~ दिव्या गुप्ता
अकबर और राणा प्रताप दोनों साढ़ू थे. मानसिंह की एक बहन अकबर से ब्याही थी, दूसरी राणा प्रताप से.
अकबर और राणा प्रताप के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी. राणा अकबर की अधीनता करने के लिए राजी थे, लेकिन मुद्दा केवल इतना था कि अकबर 5 हजारी मनसब दे रहा था और राणा 10 हजारी मांग रहे थे, ताकि दूसरे राजपूत राजाओं से वह खुद को बड़ा साबित कर सकें.
(“मनसब” फारसी भाषा का शब्द है. इसका अर्थ है पद, दर्जा या ओहदा..जिस व्यक्ति को सम्राट अकबर मनसब देता था, उस व्यक्ति को मनसबदार (Mansabdar) कहा जाता था. अकबर ने अपने प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को कोई-न-कोई मनसब (पद) अवश्य दिया था)
अकबर और राणा प्रताप की लड़ाई का इतिहास हमे ऐसे पढ़ाया जाता है जैसेकि अकबर और प्रताप आमने सामने लड़ रहे थे! अकबर लगभग आधा भारत का सम्राट था जबकि राणा प्रताप एक छोटी सी रियासत का राजा था. इसीलिए राणा प्रताप के साथ जो लड़ाई हल्दीघाटी में हुई थी, वहाँ अकबर कभी गया ही नही.
अकबर की ओर से तो जयपुर के राजा मान सिंह लड़ रहे थे और उसकी सेना में अधिकतम राजपूत सिपाही थे. राणा प्रताप की फ़ौज़ की कमान हकीम खान सूर के हाथ में थी जिनकी सेना में मुसलमान (पठान) और हिंदू (अधिकतम भील, वाल्मीकि .sc/st और कुछेक राजपूत भी) थे.
तो क्या इस लड़ाई को हिन्दू और मुसलमान की लड़ाई कहा जा सकता है जैसा कि आजकल लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की जा रही है?
अकबर अपने राज्य का विस्तार कर रहे थे, जिसमें सभी छोटी-बड़ी रियासतें शामिल हो रही थीं. यह कोई प्रेम संबंध जैसा नहीं था बल्कि फौजी ताकत से किया जा रहा था.
अकबर अपने मातहत राजाओं को यथायोग्य पद भी देता था. राणा प्रताप को पांच हजारी का पद (मनसब) ऑफर किया गया था, लेकिन राणा प्रताप दस हजारी मनसबदारी (दस हजार सिपाहियों का सरदार) चाहते थे जिसे अकबर ने ठुकरा दिया था, लेकिन जब उनके पुत्र राणा अमर सिंह को अकबर के पुत्र जहांगीर ने दस हजारी का ओहदा (मनसब) दिया तो वे मुग़ल साम्राज्य में शान से शामिल हो गए!
अब जरा गंभीरता से सोचिये कि राणा प्रताप को राष्ट्रीय हीरो, राष्ट्र का प्रतीक और हिंदुत्व का प्रतीक बनाने और स्वतन्त्रता सेनानी बनाने का क्या औचित्य है? ध्यान रहे, उस वक़्त देश या राष्ट्र की कोई कल्पना ही नहीं थी, सिर्फ मेवाड़ को देश या राष्ट्र कहना कहाँ तक उचित है?
यह भी ध्यान रहे कि मुगल अफगानिस्तान के थे, और उस समय अफगानिस्तान भारत का ही एक मजबूत हिस्सा था. इसलिए मुगल/मुसलमान विदेशी नहीं थे. अगर वे विदेशी होते तो यहाँ रचते-बसते नहीं, अंग्रेजों की तरह यहां की धन-दौलत साफ कर चले जाते.
दूसरे, अगर वे विदेशी होते तो उनके खिलाफ कभी न कभी भारत छोड़ो आंदोलन होता. क्या कभी ऐसा हुआ?
देश को महान और विश्वगुरु बनाने वाले महान चक्रवर्ती सम्राट तो चंद्र गुप्त मौर्य, अशोक मौर्य, विक्रमादित्य, कनिष्ठ, हर्ष वर्धन, छत्रपति शिवाजी और महाराजा रणजीत सिंह थे. अगर जयंती मनानी है तो इनकी मनाइए, लेकिन ऐसा आप करेंगे नहीं, क्योंकि ये सभी शूद्र थे!
ध्यान रहे, सवर्णो/क्षत्रियों ने न तो कभी देश की सीमाओं से बाहर कोई युद्ध किया है और न ही ये कभी किसी युद्ध में जीते हैं. इनके खाते में गद्दारियाँ और कोरी हार ही हार रही हैं. (चेतना विकास मिशन).
| ReplyForward |




