शशिकांत गुप्ते
मच्छर और खटमल दोनो ही काटने वाले कीटाणु है।
खटमल की प्रजाति के बारे में लेखक को जानकारी नहीं है।
मच्छरों की प्रजातियों के बारे में दो विभिन्न मत प्रचलित हैं।
एक मत के अनुसार 2500 और दूसरे मत के अनुसार 3500 मच्छरों की प्रजाति होती हैं।
इन प्रजातियों में काटने वाले मच्छर मात्र सौ ही होते हैं।
जंतुओं पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कथन है,इंसानों को मादा मच्छर ही काटती है। मच्छर काटते नहीं है असल में इंसानों का खून चूसते हैं।
मच्छरों में एक खास गुण होता है, मच्छर भगाने या मच्छर मारने की दवाई का छिड़काव करने के बाद कीट नाशक दवाई की महक जबतक वातावरण में होती है,तबतक मच्छर वातावरण से दूर रहते हैं,जैसे ही दवाई की महक खत्म होती है मच्छर वापस आ जाते हैं।
मच्छरों पर कीट नाशक दवाई का असर कम होने का कारण मच्छरों की immunity मतलब मच्छरों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है। मच्छर मादा एक साथ दो सौ से पांच सौ अंडे देती है।
मच्छर इंसानों का सिर्फ खून ही नहीं चूसते बल्कि मच्छर इंसानों के शरीर में रोग भी फैलाते हैं।
मच्छरों में एक विशेषता है,मच्छर खून चूसने के पूर्व घुनघुन की आवाज से इंसान को आगाह भी करते है,लेकिन इंसानो का खून चूसने वाले अन्य प्राणी गोपनीय तरीके से इंसानों का खून चूसते हैं।
मच्छरों और खटमलो पर हास्य व्यंग्य के प्रख्यात कवि स्व.काका हाथरसी की निम्न कविता प्रासंगिक है।
काका’ वेटिंग रूम में फँसे देहरादून
नींद न आई रात भर, मच्छर चूसें खून
मच्छर चूसें खून, देह घायल कर डाली
हमें उड़ा ले ज़ाने की योजना बना ली
किंतु बच गए कैसे, यह बतलाएँ तुमको
नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको
हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर
ऊपर मच्छर खींचते नीचे खटमल वीर
नीचे खटमल वीर, जान संकट में आई
घिघियाए हम- “जै जै जै हनुमान गुसाईं
पंजाबी सरदार एक बोला चिल्लाके
त्वाह्नु पजन करना होवे तो करो बाहर जाके
साठ के दशक में भी मच्छरों के प्रकोप से बचने के लिए काकाजी ने हनुमान जी का ही नाम लिया था।
हनुमान संकट मोचन भगवान है।
राम,रावण युद्ध के समय लक्ष्मणजी मूर्छित हुए तब हनुमानजी ने संकट मोचन होने का अपना दायित्व निभाया था।
किसी संत ने कहा है,निहायत ही छोटी सी समस्याओं के लिए भगवान का स्मरण करना ना सिर्फ भगवान के महत्व को कम करना है,बल्कि यह मानवों की स्वार्थ पूर्ति की पराकाष्ठा है।
खून चूसने वाले मच्छर प्रायः गंदी जगह जहाँ जल जमाव होता है,ऐसी जगह ही पैदा होते हैं,पलते बढ़ते हैं।
स्वार्थ पूर्ति का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है,इंसान गंदा नाला साफ नहीं करता है,लेकिन मच्छर मारने की दवाइयां तादाद में निर्मित करता है।
इसीलिए बाह्य सफाई से ज्यादा दिमागी सफाई करना अनिवार्य है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





