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*आर्यों के भारत~प्रवेश की धारणा को नकारती है वैदिक गङ्गा*

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        ~ पुष्पा गुप्ता 

    पश्चिमी विद्वानों और उनके अनुयायी कुछ सुधीजनोंकी भ्रान्त विचारधाराके अनुसार आर्योंने मध्य एशिया आदि भूभागोंसे चलकर भारतमें प्रवेश किया था। इस मान्यताकी पुष्टिमें वे ऋग्वेदमें उल्लिखित पर्वतों, नदी-नदोंके साक्ष्योंको प्रस्तुत करते हैं।

      उनका कथन है कि आर्यजनोंका भारत- प्रवेश पश्चिम दिशासे हुआ था। इसलिये उनका सर्वप्रथम परिचय पश्चिम दिशामें प्रवहमान नदियों एवं पर्वतोंके साथ होना स्वाभाविक था । सिन्धु सप्रसिन्धु कुभा इत्यादि नदियोंका सर्वाधिक वर्णन ऋग्वेद संहितामें हुआ है।

       पाश्चात्त्य देशीय विद्वज्जनोंकी यह भी मान्यता है कि ऋग्वेद संहिताका दशम मण्डल अन्य मण्डलोंकी अपेक्षा परवर्ती है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि दशम मण्डलकी रचना तब हुई, जब आर्यजन भारतवर्ष में पूर्णरूपसे स्थापित हो चुके थे। अतः आर्यजन पूर्व दिशामें प्रवहमान गङ्गा, यमुना इत्यादि नदियोंका वर्णन इस मण्डलमें ही कर सके।

भारतीय संस्कृतिकी प्रकृति एवं सुदीर्घ परम्पराओंकी अतलस्पर्शी गहराइयोंको नापनेमें झिझकते पश्चिमी संस्कृतिके भक्तोंद्वारा उद्भावित ये भ्रान्त धारणाएँ सर्वथा हास्यास्पद एवं उनके अपरिपक्क ज्ञानकी सूचक हैं।

      यदि आर्योंने पश्चिम दिशासे भारत प्रवेश किया होता और अफगानिस्तान, सिन्धुप्रदेश तथा पंजाबमें सर्वतः प्रथम स्थापित हुए होते तो पूर्व दिशामें स्थापित होते हुए भी उन्होंने भारतके पश्चिम भागमें प्रवहमान नदियोंकी पूज्यताको भुला न दिया होता। वे सर्वतः प्रथम पश्चिमी नदियों एवं भूभागोंका ही स्मरण करते।

     ऋग्वेदीय दशम मण्डलके पचहत्तरवें नदीसूक्तमें नदियोंको स्तुति की गयी है। इस नदीसूक्तके प्रथम मन्त्रमें बताया गया है कि सिन्धु नदी अपने बलसे सभी नदियोंको अतिक्रान्त करके प्रवहमान है। इसके परवर्ती सभी मन्त्रोंमें सिन्धुका वर्णन हुआ है।

केवल पञ्चम मन्त्रमें पूर्व दिग्भागकी और प्रवहमान गङ्गा, यमुना, सरस्वती नदियोंकी स्तुति की गयी है :

     इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सकता परुष्ण्या। 

असिक्न्या मनुद्बधे वितस्तयाऽऽजकीये श्रृणुद्धा सुषोमया॥

     ~ऋग्वेद (१०।७५।५)

इस मन्त्रमें नदियोंकी प्रार्थनाका जो क्रम रखा गया है, वह दिखाता है कि आर्यजन पूर्व दिशासे पश्चिम दिशाकी ओर अग्रसर हुए थे। गङ्गाके पश्चिममें यमुना हैं, उनके पश्चिम सरस्वती, उनके पश्चिम पंजाबकी सतलज, इरावती, चिनाव, मरुवृधा (चन्द्रभागा ), झेलम और आर्जीकीया (व्यास) नामक नदियाँ प्रवहमान हैं।

       इस मन्त्रके परवर्ती छठे मन्त्रमें गोमती (गोमल- अफगानिस्तानके अराकोसियामें प्रवहमान) तथा कुभा (काबुल) नदियोंका नामोल्लेख हुआ है। अन्तिम नवम मन्त्रमें सिन्धु नदीकी महिमा बतायी गयी है। अष्टम मन्त्रमें बताया गया है कि सिन्धु नदीके तटवर्ती स्थान ऊनी कम्बलों, विविध औषधियों और धन-धान्यसे समृद्ध थे।

      सिन्धु नदीमें आध्यात्मिकताकी अपेक्षा भौतिकता अधिक झलकती है। परवर्ती कुछ पुराणोंमें सिन्धु में तर्पण आदि धार्मिक कृत्योंके अनुष्ठानकी चर्चाके अतिरिक्त बहुत महत्त्व नहीं दिया गया है।

     आर्यजन पूर्व दिशासे पश्चिमाभिमुख यात्रा करते हुए कुछ समयतक सिन्धु क्षेत्रमें ठहरे होंगे । वहाँसे शक स्थान आदि देशोंमें फैल गये।

भारतसे समय-समयपर आर्योंके निष्क्रमण होते रहे है ।’जिप्सीभाषा’ नामक ग्रन्थसे पता चलता है कि रोमा नामसे प्रसिद्ध यायावर कबीले पुराणोंमें निर्दिष्ट ‘राम’ नामक क्षेत्रसे ईसवी पूर्व और पश्चात्तन शताब्दियोंमें ईरान तथा मिस्र (ईजिप्ट) होते हुए सम्पूर्ण यूरोप, तुर्किस्तान इत्यादि देशोंमें फैल गये।

      ‘राम’ नामक क्षेत्रसे सम्बन्धित होनेके कारण वे आज भी स्वयंको ‘रोमा’ कहते हैं। ईजिप्टसे यूरोपमें प्रवेश करनेके कारण उन्हें जिप्सी कहा जाने लगा। यह ‘राम’ नामक क्षेत्र वहाँ है, जहाँ राजस्थान, पंजाब एवं सिन्धु प्रदेशकी सीमाएँ परस्पर मिलती हैं। समय-समयपर हुए इन निष्क्रमणका सम्यक् अनुशीलन करनेपर सिन्धु घाटीको सभ्यताके रहस्योद्घाटनपर नया प्रकाश पड़नेकी सम्भावना है।

      भारतसे आर्योंके वे निष्क्रमण चिरन्तन हैं। पश्चिमी संस्कृतिमें वैदिक देवताओंकी नामोपलब्धिका रहस्य आर्वजनोंके निष्क्रमणोंमें निहित है।

      पाश्चात्त्य विद्वानोंका यह वक्तव्य सत्यसे सर्वथा परे है कि ऋग्वेद संहितामें गङ्गाकी स्पष्ट चर्चा एक बार ही की गयी है। ऋग्वेदीय खिल पाठमें नदीसुतका एक खिल मन्त्र सितासिते सरिते यत्र संगथे तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति मिलता है।

      इसमें श्रीगङ्गा और यमुनाके श्वेत एवं श्याम जलकी पावनता तथा दिव्यताको लक्षित करके वहाँ उनका स्मरण ‘सिता’ और ‘असिता’ के रूपमें भी किया गया है। उनका यह कहना अवश्य सत्य है कि ऋग्वेद संहिताके अतिरिक्त यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद संहिताओंमें गङ्गाकी चर्चा नहीं आयी है।

      यजुर्वेदसंहिताके शतपथब्राह्मण तथा कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यकर्मे गङ्गाका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

ऋग्वेदवेद संहिताके (१।१५८।४-६) मन्त्रोंमें दीर्घतमस् (पूर्वनाम दीर्घतपस्) नामक महर्षिकी कथा आयी है। ऐतरेय ब्राह्मण (८, २३) में बताया गया है कि ये महर्षि भरत राजाओंके पुरोहित थे। उन्होंने भरत दौष्यन्तिका ‘ऐन्द्र अभिषेक’ यमुनाके किनारे किया था।

      कथा है कि एक बार अंग देशके राजा गङ्गा नदीमें जल-क्रीड़ा कर रहे थे। इन्होंने दीर्घतमस्को गङ्गाधारामें बहता हुआ देखकर उनका उद्धार किया था। बृहद्देवता नामक ग्रन्थमें इस कथाका उपबृंहण हुआ है। गङ्गा और यमुना नदियोंके मध्यवर्ती भूभागोंपर भरत दौष्यन्तिद्वारा प्राप्त की गयी विजयका अंकन शतपथब्राह्मणमें हुआ है।

     गङ्गा और यमुनाके मध्यवर्ती क्षेत्र (दोआब) के निवासियोंकी तैत्तिरीय आरण्यकमें विशेषतः प्रशंसा की गयी है।

    ऋग्वेद संहिताके प्रथम एवं अष्टम मण्डलोंके अतिरिक्त षष्ठ मण्डलमें गङ्गा-सम्बन्धी चर्चा हुई है। 

     वहाँ भरद्वाज ऋषि तथा कृपण पणियोंके बृबु नामक काठकारका ऐसा प्रसंग है, जिसके अनुसार भरद्वाजने बृबुद्वारा दिये गये दानको स्वीकार किया था।

बृबुको प्रशंसा में भरद्वाजजीने जो ऋचा पढ़ी, उसमें बुकी दानोच्चताकी समानता गङ्गाके ऊँचे तटपर लगे विस्तीर्ण वृक्षके साथ की थी :

   वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात् । उरुः कक्षो न गाङ्गयः।

     ~ऋग्वेद (६।४५।३१)

गङ्गा शब्दसे सम्बन्धित ‘गाय’ शब्दका व्यवहार किया गया है। यह कक्षवृक्षका विशेषण है। ‘गाङ्गयः कक्षः’ का तात्पर्य हुआ-गङ्गाका वृक्ष।

     वैदिक वाङ्मयकी विविध व्याख्याएँ हैं, जो भौगोलिक स्थानोंका परिचय कराती हैं। महाभारत, पुराण इत्यादि वाङ्मयमें वैदिक कथाओंका विशदीकरण मिलता है। ऋग्वेदीय अष्टम मण्डलका उन्नीसवाँ सूक्त सौभरिसूक्तके नामसे प्रसिद्ध है। इसमें पुरुकुत्स पुत्र राजा त्रसदस्यु के दानकी प्रशंसा है।

    इसके ३६ वें और ३७ वें मन्त्रोंमें सौभरि ऋषिने राजा त्रसदस्युद्वारा किये गये कन्यादानकी प्रशस्ति की है- 

    अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम्। 

मंहिष्ठो अर्यः सत्पतिः॥

 उत मे प्रयियोर्वयियोः सुवास्त्वा अधि तुग्वनि। 

तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्वसुर्दियानां पतिः।।

      राज त्रसदस्युसे कन्यादान लेनेके पूर्व सौभरि ऋषि नदीके जलमें खड़े होकर तपस्या कर रहे थे। ऋग्वेद- संहितामें नदीके नामका उल्लेख नहीं है। उक्त दोनों मन्त्रोंमें ऋषिको दिये गये दानका संकेतभर मिलता है। बृहद्देवतायें भी केवल नदी कहा है।

       द्याद्विवेदने उस नदीको गङ्गा बताया है। श्रीमद्भागवतपुराणमें राजा त्रसदस्युके स्थानपर सम्राट् मान्धाता तथा गङ्गाके स्थानपर यमुना नाम दिया गया है। दोनोंकी राजधानियोंकी विभिन्नताके कारण नदियोंका भी नाम-भेद हुआ है। दोनों ग्रन्थोंमें गङ्गा-यमुनाके मध्यवर्ती भूभागकी पावनता दिखाना मुख्य लक्ष्य है। बृहद्देवता और पुराणोंमें इस सांकेतिक कथाका विशदीकरण उपलब्ध होता है।

इतिहास-पुराण वेदोंकी सांकेतिक कथाओंका उपबृंहण करते हैं। इनकी सहायताके बिना वेदोंका अर्थ-निश्चय करनेपर समग्र परम्पराका उल्लंघन होता है।

     पाश्चात्त्य विद्वज्जन और उनके कुछ अनुयायियोंद्वारा इतिहास-पुराणकी उपेक्षा करके जो मनमाना अर्थ किया जाता है, उससे वेदोंको चोट पहुँचती है। उपर्युक्त विवेचनसे यह स्पष्ट है कि ऋग्वेद संहिताके पहले, छठे और आठवें मण्डलमें भी गङ्गाका स्मरण किया गया है।

      आर्यजनोंकी प्रारम्भसे ही गङ्गाके प्रति आदर भक्ति रही आयी है. आर्यजनोंका बाहरसे भारतमें आगमन नहीं हुआ, अपितु समय-समयपर उनका भारतसे अन्य देशोंमें निष्क्रमण अवश्य होता रहा।

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