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*मजहबी धर्म, वामपंथ और धर्मनिरपेक्षता*

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           कुमार चैतन्य

विचार में वामपंथी होना फैक्चुअली कोई बुरी बात नहीं है । सेंटर की विचारधारा अधिक प्रैक्टिकल होने के कारण एक फैशन सिंबल बन गई है वरना, लोकतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ी वाम के तरफ झुकी विचारधारा ही हम सब के लिए लाभकारी होती है।

      दास कैपिटल में मार्क्स लिखते हैं कि शाम को चर्च के घंटे जोर जोर से इसलिए बजाए जाते हैं कि दिन भर के श्रम से थक हार कर घर लौट रहे मजदूर का ध्यान इस बात पर ना जाए कि उसका शोषण हो रहा है , वो अपने हाड़तोड़ मेहनत के बदले मिली मामूली मजदूरी को गॉड की इच्छा मानकर स्वीकार कर ले।

      चर्च में जोर से प्रार्थनाएं इसलिए की जाती हैं कि मजदूर के बच्चे जब रोटी मांगे तो उसकी मां उसे चर्च से आती प्रार्थनाएं सुना दे जिससे उनको खाली पेट भी अच्छी नींद आ जाए। 

       मार्क्स बोलते हैं कि चर्च को कैपिटलिस्ट चंदा देते हैं तो चर्च उनके हितों के लिए मजदूरों के अधिकारों को नजरंदाज करते हैं। मजदूर संडे को चर्च में जब फादर को अपनी तकलीफ बताते हैं तो फादर उनको कभी क्रॉस, तो कभी होली वॉटर, तो कभी वाइन देकर उनको दिलासा देता है कि गॉड उनको सुन रहा है लेकिन कभी भी कोई चर्च, कोई धर्म गुरु, कोई भी पादरी कभी भी किसी मजदूर को अपने राजा, अपने मालिक के खिलाफ क्रांति करने को नही कहता है।

      इसके बदले राजा भी धर्म को, राज्य में बराबर सम्मान देता है। बड़े बड़े उद्योगपति नेता मंत्री अलग अलग धर्मगुरुओं को फाइनेंस करते हैं ताकि उनकी मोनोपॉली चलती रहे। इसीलिए मार्क्स सर्वहारा से कहते हैं कि इन पाखंडियों के चक्कर में मत आओ, संघर्ष करो और अपना हक छीन लो। 

      मार्क्स व्यवस्था का संचालन जनता के हाथों में देना चाहते हैं। ऐसी जनता जो आडंबरों से प्रभावित न हो और अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती हो।

अब भारतीय दर्शन में मार्क्सवाद की बात करते हैं। भारत का दर्शन आदिकाल से ही क्रांति का पक्षधर रहा है। हमारे पौराणिक ग्रंथ मार्क्स के पैदा होने के हजारों साल पहले से हमको अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखा रहे थे। कई भारतीय विद्वान ऐसा भी मानते हैं कि मार्क्सवाद भागवत गीता से काफी प्रभावित थे और उनके दर्शन और राज्य की अवधारणा में गीता का संदेश साफ झलकता है।

     डॉ सिन्हा ने तो “मार्क्सवाद और गीता” के नाम से एक किताब भी लिखी है। 

   गीता में कृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा था ? 

राजा अगर अंधा है और उसे जनता का हित नहीं दिख रहा है तो अपने अधिकार के लिए स्वयं खड़े होकर लड़ो भले अपने भाइयों से ही क्यों न लड़ना पड़े! भीष्म, द्रोण जैसे ज्ञानी लोग भी अगर सत्ता की तरफ से अन्याय के साथ खड़े हैं तो उनको भी मत छोड़ो। कर्ण, अश्वत्थामा जैसे शक्तिशाली भी अगर तुम्हारे सामने हैं तो भी लड़ो। कृष्ण ने अर्जुन को भाग्य के या भगवान के भरोसे नहीं छोड़ा उन्होंने उसे अपना भाग्य खुद लिखने का उपदेश दिया।

    वाल्मीकि ने राम के जीवन से हमें क्या संदेश दिया ? 

राम ने वनवासियों की एक सेना बनाई जिसने अत्याचारी राजा के तंत्र को समाप्त किया। 

    राम राज्य की अवधारणा ही क्या है?

जिस राज्य में जनता सुखी हो, संपन्न हो, जनता की आवाज राजा तक सहज रूप से पहुंचे, राजा अपने सुख से ऊपर राज्य के आदर्शों को रखे यही तो राम राज्य की सीख है। 

     चार्वाक दर्शन का पहले भी यहां जिक्र कर चुका हूं। इनके दर्शन को “लोकायत”  कहते हैं। लोकायत का अर्थ ही है “लोक (जनता) के अधिकार के लिए” बृहस्पत संहिता में इंद्र के लिए जो राजा का धर्म देवगुरु बृहस्पति ने समझाया है चरवाको की अवधारणा उसी से प्रेरित मानी गई है। चाणक्य ने भी बृहस्पत संहिता से राज्य के अर्थ संबंधी कई सिद्धांत अपनी नीति में लिए हैं। 

सतयुग में भी जाबालि जैसे ऋषि हुए हैं जो चार्वाक माने गए हैं और जो राम से कहते हैं कि वनवास पर न जाओ तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है इसका प्रतिकार करो और सत्ता संभालों क्योंकि जनता का भला तभी होगा जब एक न्यायप्रिय राजा सत्ता की बागडोर संभालेगा। 

     अब जो हमारे यहां कायदे से भारतीय दर्शन को भी फॉलो करते हैं उसे भी अधिकतर लोग अब वामपंथी ही कहते हैं। इनमें से भी ज्यादातर लोग वाम और दक्षिण की विचारधारा के बीच का बेसिक डिफरेंस भी नहीं जानते होंगे।

     आखिर भारत के वामपंथियों को यूनिवर्सल तौर पर इतनी गालियां क्यों पड़ती है …या भारत की हिंदी बेल्ट वाली वोट पॉलिटिक्स में आज तथाकथित लेफ्ट पार्टियां कुछ खास प्रदर्शन क्यों नही कर पा रही हैं –

     एक तो, भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों और हार्डकोर नव मार्क्सवादीयों ने हमारी वैदिक, साहित्यिक और वैचारिक विरासत को समझने की कोशिश नहीं की। उन्होंने मार्क्स के लॉजिक में चर्च की जगह मंदिर लगाकर सीधा यहां कॉपी पेस्ट कर दिया जिससे भारत जैसे आध्यात्म प्रधान देश में लोग मंदिर मठों की आलोचना सुन नहीं पाए। 

     दूसरा, पूंजीवाद को उन्होंने ब्राम्हणवाद में बदल दिया और शोषित होने के लिए आर्थिक स्थिति की जगह जातिय स्थिति का क्राइटेरिया लगा दिया।

     तीसरा, आस्था का सेकुलरिज्म । निजी तौर पर कोई भी व्यक्ति कभी सेकुलर हो ही नही सकता। शादी ब्याह, जजकी, मरनी जैसे जीवन के कितने संस्कार होते हैं जिसमें व्यक्ति को अपनी पीढ़ियों की चली आ रही मान्यताओं से बंधना ही पड़ता है ऐसे में भारत की लिबरल विचारधारा, सेकुलरिज्म को व्यक्ति की निजी आस्था का प्रश्न बनाते रहे जबकि यह केवल शासन और प्रशासन का विषय होना चाहिए था।

Ramswaroop Mantri

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