मध्यप्रदेश रहा सरदार सरोवर के लाभोंसे वंचित! क्यों नहीं सत्य बरतता कि पुनर्वास है बाकी?
पिछले 37 सालोंसे जारी नर्मदा बचाओ आंदोलन का नारा रहा, ‘नर्मदा बचाव| मानव बचाव||’ तीनो (म.प्र., महाराष्ट्र, गुजरात) राज्यों में कुल 50,000 से अधिक परिवार उजडे तो हजारों का पुनर्वास हुआ, कानूनी और मैदानी लड़त से ही! लेकिन आज भी जिन्हें जमीन, भूखंड और कानूनी पात्रता अनुसार अनुदान तथा पुनर्वसाहटो में आवश्यक सभी संरचना और सुविधा मिलना बाकी है, उन्हें बारबार सतत संघर्ष करना पड़ रहा है| अगस्त 2022 से हर महिना, घंटों तक मुद्दों पर आयुक्त महोदय के साथ, चर्चा होकर भी किसान, मजदूर, कुम्हार, केवट, मछुआरे, कुछ दुकानदार आज भी वंचित है तो 17 अप्रैल से नर्मदा भवन, इन्दौर पर सत्याग्रह पर बैठे विस्थापित! रोज 4 घंटे चर्चा होकर, कुछ मुद्दे सुलझ गये, लेकिन सबसे गंभीर समस्याग्रस्त है मजदूर, किसान व अन्य, जिन्हें 2019 में डूबते घरसे खींचकर निकाला और ‘10×10’ की टीनशेड में रखा गया| ऐसे 1900 परिवारों में से सैंकड़ो आज भी वही है, जिन्हें पात्रता गलत आधार पर नकारी जा रही है| उन्हें जिलाधिकारी पर सौंपते हुए धिक्कारा जा रहा है| 4 सालोंसे, सबूतों की जाँच और सुनवाई न करनेसे, तपे हुए शेड में, पानी, बिजली की समस्या भुगत रही है श्रमिक महिला, बच्चे और बूढे भी! इसी का दर्द व्यक्त करते हुए मेधा पाटकर जी के साथ सेवंतीबाई,देवकीबाई और फेमिताबहन,तथा कमला यादव,पांच बहनों ने आज, 19 अप्रैल के रोज उपवास घोषित किया है; जब कि इन परिवारों के आवेदनों पर आजतक सही जाँच, न्याय नही हुआ है|
विशेष बात यह भी है कि ‘नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण’ की हर रिपोर्ट में 2009 से ही ‘0’ बॅलन्स याने पुनर्वास पूरा होने का दावा किया जाता रहा जो झूठा साबित हुआ! आज भी मध्यप्रदेश शासन पुनर्वास बाकी होते हुए, एक ओर विस्थापितों से प्रस्तुत हजारो आवेदनों पर निर्णायक कार्यवाही नही कर पा रहा लेकिन 2009 और 2017 के बाद हजारोंको मकान बनाने भूखंड और करीबन 900 परिवारोंको वैकल्पिक खेत जमीन नहीं देने पर 60 लाख रु. का अनुदान, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश (2017) के अनुसार देना पड़ा| क्यों छुपा रही है प्रदेश की शासन, उर्वरित कार्यकी हकीकत? यह केवल नर्मदा ट्रिब्यूनल फैसला (जो कानून) है, राज्य की नीति एवम् न्यायालयीन आदेशों का उल्लंघन छुपाने के लिए ही हो रहा है|
सरदार सरोवर में पुनर्वास का, भूअर्जन सहित, संपूर्ण खर्च का भार, बांध से 91% पानीका लाभ पाने वाले गुजरात शासन से ही उठाना कानूनी निर्णय है| फिर भी, अब कई वर्षों बाद गुजरात सभी राज्यों को विभाजित हिस्सा देने कह रही है, तो विवाद जारी है| महाराष्ट्र शासन ने ठोस कार्य बताकर 30 करोड़ रु. देने गुजरात को मजबूर किया…. लेकिन मध्यप्रदेश शासन चूप क्यों? विवाद के निपटारे के लिए चल रही है गुजरात और मध्यप्रदेश के बीच मध्यस्थता /arbitration! यह कैसे और कबतक?
सरदार सरोवर की लाभ-हानि का हिसाब भी तो पलट गया है| 4200 करोड़ रु.की लागत बताकर जिसका लाभ-हानि का अपूर्णांक (b-c ratio) निकाला गया था,उसी बांध पर अब 60000 करोड़ से अधिक हुआ है खर्च! CAG की रिपोर्ट बता रही है,6700 करोड़ का घाटा! इस मुद्दे पर भी चूप है सारी सरकारे ,विकास के नामपर को जनता को करती रही है गुमराह!
नर्मदा का जल नियोजन हो रहा है, बेबुनियाद !
नर्मदा में बहते जलप्रवाह को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी घाटी के पीढ़ियों पुराने निवासरत गावों की आबादी की जरूरत ध्यानमें लेते हुए निभानी है| इसपर करोडो रुपयों की व्यवस्था और खर्च होते हुए भी, अंधाधुंध नियोजन से गंभीर खतरा पैदा हुआ है| नर्मदा का प्रवाह प्रभावित होकर नदी लुप्त होने की चेतावनी दी जा रही है| आज ही नर्मदा का पानी पूर्णत: प्रदूषित और पीनेलायक नहीं है| प्रवाह कम होते ही प्रदूषण होगा दुगुना-चौगुना! मानव का स्वास्थ्य और जल संपदा भी खत्म होती जा रही और जाएगी! कहाँ है सोच और अध्ययन भी!
नर्मदा पर बने 30 बड़े और 135 मझौले बाँधो के रोकने और छोडने से, गिरता, चढ़ता जलस्तर सिंचाई से लेकर मत्स्यव्यवसाय तक आजीविका और जीवनप्रभावित कर ही रहा है| अब उपरी क्षेत्र में रद्द किये बांधों मेंसे चिंकी, बसानिया जैसे बांधों को आगे बढ़ाने से फिर से इस समस्या में बढ़ोतरी होगी और जंगल डूबने से नदी में सालभर बहते प्रवाह में आती रही और भी बढेगी जरूर! इसी के साथ, 70 स्थानों पर नर्मदा का पानी उठाने की (lift) परियोजनाओं से शहरों और उद्योगों को पानी देने का नियोजन भी अन्यायपूर्ण होगा जरूर!
गुजरात के बांध के नीचेवास के 150 कि.मी. के क्षेत्र पर, सरदार सरोवर से, नदी रोकते ही, समुंदर 60/80 कि.मी. तक अंदर घूस आने से,(sea ingress) गंभीर असर आ चुका है| अब नीचेवास के लिए 600 क्युसेक्स के बदले 1500 से 1800 क्युसेक्स तक पानी छोड़ने का प्रस्ताव मंजूर नही कर सकते है| मध्यप्रदेश को जरूरी है, नर्मदा घाटी के उपरकी जनता के हक, मत्स्यव्यवसाय और सिंचाई ही नहीं, गाव- शहरो के पीने के पानी पर कितने गंभीर असर होंगे, इसपर पूरा अध्ययन और सोच की! नर्मदा घाटी के ग्रामसभाओं के अधिकार ‘पेसा’ के तहत आदिवासीयों का विशेष अधिकार मानकर, उनकी सहमति के सिवाय, नर्मदा का पानी छीनने नदी, प्रकृति, और आजीविका जो असर थोपे जाएंगे, वह अवैध होंगे| कौन करेंगे नुकसान की भरपाई ?
चुटका परमाणु जैसी परियोजना से, रेडियोधर्मी कचरे से, पूरी नर्मदा बरबाद होगी तो कौन होंगे जिम्मेदार? इस परियोजना के विरोध में उतरे स्थानिक आदिवासी, जो बर्गी के बाद दूसरी बार विस्थापन नामंजूर कर रहे हैं, उन्हें जबरन हटाना या उनके खाते में जबरन भुगतान करना अ-जनतांत्रिक है और अन्यायपूर्ण भी!
‘मत्स्यव्यवसाय’ संबंधी म.प्रदेश नहीं डूबाये, राज्यका और मछुआरों का अधिकार!
नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले के तहत स. सरोवर जलाशय में मत्स्यव्यवसाय का अधिकार राज्य का होते हुए, म.प्रदेश में 31 और महाराष्ट्र में गठित 21 सहकारी सोसायटीयों को विस्थापित आदिवासी मछुआरो को भी आजीविका का हक है ही! इसे हिम्मतसे जताने के बदले, गुजरात और केंद्र के दबाव में तीनों राज्यों के एकत्रित मत्स्यव्यवसाय की योजना मंजूर करना, म. प्रदेश, महाराष्ट्र के मछुआरों पर, मत्स्यनीति और आजीविका के साथ पुनर्वासके हक पर भी आघात होगा!
नर्मदा घाटी को जनता का संघर्ष ही बचाएगा नर्मदा भी!
गेंदालाल भिलाला, द्वारकी मछुआरा, धनराज भिलाला, राहुल यादव
संपर्क : 8839292157/9179617513





