकने वाली नहीं बल्कि बढ़ाने वाली है। अतीक ने 10-15 दिन पहले ही अपनी हत्या की आशंका भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सामने व्यक्त कर दी थी, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया और सर्वोच्च न्यायालय की यह चूक अतीक की गैरमौजूदगी हत्या के रूप में सामने आ गई है।
यूपी में कानून का राज खत्म हो गया है और सरकारी माफिया और अराजक राज्य का जंगलराज शुरू हो गया है। सरकार जैसे सरकारी माफिया में तब्दील हो गई है। उसकी भाषा काफी आपत्तिजनक, समाज विरोधी और कानून विरोधी है। उसने जैसे कानून के शासन, संविधान और अदालती प्रक्रिया को की हत्या करना शुरू कर दी है और अब जैसे पुलिस और गुंडे सड़कों पर न्याय करेंगे और अदालतों का काम जैसे खत्म हो गया है।
हथकड़ी लगे अभियुक्तों की जुडिशल कस्टडी में और सशस्त्र पुलिस बलों की अभिरक्षा और मौजूदगी में हत्या की जा रही है। यह बेहद अफसोसजनक और डरावना दृश्य है। यह कैसा रामराज्य है? यह हत्या कई सवाल करती है। यूपी में अब कानून विहीन, अदालत विहीन और संविधान विहीन जंगलराज में तब्दील हो गया है और अब पुलिस एनकाउंटर और हत्यारे तुरत फुरत न्याय करने की मुद्रा में आ गए हैं।
आरोपियों को पुलिस कस्टडी में ही मारने का नया तरीका रामराज्य की सरकार ने नए नवेले तरीके से इजाद कर लिया है। मिट्टी में मिलाने की सरकारी मुहिम ने कानून के शासन को, संविधान को और अदालतों को मिट्टी में मिला दिया है। अब असली मनुवादी रामराज अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया है।
इस हत्याकांड की पुलिसिया कार्रवाई में कई झोल दिखाई दे रहे हैं। दोनों अपराधियों को एक साथ हथकड़ी लगाना क्या कानूनी और अदालत द्वारा स्वीकृत था? मेडिकल चेकअप के लिए देर शाम को ही क्यों लाया गया? क्या मेडिकल टीम को वही नहीं बुलाया जा सकता था जहां अतीक और अशरफ को ठहराया गया था? हत्यारे बने पत्रकारों को उसके नजदीक कैसे आने दिया गया? पुलिस इन सारे हालातों के बावजूद भी उसकी हत्या का पूर्व अंदाजा कैसे नहीं लगा पाई? केंद्रीय सुरक्षाबलों का सहारा क्यों नहीं लिया गया? क्या यहां पर सरकार की मिट्टी में मिलाने की मुहिम की नीति को ही आगे नहीं बढ़ाया जा रहा था? यह सब पुलिस की सबसे बड़ी कानून विरोधी लापरवाही, सरकारी गुलामी और पिछलग्गूपने का ही नतीजा प्रतीत हो रहा है।
कोई सीधे सच्चे और मासूम लोगों का कहना है कि अतीक ने बहुत सारे अपराध किए थे, वह एक बड़ा गुनहगार था, उससे निजात मिल गई तो अच्छा है। यहां पर हमारा कहना यह है कि भारत की न्याय व्यवस्था और मानवाधिकार प्रस्थापित करते हैं कि जब तक किसी गुनाहगार को, किसी अपराधी को, किसी अभियुक्त को, सक्षम न्यायालय द्वारा अपराधी घोषित न कर दिया जाए, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाएगा। हम यहां अतीक या किसी भी अपराधी का समर्थन नहीं कर रहे हैं। हम यहां कानून के शासन का और न्याय प्रणाली की वैधता की बात कर रहे हैं। कोई भी अपराधी बचना नहीं चाहिए। हम यहां पर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि किसी भी अभियुक्त को जल्द से जल्द कानूनी प्रक्रिया के तहत ही सजा दी जानी चाहिए, वरना प्रदेश में कानूनी राज्य न रहकर, जंगली राज कायम हो जाएगा और तमाम तरह के अपराधियों की बल्ले बल्ले हो जाएगी, कानून का शासन समाप्त हो जाएगा और पूरे प्रदेश में जंगली राज कायम हो जाएगा। इस जंगली मानसिकता से किसी भी कीमत पर बचने की जरूरत है।
अब यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस हत्याकांड में लिप्त तमाम सरकारी और पुलिस के उच्च अधिकारियों के खिलाफ द्रुतगति से जांच कार्यवाही हो और दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए। आरोपियों के इस तरह से हत्या किया जाना कानून, संविधान और जाति प्रावधानों का उल्लंघन है। उन्हें ठोस और पुख्ता सबूतों के आधार पर कानूनी रूप से सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए थी।
आरोपियों को सड़कों पर मार कर हम कौन से कानून के शासन का प्रदर्शन कर रहे हैं? यह आज भारत की जनता के सामने, उत्तर प्रदेश की जनता के सामने, सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। भारत का संविधान, भारत का कानून और भारत की अदालतें इस तरह की हत्या किए जाने के बिलकुल खिलाफ है। इस तरह की एक्स्ट्रा जुडिशल किलिंग्स, भारत को एक मध्ययुगीन, बर्बर, असभ्य और जंगली राज की ओर धकेल देने में कामयाब हो जाएंगी। इनका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता।
अब लोग पूछ रहे हैं यूपी में काबा? प्रयागराज में काबा? यहां पर हम तो यही कहेंगे,,,,
यूपी अब कानूनविहीन, संविधानविहीन और न्यायविहीन प्रदेश में तब्दील बा।





