शशिकांत गुप्ते
सियासी खेल बहुत अजब-गजब खेल होता है। इस खेल में आमजन की औकात शतरंज के खेल के प्यादों के जैसी होती है।
प्यादें मरने के लिए आगे की पंक्ति में ही होते हैं।
कोई रेल,सड़क, दुर्घटनाएं हों, प्राकृतिक आपदाएं हों,इनमे मरने वाले देशवासियों के लिए सियासत की संवेदनाएं सिर्फ औपचारिकता का निर्वाह करने के लिए जागृत होती है।
सियासत के खेल में प्रतिस्पर्धा इस मुद्दे पर होती है,पूर्व में कितने हादसे हुए थे,और उस समय मरने वालों की संख्या कितनी थी?
हादसों की जांच होती है,जांच कर्ता इतने वफादार होते हैं कि, किसी भी जवाबदार पर तनिक भी आंच नहीं आने देते हैं?
इसका मुख्य कारण है,जांच करने के पूर्व ही घोषणा होती है,दोषियों को बक्शा नहीं जाएगा। दोषी कौन? इस प्रश्न का उत्तर मिलना कभी भी संभव नहीं है,कारण सियासत में कोई एक शख्स भी बे-ईमान नहीं मिलेगा? ढूंढते रह जाओगे?
बा-कायदा पोशाक बदल कर दुर्घटना स्थल पर कड़ी सुरक्षा में सुरक्षित होकर मौका मुआयना करने के लिए आगमन होता है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि,
जो दुर्घटना होती है,वह सुरक्षा में लापरवाही से होती है,संबंधित विभाग के आला दर्जे की अधिकारी,और संबंधित मंत्री, का कोई दोष कभी होता ही नहीं है। प्यादों पर दोष मढ़ा जाता है?
यही तो सियासी शतरंज का खेल है?
सियासतदान बहुत ही संवेदनशील होते हैं,और क्यों नहीं होंगे, आखिर वे भी तो मानव ही हैं?
सियासतदानों को जनता की चिंता बहुत अजब तरह की होती है।
इस तरह की चिंता को समझने के लिए प्रसिद्ध शायर शहरयार का ये शेर एकदम मौजू है।
सभी को ग़म है समुंदर के ख़ुश्क होने का
कि खेल ख़त्म हुआ कश्तियाँ डुबोने का
इनदिनों सवाल करना,सवाल पूछना,मूलभूत अधिकार होते हुए भी अपराध ही परिभाषित हो रहा है।
इसका मुख्य कारण है,हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।
जो सवाल करते हैं,या सवाल करने का साहस दिखाते हैं,ऐसे लोगों के लिए मोहतरमा शायरा दीप्ति मिश्रा फरमाती है।
उसे यकीं हैं बे-ईमानी बिना वो बाजी जीतेगा
अच्छा इंसां है,अभी खिलाड़ी कच्चा लगता है
अंत में शायर सलीम सिद्दीकी
यह शेर प्रासंगिक है।
कौन सा जूर्म खुदा जाने हुआ है साबित
मशवरे करता है मुंसिफ गुनहगार के साथ
शशिकांत गुप्ते इंदौर





