पवन कुमार
पुराणो में विष्णु को प्रकृति- पुरुष दोनों का कारण माना गया है। विष्णुपुराण के अनुसार विष्णु के उपाधिरहित परम स्वरूप से प्रधान और पुरुष दो रूप होते हैं। विष्णु को ही कालशक्ति के द्वारा विश्वकी सृष्टि एवं प्रलय के समय भी एकमात्र निर्विकार स्वीकार किया गया है। उन्हीं के निर्देशानुसार ब्रह्माजी उन्हीं के नाभिकमल पर स्थित रहकर सृष्टिकारक होते हैं। विष्णुपुराण ने ब्रह्माजी को भगवान् विष्णु का रूपान्तर माना है।
शिवपुराणानुसार शिवकी ही प्रेरणासे यह समस्त कार्य होता है। सृष्टिकार्यमें रुद्रका भी सहयोग आवश्यक ही नहीं प्रत्युत अनिवार्य है, यह मत श्रीमद्भागवतपुराण एवं मार्कण्डेयपुराणने भी स्वीकार किया है। ज्योतिषशास्त्रके मूर्धन्य मनीषी श्रीपराशरजीने ‘बृहत्पाराशरहोराशास्त्र’ नामक ग्रन्थमें व्यक्ताव्यक्तात्मक विष्णुको वासुदेवके नामसे प्रतिपादित किया है।
उनकी ही तीनों मूर्तियाँ संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध तामस, राजस एवं सात्त्विक शक्तियोंके रूपमें प्रतिष्ठित हैं। श्रीपराशरजीने ग्रन्थके आरम्भमें ही सृष्टिक्रमका वर्णन किया है, जो प्रायः पुराणोंके सृष्टिक्रमके अनुसार ही है। पुराणोंमें नवविध सर्ग प्रतिपादित है तथा श्रीपराशरजीने भी देव, भूतादिक कतिपय सर्गोंको स्वीकार किया है।
पुराणोंके अनुसार ही उन्होंने श्रीशक्तिसमन्वित विष्णु को जगत्पालक, भूशक्तियुक्त ब्रह्माको जगत्स्रष्टा तथा नीलशक्तिसमन्वित रुद्रको जगत्का संहारकर्ता माना है.
श्रीशक्त्या सहितो विष्णुः सदा पाति जगत्त्रयम्।
भूशक्त्या सृजते विष्णुर्नीलशक्त्या युतोऽत्ति हि॥
~बृहत्पाराशरहोराशास्त्र (पूर्व० १ । १९)
अवतारवादकी पूर्वपीठिकामें श्रीपराशरजी मैत्रेयजीसे कहते हैं—हे ब्रह्मन्! सभी जीवोंमें परमात्मा स्थित है और यह समस्त जगत् परमात्मामें स्थित है। सभी जीवोंमें दो अंश होते हैं; किसीमें जीवांश अधिक होता है तथा किसीमें परमात्मांश। सूर्यादि ग्रह, ब्रह्मा, शिव आदि देवता तथा अन्य अवतारोंमें परमात्मांश अधिक होता है। इनकी जो शक्तियाँ (लक्ष्मी आदि) हैं, उनमें भी परमात्मांश अधिक होता है; अन्य देवता और उनकी शक्तियोंमें जीवांश अधिक होता है।
इसपर श्रीमैत्रेयने कहा- -मुनीश्वर पराशरजी! राम, कृष्ण आदि जो विष्णुके अवतार हैं, क्या वे भी जीवांशसे युक्त हैं? यह मुझे समझाकर कहें। इसपर पराशरजी बोले-
रामः कृष्णश्च भो विप्र नृसिंहः सूकरस्तथा।
एते पूर्णावताराश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विताः॥
~बृहत्पाराशरहोराशास्त्र (पूर्व० १ । २५)
हे विप्र ! राम, कृष्ण, नृसिंह तथा सूकर-ये चार अवतार पूर्णतः परमात्माके अंश हैं अर्थात् पूर्णावतार हैं,अन्य अवतार जीवांशसमन्वित हैं।
अजन्मा परमात्माके अनेक अवतार हैं। ग्रहरूपी जनार्दन (अवतार) जीवोंको उनके कर्मानुसार शुभाशुभ फल देनेवाले हैं। दैत्योंके बलनाश, देवताओंकी बल- बुद्धिकी वृद्धि एवं धर्मसंस्थापनके लिये ही ग्रहोंसे ये कल्याणकर अवतार हुए हैं.
अवताराण्यनेकानि ह्यजस्य जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः
दैत्यानां बलनाशाय देवानां बलवृद्धये। परमात्मनः।
धर्मसंस्थापनार्थाय ग्रहा जाताः शुभाः क्रमात्॥
~बृहत्पाराशरहोराशास्त्र (पूर्व० १ । २६-२७)
अवतार इस प्रकार हैं :
१ – रामावतार सूर्यसे,
२- कृष्णावतार चन्द्रसे,
३ – नृसिंहावतार भूमिपुत्र मंगलसे,
४- बुद्ध अवतार बुधसे,
५- वामनावतार बृहस्पतिसे,
६- परशुरामावतार शुक्र (भार्गव) – से,
७- कूर्मावतार शनिसे,
८- सूकरावतार सिंहिकापुत्र राहु से एवं ९-मत्स्यावतार केतु से हुआ है।
अन्य जो अवतार हैं, वे भी ग्रहोंसे ही हैं। जिन अवतारोंमें परमात्मांश अधिक हैं, वे सभी खेचर (आकाशचारी देव) कहलाते है.
रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः।
नृसिंहो भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च॥”
वामनो विबुधेज्यस्य भार्गवो भार्गवस्य च।
कूर्मो भास्करपुत्रस्य सैंहिकेयस्य सूकरः॥
केतोमनावतारश्च ये चान्ये तेऽपि खेटजाः।
परमात्मांशमधिकं येषु ते च वै खेचराभिधाः॥
~बृहत्पाराशरहोराशास्त्र (पूर्व० १।२८ – ३०)
जिनमें जीवांशकी अधिकता है, वे जीव कहलाते हैं। सूर्यादि ग्रहोंसे परमात्मांश निकलकर राम-कृष्ण आदिके रूपमें अवतार ग्रहण करते हैं और राम- कृष्ण आदिके रूपमें अवतीर्ण वे (परमात्मांश) अपना अवतरण-कार्य सम्पन्नकर उन्हीं सूर्यादि ग्रहोंमें पुनः विलीन हो जाते हैं।
इसी भाँति उन्हीं सूर्यादि ग्रहोंसे निर्गत जीवांश मनुष्यादि प्राणी होते हैं। वे भी अपना कार्यकाल समाप्तकर उन्हीं ग्रहोंमें विलीन हो जाते हैं। वे सूर्यादि नवग्रह प्रलयके समय अव्यक्त परमात्मामें समा जाते हैं.
जीवांशमधिकं येषु जीवास्ते वै प्रकीर्तिताः।
सूर्यादिभ्यो ग्रहेभ्यश्च परमात्मांशनिः सृता॥
रामकृष्णादयः सर्वे ह्यवतारा भवन्ति वै।
तत्रैव ते विलीयन्ते पुनः कार्योत्तरे सदा॥
जीवांशनिः सृतास्तेषां तेभ्यो जाता नरादय:।
तेऽपि तथैव लीयन्ते तेऽव्यक्ते समयन्ति हि॥
~बृहत्पाराशरहोराशास्त्र (पूर्व० १।३१-३३)





