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न्याय पाना हम सबका नागरिक अधिकार

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अमिता नीरव

कसाब अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। जब उस पर केस चल रहा था, तब मुझे बड़ी उलझन हुई थी कि जब अपराधी अपराध करते हुए पकड़ा गया है तो उसे सीधे सजा सुनाई जानी चाहिए, इतनी लंबी प्रक्रिया कर देश का पैसा, समय और संसाधनों का दुरुपयोग क्यों किया जा रहा है।

धीरे-धीरे न्याय औऱ उसकी अवधारणा पर विचार करना शुरू किया तो कई ऐसी चीजें साफ तौर पर समझ आई, जो अलग-अलग तरह से सुनी तो थी, लेकिन समझी नहीं गई थी। उसमें एक बात यह भी कि अपराध के आरोपी के भी नागरिक और मानवीय अधिकार है, न्याय पाना उनमें से एक है।

बहुत बचपन की बात है, देश में रेल दुर्घटना हुई तो रेल मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। खुद से सवाल किया कि यदि रेल दुर्घटना होती है तो दुर्घटना के कारणों और क्या बचाव किया जा सकता है, उसकी तफ्तीश की जानी चाहिए, जब रेल मंत्री इसके लिए जिम्मेदार हों तब उसे हटाया जाना चाहिए। मंत्री ने पहले ही इस्तीफा क्यों दे दिया?

थोड़े वक्त के बाद समझ आया कि यदि आरोपी पद पर रहता है तो स्वतंत्र जाँच संभव नहीं हो पाएगी। पद पर रहते हुए आरोपी जाँच को प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्वतंत्र जाँच के लिए सबसे पहली शर्त यह है कि जिस पर आरोप है, उसे सबसे पहले पद से हटाया जाए। तभी निष्पक्ष जाँच हो पाएगी।

भारत में खेलों की दुनिया में खेलों के अलावा हो रहे विवाद में भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष और बीजेपी के सांसद बृजभूषण शरणसिंह पर कुश्ती खिलाड़ियों ने यौन उत्पीड़न और सुविधाएँ न मिलने के आरोप लगाए हैं। जनवरी में शुरु हुए विवाद के पाँच महीने बाद भी आरोपी खुलेआम घूम रहा है।

इस सिलसिले की बहुत अटपटी बात यह है कि न सिर्फ सत्ता के समर्थक बल्कि कथित निरपेक्ष लोग भी तर्क दे रहे हैं कि जब यौन उत्पीड़न हो रहा था, तब ये लड़कियाँ क्यों नहीं बोली? ‘तब क्यों नहीं बोले?’, ये इस सत्ता का वो अचूक हथियार है, जिसके सामने अच्छे-अच्छे सूरमा लड़खड़ा जाते हैं।

इस हथियार का इस्तेमाल करके समाज उन्हीं लोगों को कटघरे में खड़ा कर देता है, जो आरोप लगा रहे हैं। जब #मी_टू मूवमेंट चल रहा था, तब भी सत्ता समर्थक उन्हीं महिलाओं पर हमलावर थे, जिन्होंने उत्पीड़न का आऱोप लगाया था। मजेदार बात यह कि ये तर्क इतना सूटेबल है कि हर कोई इसे हथियार की तरफ धारण करने लगा है।

मेरे पास एकाधिक उदाहरण है, जिसमें अप्रत्याशित रूप से किए गए साधारण से सवालों के जवाब देने में या काउंटर करने में अच्छे-अच्छे तार्किक लोग गच्चा खा जाते हैं। हर कोई उतना प्रत्युत्पन्नमति नहीं होता है कि उसे तुरंत सवालों के अकाट्य जवाब सूझ जाए।

सोचिए कि जब अप्रत्याशित सवालों पर आम इंसान गच्चा खा सकता है, तो स्त्री (चाहे वो जिस परिवेश से आती हों, चाहे वो जिस पद पर हों) के लिए यौन उत्पीड़न का तुरंत प्रतिकार करना और उसके बारे में कहना क्या आसान होगा? जो लोग ये तर्क देते हैं, क्या वे हमारी सामाजिक बनावट और पीड़ित के मनोविज्ञान को नहीं समझते हैं?

हमारे समाज में अब तक यह होता आया है कि यौन उत्पीड़न या लैंगिक दुर्व्यवहार की शिकायत करती स्त्री से ही सवाल किए जाते हैं, उन्हीं पर शक किया जाता है, उन्हीं पर आरोप भी लगाए जाते हैं, इसलिए अमूमन स्त्री शिकायत करने का साहस नहीं कर पाती हैं। क्या ये आपकी समझ नहीं आता है! मी टू में अनुष्का शंकर का उदाहरण क्या आपको सोचने के लिए मजबूर नहीं करता है!

चलिए एकबारगी मान लिया जाए कि लड़कियाँ ट्रायल से बचने के लिए ये आरोप लगा रही हैं, तब भी यह सिद्ध करने के लिए भी तो उनके आरोपों पर कार्रवाई की जानी चाहिए न? चकित हूँ कि खिलाड़ी प्रदर्शन कर रहे हैं औऱ आरोपी न सिर्फ पद पर बैठा है, बल्कि लगातार अर्नगल बयानबाजी कर रहा है।

आखिर कौन है बृजभूषण शरण सिंह? सरकार को उससे क्या डर है! क्यों नहीं सरकार हटा कर लड़कियों के आऱोपों की जाँच करवाती? क्या डर है और क्यों डर है!

जब खिलाड़ी मैडल लेकर आते हैं तो प्रधानमंत्री उनसे बात करते हैं, उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं। और जब खिलाड़ी अपनी समस्या लेकर आते हैं तो माननीय मुँह में दही जमाकर बैठ जाते हैं! आप इसलिए चुप हैं कि ये सांसद आपकी पार्टी से हैं!

इतनी निर्लज्जता कहाँ से आती है, क्या है इसका स्रोत! इसका स्रोत आप ही लोग हैं, जो उन लोगों से सवाल करते हैं, उन लोगों पर आरोप लगाते हैं, उन लोगों का मजाक बनाते हैं, उन पर अविश्वास करते हैं, उन्हें ही टारगेट करते हैं, जो अन्याय की शिकायत करते हैं।

कायदे से होना यह चाहिए कि जो आरोप लगाए, उसके साथ खड़े हों। उसके आरोपों की जाँच के लिए सत्ता पर दबाव बनाएं, होता यह है कि आप उन लोगों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, जो ताकतवर हैं। यदि आरोप झूठे हैं तो उसे झूठा सिद्ध करने के लिए भी तो जाँच करने की जरूरत है।

जंतर मंतर पर दिल्ली पुलिस ने जिस तरह से उनके प्रदर्शन का दमन किया है, उससे ये समझ नहीं आ रहा है आपको कि यदि पुलिस औऱ सरकार उस कद के लोगों का दमन कर सकती है तो फिर आप हम क्या क्या हैं? कभी भी हमारे साथ भी यह किया जा सकता है।

न्याय पाना हम सबका नागरिक अधिकार है। ये लड़कियाँ भी उसी न्याय की माँग कर रही है। दमन करके सरकार आपको ये संदेश देना चाहती है कि अधिकारों की माँग करने वालों को दमन मिलेगा। अभी भी यदि आप पीड़ितों के साथ नहीं खड़े हुए तो अगले पीड़ित आप भी हो सकते हैं।

Ramswaroop Mantri

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