,मुनेश त्यागी
दुनिया में 23 अप्रैल को यूनेस्को द्वारा और दूसरी संस्थाओं द्वारा “विश्व पुस्तक दिवस” के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य पुस्तकों का आनंद लेने और पढ़ने की कला को बढ़ाना है। किताबें संस्कृति और पीढ़ियों को जोड़ने के लिए पुल का काम करती हैं। पुस्तकें हमारे जीवन को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
किताबें हमारे साथ एक सच्चे साथी की तरह रहती हैं बशर्ते कि हमारे अंदर पढ़ने और सीखने का जज्बा हो। यह दिन उन लोगों के लिए मंच की तरह है जो साक्षरता को बढ़ावा देना चाहते हैं। इसमें लेखक, कवि, पब्लिशर्स, टीचर्स, लाइब्रेरियन, पब्लिक और प्राइवेट संस्थान शामिल हैं।
दुनिया में पुस्तकों ने एक बड़ा रोल अदा किया है। जब हम अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि दुनिया के महान कवियों, लेखकों, राजनीतिज्ञों संस्कृतिकर्मियों और वैज्ञानिकों ने दुनिया की महान पुस्तकें पढ़कर पूरे संसार को दिशा दी है। पुस्तकें हमारे जीवन का असली खजाना हैं। वैसे तो दुनिया में समाज के हर क्षेत्र में किताबें लिखी गई हैं जैसे इतिहास की किताबें, राजनीति की किताबें, धर्म की किताबें, अर्थशास्त्र की किताबें। हकीकत तो यह है कि कुछ किताबें, हमारे समाज और आदमी के अंदर, धर्मांधता और अंधविश्वास भी बढ़ाती हैं और आज तो जैसे धर्मांधता और अंधविश्वास को बढ़ाने की आंधी सी आई हुई है।
मगर जब हम संतुलित होकर एक बेहतर दुनिया का निर्माण करने की सोचते हैं तो हमारे सामने बहुत सारे लेखक, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक और उनके द्वारा लिखी गई सैकड़ों किताबें, आकर खड़ी हो जाती हैं। दुनिया में बहुत सारी किताबों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है और वे आज भी दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताबें बनी हुई हैं। इनमें सबसे प्रमुख स्थान कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स की “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” और कार्ल मार्क्स की “पूंजी” आज भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।
जब हम दुनिया की बेहतरीन किताबों और बेहतरीन लेखकों पर एक नजर आते हैं तो गौतम बुध का अष्टम मार्ग, कबीर और रहीम के दोहे, दुनिया के वैज्ञानिक कॉपरनिकस और ज्यार्दन ब्रूनो की किताबें और शेक्सपियर की “मर्चेंट ऑफ वेनिस”, डार्विन की “ओरिजिन ऑफ स्पीशीज” और दुनिया के वैज्ञानिकों की तमाम किताबें हमारे सामने आ जाती हैं।
पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा परिवर्तन मार्क्स और एंगेल्स की “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” और मार्क्स की “पूंजी” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी के साथ-साथ, लेनिन की पुस्तकें “क्या करें”, “राज्य और क्रांति”, “वामपंथी कम्युनिज्म एक बचकाना मर्ज”, “साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था”, रूस के महान लेखक मैक्सिम गोरकी की “मां” और निकोलाई ऑस्त्रोवस्की की “अग्नि दीक्षा” का नाम लिया जा सकता है।
इसी के साथ चमनलाल और जगमोहन द्वारा लिखी गई “भगत सिंह और साथियों के दस्तावेज”, प्रेमचंद की “गोदान”, अंबेडकर की “जाति का विनाश”, लू शाओची की “अच्छे कम्युनिस्ट कैसे बने?” और राहुल सांकृत्यायन की “भागो नहीं दुनिया को बदलो”, “तुम्हारी क्षय”, “साम्यवाद ही क्यों?” और “वोल्गा से गंगा”, हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।
भारत के लेखकों में सव्यसाची की “यह सब क्यों?”, जवाहरलाल नेहरु की ‘भारत एक खोज”, सुभाष चंद्र बोस के “भाषण”, अयोध्या सिंह की “भारत का मुक्ति संग्राम”, सुंदरलाल की “भारत में अंग्रेजी राज”, लाला हरदयाल एम ए की “हिंट्स फॉर सेल कल्चर”, हमारे जीवन में और बल्कि दुनिया के लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। इसी के साथ डॉ सुभाष चंद्र की “साझी संस्कृति”, गुणाकर मुले की “सौर मंडल”, दुष्यंत कुमार की गजल की किताब “साए में धूप”, ईएमएस नंबूद्रीपाद की “गांधी और उनका वाद”, फिदेल कास्त्रो की “मेरी जीवनी”, “आधी सदी गवाह”, “पूंजीवाद एक विराट जुआघर” और भगवतशरण उपाध्याय की “खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर” मनुष्य के जीवन में बेहतरीन भूमिका निभा रही हैं।
भगत सिंह के साथी शिव शर्मा कहते हैं कि भगतसिंह पुस्तकों का सबसे बड़ा प्रेमी था। उनके कोट की जेब में हमेशा कोई ना कोई किताब रहती थी और जब हम भगत सिंह की जेल डायरी पढ़ते हैं तो उसे पता चलता है कि भगत सिंह ने जेल के अंदर 123 किताबों का अध्ययन किया था और इस प्रकार उन्होंने इन विश्व प्रसिद्ध लेखकों का अध्ययन करके अपनी क्रांति और समाजवाद की दिशा तय की थी।
पूरी दुनिया का इतिहास पढ़ने के बाद हम देखते हैं कि दुनिया में क्रांतिकारी पुस्तकों ने बहुत बड़ा रोल अदा किया है और समय-समय पर तत्काल राजनेताओं ने इन क्रांतिकारी किताबों को पढ़कर दुनिया का क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, जिसमें लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग, हो ची मिन्ह और दुनिया के तमाम क्रांतिकारी कवियों, लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों और संस्कृति कर्मियों और वैज्ञानिक लेखकों का अहम रोल रहा है।
इस विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर हमें अपने और दुनिया के क्रांतिकारी कवियों को भी याद रखना बहुत जरुरी हैं। इनमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, साहिर लुधियानवी, प्रदीप कुमार, हबीब जालिब, शंकर शैलेंद्र, सेक्सपियर, पाब्लो नेरुदा, मायाकोवस्की, लूसुन, बर्तोल्त ब्रेख्त, दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला और दुष्यंत कुमार जैसे कवियों और उनकी किताबें को भी याद रखना बहुत जरुरी है।
विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर आज हम फिर से कहेंगे कि अगर हमें एक बेहतरीन दुनिया का निर्माण करना है, ज्ञान विज्ञान और वैज्ञानिक संस्कृति से परिपूर्ण दुनिया का निर्माण करना है तो हमें, पूरे समाज को और पूरी दुनिया के मां बाप और बच्चों को, अपनी स्कूल की किताब पढ़ने के साथ-साथ, क्रांतिकारी लेखकों कवियों , राजनीतीज्ञों और वैज्ञानिकों की किताबों से जरूर अवगत कराना चाहिए। क्रांतिकारी किताबें ही इस दुनिया को शोषण, अन्याय, जुल्म, भेदभाव, गैर बराबरी, युद्धों और धर्मों की नफरत, अंधविश्वास और धर्मांधता बढ़ाने की मुहिम से निजात दिला सकती हैं।
विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर हम कहना चाहेंगे कि हमारे समाज में बहुत सारे लोग बहुत बढ़िया मकान बनाते हैं, अच्छी-अच्छी गाड़ियां अपने घर में रखते हैं, अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषणों का इस्तेमाल करते हैं मगर यदि उनके घरों में अच्छी किताबें नहीं है, अच्छा साहित्य नहीं है, राजनीति की, अर्थशास्त्र की और इतिहास की, अच्छे मां बाप की, आधुनिक विज्ञान की, अच्छी अच्छी किताबें नहीं हैं, तो हम उन्हें दरिद्र ही कहेंगे। क्योंकि जिस घर में, अच्छी और क्रांतिकारी किताबें नहीं होतीं, वह एक अच्छा घर नहीं हो सकता और जिस समाज में अच्छी किताबें नहीं होती, वह समाज भी एक अच्छा समाज नहीं हो सकता।






