डॉ. विकास मानव
त्र्यंम्बकं यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
~यजुर्वेद (३ । ६०)
यह मन्त्र ‘द्वादशार’- द्वादश अरों (पदों) वाला हैं। इस मंत्र के द्वादशपद कुण्डली के १२ भावों को एक-एक कर समावृत करते हैं। यहाँ त्र्यम्बकं = त्रयाणां अम्बकानां समाहारः (द्विगु) = त्रि + अम्बकम् । त्रिपद नहीं, अपितु शब्द है। किन्तु ‘कम्’ एक पद है।
पुष्टिवर्धनम् = पुष्टिवर्धनम् (कर्म तत्पुरुष इसमें दो पद विद्यमान हैं। यह पूरा मन्त्र द्वादशपदात्मक है। १२ भाव के बाहर कुछ नहीं है तथा १२ भाव से कम भी कुछ नहीं है। यह, इसलिये एक पूर्ण मन्त्र है। अतएव त्र्यम्बक देव परस्पर/ अलग-अलग दोनों प्रकार से पूर्ण है।
जैसे दिन-रात का जोड़ा है, स्त्री पुरुष का जोड़ा है, सुख दुःख का इन्द्र है, पुरुष प्रकृति का युगल है, वैसे ही त्र्यम्बकमन्त्र का जोड़ा है। जोड़ा मन्त्र शोभा देता है। जोड़ा वस्तुएँ शुभ होती हैं। जोड़े सर्वत्र शुभ माने जाते हैं। त्र्यम्बक मन्त्र का युग्म अत्यन्त शुभ है।
इस जुड़वे मन्त्र का दूसरा भाग यह है :
त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधि पतिवेदनम्।
उर्वारुकमिव बन्धादितो मुक्षीय मामुतः॥
यह मन्त्र भी तद्वत् १२ पदात्मक है। अतएव यह भी पूर्ण मन्त्र हुआ। इन युगल मन्त्रों के पदों की कुल संख्या= १२ + १२ = २४ है। प्रकृतियाँ २४ हैं।
१. प्रधान। २. महत्। ३. अहंकार । ४. मन । ५. कर्ण । ६. त्वचा । ७. चसु। ८. जिड़ा। ९. नासिका १०. हस्त ११. पाद। १२. वाक्। १३. उपस्थ । १४. पायु। १५. शब्द। १६. स्पर्श। १७. रूप। १८. रसः । १९. गन्ध । २०. आकाश । २१. वायु । २२. तेज । २३. जल। २४. पृथ्वी।
इस युग्म मन्त्र में २४ पद =२४ प्रकृति। अतएव यह एक प्रकृतिपरक / प्रकृतिसंबंधी प्राकृतिक मंत्र है। इस मंत्र के जाप से मूलाप्रकृति उद्वेलित होती है। अन्य व्यक्त प्रकृतियाँ प्रशान्त होती हैं। प्रधान (मूला प्रकृति) का उद्वेलन, शक्ति जागरण है। पृथ्वी से महत् पर्यन्त तत्वों का प्रशान्त होना, शक्ति का संचयन / भाण्डारण है। यही शक्ति पूजा है। शक्तिपूजा जीवन के लिये अनिवार्य है।
प्रकृतियाँ ३ हैं- कारण, सूक्ष्म, स्थूल कारण प्रकृति एक अव्यक्त प्रधान है। स्थूल प्रकृतियाँ ५ – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी शेष १८ प्रकतिष महत्, अहंकार, मन, बेन्द्रिय त्यागेन्द्रिय दृश्येन्द्रिय स्वादेन्द्रिय, घाणेन्द्रिय, करेन्द्रिय पादेन्द्रिय, वागिन्द्रिय, मूत्रेन्द्रिय (जननेन्द्रिय), मलेन्द्रिय, शब्द तन्मात्र, स्पर्श तन्मात्र, रूप तन्मात्र, रस तन्मात्र, गन्धतन्मात्र सूक्ष्म हैं।
इस प्रकार कारण, सूक्ष्म, स्थूल का अनुपात हुआ- १: १८:५ । इसका अर्थ हुआ कारण प्रकृति एक मात्र है। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म प्रकृति बहुत अधिक है। जब हम स्थूल का थाह नहीं पाते तो सूक्ष्म का पार कैसे पा सकते हैं। इन तीनों प्रकृतियों को जाने बिना जीवात्मा (चेतन तत्व) का उद्धार नहीं।
इसलिये ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ की नौका पर बैठना पड़ता है। सूक्ष्म १८ प्रकृतियों में १ महत् (बुद्धि), १ अहंकार, १ मन का एक त्र्यम्बक है तथा ५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय, ५ तन्मात्रों (विषयों) का एक त्र्यम्बक है। कारण एक है, अनुपास्य है।
स्थूल ५ है, अनुपास्य है। सूक्ष्म त्र्यम्बकयुक्त है, उपास्य है। अतः सूक्ष्म प्रकृति अथवा सम्पूर्ण प्रकृति की उपासना इस मंत्र से करना उचित है। अकेले कारण वा स्थूल प्रकृति के निमित्त यह मंत्र प्रशास्त नहीं है। कारण एवं स्थूल के मध्य में होने से सूक्ष्म सुरक्षित एवं अधिक महत्वपूर्ण है।
लोक में यह देखा भी जाता है कि लोग इन्हीं सूक्ष्म प्रकृति के १८ अध्यायों में अधिक श्रम शक्ति एवं समय देते हैं। सूक्ष्म द्वारा सूक्ष्म में प्रवेश मिलता है। इन १८ सूक्ष्मों में मन सुगतिशील है। इसलिये मैं मन से इनमें प्रवेश करता हूँ। इसके लिये मन को शुद्ध संकल्पवान् होना चाहिये।
ननूनमस्ति नोश्वः कस्तद् वेद यदद्भुतम्।
अन्यस्य चिन्मभि संचरेण्यमुताधीतं विनश्यति॥
~ऋग्वेद (१/१७०/१)
न नूनम् अस्ति = आज (इस समय नहीं है। नो श्वः = आने वाले समय (कल) भी नहीं है। कः तद् वेद = कौन (सर्वेश्वर) उसे जानता है।
यत् अद्भुतम् = जो (परमेश्वर) अद्भुत (सर्वप्रासक, भूतभक्षी) है।अन्यस्य वित्तम् = असाधारण (परमेश्वर) का चित्त (मन) अभि-सम्-चरेण्यम् सर्वथा (सब ओर से) चंचल (न पकड़ में आने वाला, अवेद्य) है।
आधीतम् = चिन्तकिया/जाना हुआ।
विनश्यति = नष्ट हो जाता है, नश्वर है।
मन्त्रार्थ : यह बड़ा गूढ़ मन्त्र है। जो बीत चुका है अर्थात् जो कल था, वह आज नहीं है। जो आज है, वह कल (आगे) नहीं है (रहेगा। भाव यह है कि संसार परिवर्तनशील है। भूत भूत में, वर्तमान वर्तमान में, भावी भावी में है। ये तीनों पृथक्-पृथक् हैं।
किन्तु जो कल था, वह अब भी है तथा जो सम्प्रति है, वह कल (आगे) भी रहेगा- इस बात (सत्य) को कौन (परमेश्वर) जानता है। यह अपरिवर्तनशील तत्व है। विराट् पुरुष ही अन्य (असाधारण है।
इसका चित्त (मन) भी विराट है। यह विराट् मन महाचंचल है। यह किसी जीव की समझ में नहीं आ सकता। इसके विषय में जो कुछ भी लोगों ने जाना, समझा और कहा है, वह नश्वर प्रकृति तत्व है।
मन्त्रानुसार, न नूनम् नो श्वः अस्ति = न आज, न कल है। जो गत क्षण में रहा, वह इस क्षण नहीं है, अगले क्षण में भी नहीं रहेगा। जो हुआ सो हुआ। वह फिर आने होने वाला नहीं है। इस न नूनम नो श्व के विषय में अषि कहता है, यद अद्भुतम् = जो (यह) अनिर्वाच्य / अवाङ्मनसगोचर (मन और वाणी के परे) है।
कः तद् वेद= उसे जानने वाला कौन है ? उसे जानने वाला वह (परमात्मा अवाङ्मनसगोचरपुरुष) स्वयं हैं। उसे साधारण जीव कैसे जान सकता है ? उत अधीतम् वि नश्यति = और निश्चय ही उस देवाधिदेव के विषय में जो कुछ भी जाना गया है, सुना गया है, पढ़ा गया है, इन्द्रियों से ग्रहण किया गया है, वह सब नष्ट हो जायेगा, नहीं रहेगा। क्योंकि इन्द्रियाँ मन बुद्धि अर्ह सभी नश्वर हैं। जायमान का नाशवान् होना सुनिश्चित है।
अन्यस्य वित्तम् अभि संचरेण्यम् = दूसरे लोगों का अर्जित ज्ञान अभिसंचरेण्य (क्षण भंगुर / क्षण मात्र तक टिकने वाला) है। इसलिये क्षणिक वस्तुओं का संग्रह क्यों करें ? वस्तु को पाने का लोभ होता है।
मोह के कारण वस्तु का त्याग (दान) नहीं किया जाता। मद के कारण हम वस्तु को अपना समझते हैं- अपने से वस्तु का तादात्म्य स्थापित करते हैं। इस प्रकार लोभ, मोह, मद-इन तीन से अज्ञानमय सांसारिक व्यवहार हो रहे हैं। ये तीन भाव त्र्यम्बकम् हैं। ये अकेले कभी नहीं रहते। लोभ मोह मद परस्पर संश्लिष्ट हैं जैसे तीनों प्रकृति के गुण।
सात्विक राजासिक तामसिक इनके आवरण / भूषण / वस्त्र मात्र हैं। अज्ञेय अत्र्यंबक तत्व को मेरा प्रणाम ! हमें जो स्थूल शरीर मिला है, यह पहले (पूर्व जन्म में) नहीं था। जो पहले था, वह आज नहीं है।
आज जो शरीर हमारे काम में आ रहा है, यह कल (भविष्य में) नहीं रहेगा। यह ध्रुव है। जो हमने सोचा था, वह आज घटित नहीं हो रहा है। जो आज सोच रहा हूँ, कल वैसा घटित नहीं होगा। इसका तात्पर्य है- कर्ता नियन्ता कोई और है, हम नहीं। हम निमित्त मात्र हैं।
इसीलिये भगवान् कृष्ण, गीता में अर्जुन से कहते हैं- ‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।’ यह देह नाशवान्। देहस्थ इन्द्रियाँ नाशवान्। इन्द्रियमाह्य ज्ञान (विचार) नाशवान है। इस नाशवान् त्र्यम्बक के पीछे कोई अविनाशी है। यह अज्ञेय है।
सामान्य लोगों का इस अज्ञेय से क्या लेना देना ? जो अज्ञेय है, उसे अज्ञेय चाहिये । जो त्र्यम्बक है, उसे त्र्यम्बक चाहिये। इसलिये अब मैं पुनः उसी त्र्यम्बक की चर्चा करता हूँ। देह त्र्यम्बक है। देहधारी जीव को देहधारी देव की उपासना करना उचित एवं लाभप्रद है। सभी देवता देहधारी हैं। प्रकृति देहधारी है।
भिन्न-भिन्न देवों के विभिन्न रूप रंग, आकार, आचार, विचार, व्यवहार, वेषभूषा, वाहन, स्थान, स्वभाव, गुण, कर्म, गति, शक्ति आदि है।
अपने अनुरूप अपनी रूचि के अनुकूल जो देव जिसे प्रिय आकर्षक लगे, वह उसकी उपासना करे और अपने जीवन में चरे नाना मनुष्य, नाना देवता, नाना असुर, नाना लोक, नाना कार्य इस विश्व के अंग हैं। इनके परस्पर सम्यक् संचालन (व्यवहार) से यह विश्व गतिमान हो रहा है।
ज्ञान त्र्यम्बक है-बाह्य जगत् का ज्ञान, अन्तर्जगत् का ज्ञान, मध्यक्षेत्र (शरीर संबंधी) ज्ञान विराट् ज्ञान एवं आत्मज्ञान के मध्य दैहिक ज्ञान है। यह क्षेत्रीय ज्ञान, अन्य दो विभु एवं अणु ज्ञानों की अपेक्षा सुगम है।
इसलिये, जीव को सर्वप्रथम स्वदेह ज्ञान परिचय होना चाहिये। स्थूल देह त्रितत्वात्मक है। देह के सन्दर्भ में तत्व के तीन नाम हैं- १. धातु । २. दोष। ३. मल तीन धातुएँ ही तीन दोष एवं तीन मल हैं। वात, पित्त, कफ ये तीन धातुएँ हैं, क्योंकि इनसे शरीर धारण किया जाता है।
ये तीन दोष है, क्योंकि इनसे ही रोग उत्पन्न होते हैं। ये तीन मल हैं, क्योंकि शरीर के विभिन्न छिद्रों से ये मल के रूप में निर्गत होते होते रहते हैं। जब ये तीनों तत्व समान (उचित) अनुपात में होते हैं तो ये धातु कहलाते हैं और आरोग्यकर हैं। जब इनका पारस्परिक अनुपात विकृत होता है तो ये रोग उत्पन्न करते हैं और दोष कहलाते हैं।
इन तीन तत्वों की विकृत बढ़ी हुई मात्रा को शरीर अपने भीतर रख नहीं पाता तो ये मल कहलाते हैं। तीन मल १२ रूपों में शरीर से बाहर निकलते हैं।
मल १२ हैं :
वसाशुक्रम मज्जामूत्रविद्वाणकर्णविद्।
श्लेष्माश्रु दूषिका स्वेदो द्वादशैते नृणांमलाः॥
~मनुस्मृति (५ । १३५)
बसा (चर्ची), शुक्र (वीर्य), रक्त (अमृद), मज्जा (अस्थिसार), मूत्र (विकृत जल), विद (विष्ठा) प्राणविद (नाक का मल), कर्णविट् (कान का मल), कफ खखार (श्लेष्मा) अश्रु (आंख का मल), दूषिका (आँख का कीचड़), स्वेद (पसीना)- ये १२ मनुष्यदेह के मल हैं। इन्हें निकालते रहना चाहिये।
चर्बी को व्यायाम से, वीर्य को सम्भोग से रक्त को सुश्रम से, मज्जा को प्राणायाम से बाहर निकालना चाहिये। मल एवं मल के वेग को रोकना नहीं चाहिये। नाक, कर्ण, जिहा, आँख, त्वचा के मल को प्रतिदिन समय-समय पर निकालते रहना चाहिये आँसू हृदय का मल होता है। अतः दुःख में खुल कर रोना चाहिये। त्राटक क्रिया एवं उदरधावन (जल धौति) से आँसू निकलता है।
ये १२ मल तीन मलों बात पित्त कफ के विभिन्न रूप हैं। इन मल निष्कासन स्थानों (छिद्रों) को स्वच्छ रखना चाहिये। यह आरोग्य के लिये आवश्यक है। उचित मात्रा में इन मलों का देह के अन्दर रहना आवश्यक है। इसलिये अति स्वच्छता आवश्यक नहीं हैं और न ही संभव है। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्।’ छिद्रों से निकलने वाले ठोस मल कफ के रूप हैं, द्रव मल पित्त के रूप हैं तथा वाष्प (गैस) मल, वात के रूप हैं।
मुख और गुदाद्वार- ये दो बड़े मल निष्कासन छिद्र हैं। मूत्रद्वार से द्रव रूप में, मलद्वार से ठोस एवं गैस (अधोवायु) रूप में मल निकलता है। मुख से जम्हाई, डकार के रूप में वातमल तथा वमन, खखार के रूप में ठोस एवं द्रव मल निकाला जाता है। छाँक के रूप में नाक से बात मल निकलता है।
सम्पूर्ण त्वचा पर अन्दर से द्रव पसीना के रूप में निकला हुआ मल ठोस मल की एक पतली परत के रूप में जमा रहता है। इस प्रकार हमारा सम्पूर्ण शरीर एक मलायन (मलायतन) है। इस शरीर से जीव सांसारिक सुख-दुःखों का भोग करता है। इसलिये यह देह भोगायन (भोगायतन) है। यह शरीर नाना रोगों का क्रीडास्थल है। इसलिये इसे रोगायन (रोगायतन) कहते हैं। इन तीनों आयतनों को जानना ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ है।
यह शरीर त्रिधातुओं से युक्त है, इसलिये त्रियुगी है। त्रियुगिने नमः । इस शरीर से धर्म, अर्थ एवं काम का भोग किया जाता है, इसलिये यह त्रिभुगी है। त्रिभोगिने नमः।
वातपित्तकफज तीन रोगों से यह मस्त रहता है, इसलिये त्रिरोगी है। त्रिरोगिने नमः । इस देह के प्रसंग से मैं त्र्यम्बक मन्त्र को अर्थ :
त्र्यम्बकं यजामहे = हम अपने त्रियुगी शरीर की साधना कर रहे हैं। हम खाने पीने पेट भरने में लगे हैं। हम शरीर पूजा में संलग्न हैं। हम अपनी देह को स्वस्थ, निरोग एवं बलिष्ठ कर रहे हैं।
सुगंधिम् पुष्टिम् (च) वर्धनम् = इस देह के अंग प्रत्यंग सुचारु रूप से गति करते रहें, इनमें अशक्तता न हो। हम तन्द्रालु न हों। शरीर के समस्त अवयव पुष्ट दृढ़ एवं वर्धनशील हों, सुविकसित हो।
उर्वारुकम् इव बन्धनात् मृत्योः मुक्षीय मा अमृतात् = रोग (मृत्यु) के पाश (बन्धन) से हम सूर्य की तरह मुक्त (अलग रहें। हम कभी बीमार न हो, अशक्त न हों, आलस्ययुक्त न हों। हम सूर्य सदृश मुक्त एवं नियमबद्ध रहें। हम अमृत (दूध, शहद, आनंद) से वञ्चित न रहें, पृथक् न रहें। हमें मधुर खाद्य, पेय, लेख एवं चर्व्य पदार्थ सदा मिलते रहें।
इस मन्त्र का भाव यह है कि सर्वप्रथम हम पेट पूजा करें, अच्छा सुस्वादु एवं सुपाच्य भोजन करें। इसके बाद आलस्य रहित हो कर अपने इष्ट कार्य को सम्पन्न करने में लग जायें। सुभोज से हम कभी मुक्त न हों, युक्त हो ।
त्रयम्बकं यजामहे सुगंधि पतिवेदनम् = हम अपनी त्र्यम्बकदेह की देखभाल में लगे रहें, अपने स्वास्थ्य की चिन्ता करें। हम यह जानें कि इस देह के स्वास्थ्य की रक्षा किन-किन भोज्य पदार्थों एवं औषधियों से होती है तथा वे खाद्य सुगन्ध युक्त एवं सुस्वादु हो।
पतिवेदनम् का अर्थ है- पोषक तत्वों वा रक्षक औषधियों का ज्ञान । त्र्यम्बकम् से तात्पर्य है- वात पित्त कफ मय देह, त्रिदोषयुक्त शरीर।
उर्वारुकम् इव बन्धनात् इतः मुक्षीय मा अमृत सूर्य की तरह हम खान पान के बन्धन से मुक्त रहें।
जैसे सूर्य नदी झरनों समुद्रों सरोवरों कोष्ठों नालियों का शुद्ध अशुद्ध जल पीता रहता है, वैसे हम स्वास्थ्य हित में सर्वयों को पियें।
जैसे अग्नि (सूर्यात्मा सर्वभक्षी है, वैसे हम भी देह पुष्टि हेतु शाक मांसादि जो कुछ भी लब्ध हो, सब खायें। अतः मुक्षीय का अर्थ है-यहाँ पृथ्वी पर उत्पन्न/ पाये जाने वाले पदार्थों के खाने में जो खाद्य अखाद्य का साम्प्रदायिक जातीय देशीय कुलीय निषेध विधि सम्बन्धी नियम है, हम उससे मुक्त रहें।
मा अमुतः का अर्थ है :
हम उन स्वर्गीय सुखद पेयों से वंचित न रहूँ जो कुछ ही लोगों को मिलते हैं जो धनाढ्य वा श्री सम्पन्न होते हैं।
मन्त्र के अर्थ का भाव यह है-जैसे अग्नि में सूखा काष्ठ डाला जाता है तो वह शीघ्र जलता है। प्रज्जवलित अग्नि में गीला काष्ठ भी जल जाता है। अति प्रज्जवलित अग्नि को जल भी नहीं बुझा पाता, वह जल भी वाष्प बन जाता है।
अग्नि में तेल घृतादि पदार्थ उसे तीक्ष्ण करते हैं, ऐसे ही क्षुधा के तीव्र, तीव्रतर होने के अनुसार हम स्वास्थ्य हित में सब कुछ पीयें खायें। यहाँ पर विधि निषेध कुछ नहीं।
हम हानिकारक रोगकर गरिष्ठ कुपाच्य अपाच्य भोजन से मुक्त पृथक् हो किन्तु लाभकर आरोग्यकर सुपाच्य सुस्वादिष्ट भोजन से मुक्त न हो। अर्थात् स्वास्थ्यकर भोजन हमें मिलता रहे। भोजन के संबंध में विधि-निषेध स्वास्थ्य की दृष्टि हो न कि अन्य किसी दृष्टि से यह वैदिक विचार है।
व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन करेगा ही। प्रकृति विरुद्ध भोजन किसी को इष्ट नहीं होता। सात्विक प्रकृति वाला सात्विक आहार लेता है। राजसी स्वभाव वाला राजसिक भोजन करता है। तामसी व्यक्ति तामसी खाद्यों से प्रेम करता है। इसमें व्यवधान का प्रश्न ही नहीं।
जिसे मांस प्रिय हो, उपलब्ध हो, वह उसे खाये। जिसे शाक फलादि प्रिय हों वे उसे खायें। गन्दा दूषित बासी जूँठा जिसे मिले, वह उसे भक्षे ताजा शुद्ध सुगंधित जिसे मिले वह उसे खाये। ६ रस होते हैं।
जो रस जिसे अच्छा लगे उसे वह ले। भोजन का लक्ष्य एक है- प्रथम क्षुधा शांति एवं पुष्टि, द्वितीय स्वाद एवं तृप्ति ।
अग्नि सब कुछ पहण करती है। जो हम खाये वा जो हम खाने पाने की इच्छा करते हैं, उस-उसकी आहुति हम अग्नि को दें। जो हम अग्नि को देंगे, वह कई गुना होकर हमें पुनः अग्नि से प्राप्त होता है। जो देगा, वह पायेगा ही। जो नहीं देगा, वह नहीं पायेगा। जो, जो देगा, वह वही पायेगा भी। यह सत्य है। इसमें किंचित् सन्देह नहीं।
इस जीवन का सार है- ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ मंत्र देह की उपासना हेतु हर देही इस मंत्र को प्रयोग में लाये एवं जाने।
मंत्र में ‘इतः मुक्षीय मा अमुतः’ विशेष ध्यातव्य है। इसका तात्पर्य है-अमुक अमुक से मुक्ति और अमुक अमुक से मुक्ति नहीं। अर्थात् निषेध एवं विधि दोनों होना है। यह यह नहीं होना चाहिये, यह यह होना चाहिये।
चरक ने १२ वेगों का निषेध किया है। इन वेगों को रोकना नहीं चाहिये इन्हें मुक्त करना, पृथक करना, छोड़ना चाहिये।
न वेगान् धारयेद्धीमान् जातान् मूत्रपुरीषयोः।
न रेतसो न वातस्य न वम्याः न क्षवयोर्न च॥
नोद्वारस्य न जृम्भायाः न वेगान् शुत्पिपासयोः।
न वाप्पस्य न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च॥
(चरक संहिता सूत्रस्थान ७ ।२, ३ )
बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि वह मूत्र, पुरीष, वीर्य, मलवात्, के, छोक, डकार, जम्हाई, भूख, प्यास, आँसू, निद्रा- इनके वेगों को तथा थकावट से उत्पन्न हुए श्वास के वेगों को न रोके। जब ये वेग उत्पन्न हो जायें तो इनका रोकना हानिकारक है। कास (खाँसी) के वेग को भी नहीं रोकना चाहिये। इनको रोकने से रोग होता है।
इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च।
साहसानामशस्तानां मनोवाक्काय कर्मणाम्॥
लोभशोक भय क्रोधमानवेगान् विधारयेत्। निर्लज्ज्येयतिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान्॥
~चरक संहिता (सूत्रस्थान ७ ।२५, २६)
अपना हित चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि वह इस जन्म में तथा जन्मान्तर में निश्चित रूप से इन वेगों को रोकने का यथा संभव प्रयत्न करे। जैसे- साहस (अपनी शक्ति व सामर्थ्य से अधिक बलवत्कर्म करना), तथा मन, वचन, शरीर द्वारा अशस्त कर्म करना दुश्चिन्तन, दुर्वचन एवं दुष्कर्म लोभ, शोक, भय, क्रोध, सम्मान पाने की ललक, निर्लज्जता, ईर्ष्या (दूसरे को उन्नति देख कर दुःखी रहना), किसी विषय में अत्यन्तराग तथा अभिद्रोह अथवा परधन को हस्तगत करने की इच्छा प्रभृति मन के वेगों को रोकना चाहिये।
परूष्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च।
वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद् वेगभुत्थितम्॥
देहप्रवृत्तिर्या काचिद्वर्तते परपीडया।
स्त्रीभोगस्तेय हिंसाद्या तस्या वेगान् विधारयेत्॥’
~चं. सं. सूत्रस्थान (७।२७, २८)
अत्यन्त कठोर वचन वा कठोर एवं अत्यधिक भाषण, हृदय को चुभने वाले वाक्य, झूठे वचन, असमय पर के वचन वा समय एवं अवसर को ध्यान में न रख कर कहे गये वचनों के वेग को रोकना चाहिये कोई भी शारीरिक कर्म जो दूसरों को पीड़ा देने वाले हों जैसे-परस्त्री संभोग, चोरी, हिंसा आदि के वेगों को भी रोकना चाहिये।
त्र्यम्बकम् । त्र्यम्बकम्' क्या है ? तीन गतियाँ कौन-कौन ? १. सम्यक आहार २. सम्यक आचार। ३. सम्यक व्यायाम इन तीनों का योग ही त्र्यम्बकम् है। इस त्र्यम्बक की उपासना के बिना जीवन भार, पीड़ा एवं दुःख है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य इसके बिना सम्भव नहीं। बिना सम्पूर्ण स्वास्थ्य के सुख नहीं आनन्द नहीं। अतएव त्र्यम्बकं यजामहे।कृष्ण कहते हैं :
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।
~गीता (६ । १७)
१. युक्त आहार विहार, २. कर्मसु युक्त चेष्टा, ३. युक्त स्वप्नावबोध इन तीनों का योग (समवेतीकरण) दुःखनाशक होता है। युक्त आहार विहार का अर्थ है-समय एवं सामर्थ्य के अनुकूल भोजन एवं मैथुन । कर्मों में युक्त चेष्टा का अर्थ है-शक्ति के अनुकूल श्रम एवं व्यवहार युक्त स्वप्नावबोध से तात्पर्य है- समय पर सोना एवं जागना तथा उचित मात्रा में शयन जागरण करना।
इन तीनों युक्तों (युक्तियों) को त्र्यम्बक कहते हैं। यह त्र्यम्बक योग दुःखनाशक है। ऐसा गीता शास्त्र का वचन है। अस्मै त्र्यम्बक योगाय नमः ।
तीन को एक साथ लेकर चलना त्र्यम्बक योग है। तीन प्रमुख कर्म हैं- १. भोजन, २. भोगन, ३. भजन। ये तीन भकार कर्म त्र्यम्बक हैं। भोजन से उदर तृप्ति होती है। भोगन से उपस्थ शांति होती है तथा संतति मिलती है। भजन (परमात्मा में मन लगाना) से चित्त प्रसन्न रहता है।
पेट की अग्नि (जठराग्नि) से क्षुधा लगती है। भोजन से यह शान्त होती है। जननेन्द्रिय की अग्नि (कामाग्नि) से मस्तिष्क उद्वेलित हो उठता है। इसकी शांति मैथुन (इन्द्रिय भोग) से होती है। जो बुद्धि की अग्नि होती है, उससे अन्तःकरण हिल उठता है।
अन्तःकरण को शांत रखने के लिये भगवान् का भजन अति आवश्यक है। इन तीनों की शांति ही ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ है।
भगवान के भजन में त्र्यम्बक मार्ग का अवलम्बन सरल एवं प्रशस्त है। इस मार्ग में तीन नामों का एक त्र्यम्बक होता है। ये तीन नाम क्या हैं ?
१. हरि, २. राम, ३. कृष्ण इन तीनों नामों का सम्बोधन एक वचन रूप है- १. हरे । २. राम । ३. कृष्ण । इन तीनों सम्बोधन पदों से एक मन्त्र की रचना नारायण ऋषि ने की है।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे हरे. कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे.
~कलिसंतरणोपनिषद्.
यह मंत्रराज है। यह अद्भुत मंत्र है। इस मंत्र में न कर्ता है, न क्रिया है, न कर्म है, न कारण है, न उद्देश्य है, न विधेय है। इसमें केवल सम्बोधन है। इस सम्बोधन में भाव है। भाव में भगवान् है। भाव सूक्ष्म है। भगवान् सूक्ष्म है।
सूक्ष्म की प्राप्ति सूक्ष्म से होने के कारण भाव की पहुँच भगवान् तक है। इन मंत्र में परमात्मा का आह्वान है, भगवान् को उनके तीन नामों से बुलाया गया है, भाव पूर्वक पुकारा गया है। भाव की पुकार ही परमात्मा सुनता है। भावहीन पुकार के लिये वह बहरा है। यह सूर्य मन्त्र है। सूर्य के तीन नाम हैं। ये नाम गुणों से युक्त हैं जो स्वयं हरित् (प्रसन्न है वह हरि है तथा वह दूसरों को प्रसन्न (हराभरा) करता है। सूर्य रश्मियों का यह गुण है। जो सुन्दर सुरम्य है, वह राम है। सूर्य किरणें राम हैं। जो आकर्षक है, वह कृष्ण है। सूर्य किरणे जल (आर्द्रता) का कर्षण (शोषण) करती हैं।
इसलिये सूर्य प्रकाश ही राम, कृष्ण एवं हरि है। प्रकाश ज्ञान है। सूर्य ब्रह्म है। सूर्य प्रकाश ब्रह्मज्ञान इस प्रकार राम, कृष्ण, हरि-ये तीन नाम ब्रह्मज्ञान हैं। बोधसहित ये नाम जिस की जिह्वा पर है, वह ब्रह्मज्ञानी है।
ज्ञान के तीन गुण हैं-हरण करना, खाँचना, रमण करना। ज्ञान से दुःखों का हरण होता है। ह हरणे हरि ज्ञान हरि है। प्रकाश हरि है। ज्ञान सब को अपनी ओर खींचता है। सभी ज्ञान की ओर स्वभावतः उन्मुख होते हैं। सबको संकर्षित करना ज्ञान का गुण है। कृष् कर्षणे कृष्ण ज्ञान कृष्ण है। प्रकाश कृष्ण है। ज्ञान सर्वत्र सब में नाना प्रकार से विद्यमान रहता है। रम् रमणे राम ज्ञान राम है।
इस प्रकार ज्ञान के तीन नाम-राम, कृष्ण, हरि हरे कहने से ज्ञान सत्वर उपस्थित होता है। राम कहने से ज्ञान तुरन्त प्रकट होता है। कृष्ण कहने से ज्ञान सहसा जागृत होता है। इस तरह त्र्यम्बक मंत्र, ज्ञानमंत्र है।





