लखीमपुर/बहराइच/श्रावस्ती/
यूपी में श्रावस्ती से करीब 70 किमी दूर भरथा रोशनपुरवा गांव है। आधा भारत में, आधा नेपाल में। ये गांव नो मैंस लैंड एरिया में बसा है। गांव के आखिरी छोर पर एक मस्जिद और मदरसा है। गांव के शकील बताते हैं- ये मदरसा और मस्जिद 50 साल से ज्यादा वक्त से है। गांव के लोग चंदे से इनकी मरम्मत कराते रहते हैं। मदरसे में 150 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं।
भरथा रोशनपुरवा के मदरसे की बात इसलिए क्योंकि इस पर और इस जैसे करीब 8,500 मदरसों पर यूपी सरकार कार्रवाई कर सकती है। ये मदरसे बिना मान्यता के चल रहे हैं। बीते साल नवंबर में आई सर्वे रिपोर्ट में इसका पता चला। इनमें से ज्यादातर मदरसे नेपाल से सटे यूपी के जिलों सिद्धार्थनगर और बहराइच में हैं। 2022 में आई पुलिस की एक रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल से सटे जिलों में मुस्लिम आबादी भी नेशनल एवरेज से 20% तक ज्यादा बढ़ी है।
क्या सच में ऐसा है, ये जानने हम नेपाल बॉर्डर से सटे यूपी के तीन जिलों लखीमपुर, श्रावस्ती और बहराइच पहुंचे। हमारे पास दो सवाल थे।
- पहला: क्या वाकई नेपाल बॉर्डर पर बसे गांवों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है?
- दूसरा: क्या मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही मदरसे-मस्जिद भी बढ़े हैं?
हमने जवाबों की तलाश लखीमपुर के रामगढ़ गांव से की। ये गांव पलिया में चंदन चौकी नेपाल बॉर्डर पर है। लखीमपुर से लगभग 100 किमी दूर चंदन चौकी गेट का रास्ता दुधवा टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है। दुधवा से लगभग 15 किमी बाद चंदन चौकी आती है। नेपाल के रास्ते पर जाने से पहले यहां एक छोटा सा मार्केट पड़ता है। यहां सिर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि नेपाली भी खरीदारी करने आते हैं।

दुधवा से चंदन चौकी जाते हुए 5 किमी के रास्ते में घना जंगल है। जंगल के बीच कहीं-कहीं छोटे गांव भी हैं। आने-जाने के लिए पक्की सड़क बनी हुई है।
मार्केट में सीमा सुरक्षा बल यानी SSB के जवान तैनात हैं। वे हमें देखते ही कैमरा बंद करा देते हैं। कहते हैं कि चौकी की तस्वीर या वीडियो बनाना मना है। इसके लिए अफसरों की परमिशन लेनी पड़ेगी। चंदन चौकी से एक किमी दूर बिचपटा गांव है। गांव की आबादी करीब 3500 है। इनमें हिंदू परिवार कोई नहीं है। गांव से 100 मीटर पहले रास्ते में ईदगाह बनी है।
गांव में हमें मोहम्मद साकिब मिले। उम्र 70 साल। बताते हैं, ‘ये गांव आजादी से भी पहले से बसा है। मेरे अब्बू लखीमपुर के गोला से आए थे और यहीं बस गए थे। बाद में और लोग आते गए। कुछ लोग इधर-उधर के रिश्तेदार भी हैं, जो यहीं आकर बस गए और नेपाल का काम करने लगे।’
मोहम्मद साकिब कहते हैं, ‘गांव में मस्जिद और मदरसा भी है। रजिस्ट्रेशन के लिए लखीमपुर में कागज डाल रखा है, लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं। गांव वालों ने चंदा करके मस्जिद बनवाई है। ये भी 10-15 साल पहले ही पक्की हुई है। पहले फूस की मस्जिद थी। मदरसे की मान्यता के लिए पिछली सरकार में लगे हुए थे, लेकिन सरकार ही बदल गई। अब तो कोई सुनवाई ही नहीं है। सरकार इसे बंद कराना चाह रही है या नहीं, ये हम लोग क्या बताएं।’
गांव में घर जमाई आकर बसे, तो बढ़ी आबादी…
गांव में अंदर छोटी सी मस्जिद बनी है। 68 साल के शौकत मस्जिद के सामने रहते हैं। मोहम्मद साकिब की बात को आगे बढ़ाते हुए शौकत कहते हैं, ‘हम लोग बहुत पहले से यहां बसे हैं। साकिब के वालिद (पिता) ने ही चंदा जमा करके ये मस्जिद बनवाई थी। अब मौलवी हैं, तो वही नमाज पढ़ाते हैं। बच्चों को इस्लाम की शिक्षा देते हैं। उनकी तनख्वाह गांव वाले चंदा करके देते हैं।’
नेपाल जाकर कबाड़ बेचते हैं, कमाई ढाई सौ रुपए रोज
बिचपटा गांव के रहने वाले मुन्ना नेपाल में कबाड़ का काम करते हैं। 35 साल के मुन्ना रोज 50- 60 किलो कबाड़ ले जाते हैं। दो-ढाई सौ रुपए कमा लेते हैं। कहते हैं, ’मैं ज्यादा सामान नहीं लाता, वह गलत काम में गिना जाने लगता है। यहां कोई काम नहीं है। ज्यादातर लोग नेपाल में ही काम करते हैं।’
बिचपटा से निकलकर हम बगल के गांव रामगढ़ पहुंचे। यहां गांव की इकलौती मस्जिद के मौलवी अपने कमरे में कुरान पढ़ रहे थे। नाम मोहम्मद अनस खां। उम्र 22 साल। कहते हैं, ‘मेरा गांव पलिया से थोड़ी दूर अतरिया में है। परिवार में मां, बाप और बीवी हैं। उनके खर्च के लिए यहां नौकरी कर रहे हैं।’
हमने पूछा कि इतने में खर्च चल जाता है, और सरकार तो बिना मान्यता वाले मदरसों पर कार्रवाई की बात कह रही है, तो वे बोले, ‘कुछ दिन पहले सरकार के लोग आए थे। मस्जिद और मदरसे के बारे में पूछ रहे थे। गांव के प्रधान के पास कागज थे, तो उन्होंने दिखा दिए।
गांव की आबादी करीब 2 हजार, 550 वोटर, इनमें 500 मुस्लिम
मौलवी मोहम्मद अनस खां से मिलने के बाद हम रामगढ़ गांव के प्रधान शौकत के पास पहुंचे। शौकत बताते हैं- हमारे पिता की सौ साल में मौत हुई थी। उनसे पहले हमारे दादा थे। उनके भी पूर्वज रहे होंगे, तो हमें नहीं मालूम कि हम लोग यहां कब से रह रहे हैं। सबसे पुराने बाशिंदे हम ही हैं।’
शौकत बताते हैं, ‘हम लोग कई साल से यहां रह रहे हैं, लेकिन जो सुविधाएं थारू जनजाति के लोगों को मिलती हैं, वो हमें नहीं मिलतीं। गांव के ज्यादातर नौजवान नेपाल कमाने जाते हैं। जमीन का पट्टा भी हमें नहीं मिल पाता।’
शौकत जिस थारू जनजाति की बात कर रहे हैं, उसके लोग नेपाल और भारत के सीमावर्ती तराई इलाके में रहते हैं। नेपाल की पूरी आबादी में करीब 6.6% थारू हैं।
शौकत के पास ही पूर्व प्रधान मो. उमर भी बैठे थे। वे बताते हैं कि एक परिवार में कई बच्चे होने से आबादी लगातार बढ़ रही है। हमने होश संभाला, तब यहां 24 से 25 परिवार थे। हमारे तीन बेटे हैं। अभी ताे एक ही परिवार में हैं, लेकिन मेरे बाद अलग होकर तीन परिवार बन जाएंगे। गांव में कुछ लोग बाहर से आए हैं। उन्हें घर दामाद कहते हैं।’
हिंदू बोले- बाहर से आकर कोई नहीं बसा, सब मिलकर रहते हैं
रामगढ़ गांव से निकलकर फिर चंदन मार्केट पहुंचे। यहां हमें विकास गुप्ता मिले। विकास की साइकिल और स्पेयर पार्ट्स की दुकान है। मुस्लिमों की आबादी बढ़ने के सवाल पर कहते हैं, ‘देखिए, चुनाव होता है, तो हर गांव में कुछ न कुछ वोट बढ़ते हैं। मुस्लिम गांव में मुस्लिमों के वोट बढ़ते हैं, तो हिंदू गांव में हिंदुओं के वोट बढ़ते हैं।’
नेपाल बॉर्डर से निकलकर हम पलिया विधानसभा के BJP विधायक रोमी साहनी के पास पहुंचे। नेपाल बॉर्डर पर चंदन चौकी से गौरीफंटा बॉर्डर तक करीब 40 किमी की दूरी में 40 से ज्यादा गांव बसे हैं। इनमें से तीन से चार गांव में ही मुस्लिम आबादी ज्यादा है। बाकी थारू जनजातियों के गांव हैं। ये सभी गांव पलिया विधानसभा सीट में आते हैं।
यहां के विधायक रोमी साहनी ने बताया- बॉर्डर पर मुस्लिम आबादी तो बढ़ी है। कुछ लोग आपस के हैं, तो कुछ उनके रिश्तेदार बाहर से आकर बसे हैं। नेपाल बॉर्डर से उनका रोजगार है, इसलिए बसावट ज्यादा हो रही है।’
लखीमपुर में 250 मदरसे, 245 का रजिस्ट्रेशन नहीं
पलिया से निकलकर हम लखीमपुर कलेक्ट्रेट गए। पता चला कि डीएम ऑफिस में नहीं हैं। यहां से हम एडिशनल एसपी नेपाल सिंह के पास पहुंचे। उन्होंने पहले मुद्दा पूछा। हमने पूछा कि क्या बॉर्डर पर मुस्लिम आबादी बढ़ रही है? उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। जिले के एसपी छुट्टी पर थे। इसलिए पुलिस से कोई जानकारी नहीं मिल पाई।
इसके बाद हम जिला अल्पसंख्यक विकास अधिकारी वीरपाल से मिले। उन्होंने कैमरे पर बोलने से मना कर दिया। बातचीत में बताया कि सर्वे में लखीमपुर में 250 मदरसे पाए गए थे, इनमें 245 का रजिस्ट्रेशन नहीं है। नेपाल बॉर्डर के गांवों में क्या स्थिति है, इसका आंकड़ा उनके पास नहीं था।
नो मैंस लैंड पर बसा बॉर्डर का आखिरी गांव ककरदरी, भारत में मस्जिद, नेपाल में मंदिर
लखीमपुर से निकलकर हम करीब 300 किमी दूर श्रावस्ती के नेपाल बॉर्डर पर पहुंचे। ककरदरी गांव श्रावस्ती के सिरसिया बॉर्डर का आखिरी गांव है। गांव में पहुंचने के लिए अच्छा रास्ता तक नहीं है। गांव में जाने के लिए करीब 7 किमी ककरदरी रेंज के जंगलों से गुजरना पड़ता है।
गांव में मिश्रित आबादी है, यादवों के बाद सबसे ज्यादा मुस्लिम हैं। गांव के आखिरी हिस्से में नेपाल बॉर्डर है। सीमा बताने के लिए पिलर लगे हैं। पिलर के दोनों तरफ का 10 मीटर एरिया नो मैंस लैंड माना जाता है। बॉर्डर के उस तरफ नेपाली गांव हुल्लासपुर का मंदिर है। वहां भी हिंदू-मुस्लिम दोनों रहते हैं।

नेपाल के गांव हुल्लासपुर में बना मंदिर। हुल्लासपुर और भारत के ककरदरी गांव के बीच सरहद बताने के लिए सिर्फ एक पिलर लगा है।
राजकुमार यादव ककरदरी गांव के प्रधान हैं। वे पहली बार प्रधान बने हैं। बात गांव की परेशानी से शुरू करते हैं। कहते हैं, ‘ये गांव बहुत पुराना है। इतने साल बीत गए, लेकिन अब तक न यहां बिजली है, न ही रास्ता। कई बार तो ये हुआ कि मरीज को इलाज के लिए ले जा रहे थे, रास्ते में उसकी मौत हो गई। हर साल बाढ़ का खतरा अलग रहता है। कई बार लिख कर दिया, लेकिन सुनवाई नहीं होती।’
गांव में मुस्लिम आबादी बढ़ने के सवाल पर राजकुमार किसी बाहरी के बसने से इनकार करते हैं।
गांव में रहने वाले हैदर मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान चलाते हैं। वे बताते हैं, ‘मेरा जन्म इसी गांव में हुआ है। मेरा परिवार यहीं रहता है। हम लोगों ने गांव में मस्जिद बना ली है।’ बीच में बात बदलकर हैदर कहते हैं, ‘गांव की सुविधाएं देखकर तो लगता है कि हम लोग इंडिया के हैं ही नहीं। नेता इलेक्शन में तो जंगल से होते हुए किसी तरह आ जाते हैं, उसके बाद दोबारा नहीं आते।’
60 साल के मकसूद अली जरूर गांव में बाहरियों के बसने की बात बताते हैं। वे कहते हैं, ‘गांव में कई लोग बाहरी आए हुए हैं। ज्यादातर तो नेपाल की नागरिकता भी लिए हुए हैं। फर्जी तरीके से आधार कार्ड बनवा लिया है।’
हम गांव के आखिरी छोर पर पहुंचे तो नेपाल बॉर्डर का पिलर दिखा। पिलर से कुछ कदम की दूरी पर ही मदरसा और उसी में मस्जिद बनी है। मदरसे के बगल में रहने वाले इलियास बताते हैं, ‘ये मदरसा 15 साल से बना हुआ है। गांव में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है। हम लोग ही मिलकर मौलवी को तनख्वाह देते हैं। मदरसे में 80 से 90 बच्चे पढ़ने आते हैं।’

नेपाल बॉर्डर पर लगे पिलर से कुछ कदम की दूरी पर मदरसा और उसी में मस्जिद बनी हुई है। पिलर के इस ओर हुल्लासपुर गांव है।
रोशनपुरवा भी नो मैंस लैंड पर बसा, पिलर भी गायब
ककरदरी से निकलकर हम 11 किमी दूर भरथा रोशनपुरवा पहुंचे। यहां की आबादी करीब 5 हजार है। ये गांव नो मैंस लैंड पर बसा है। एक तरफ भारत का रोशनपुरवा गांव है, दूसरी तरफ नेपाल का रोशनपुरवा गांव। यहां मिले मोहम्मद शकील हमें गांव के आखिरी छोर तक ले गए। यहां एक मस्जिद और मदरसा है।

भरथा रोशनपुरवा गांव में बनी मस्जिद, ये नो मैंस लैंड एरिया में बनी है। गांव वाले बताते हैं कि ये 50 साल से ज्यादा पुरानी है।
बताते हैं ये मस्जिद-मदरसा नेपाल बॉर्डर पर बना है। हालांकि हमें बॉर्डर को अलग करने वाला पिलर नहीं दिखा। इससे ये पता नहीं चलता कि रोशनपुरवा गांव का कौन सा हिस्सा भारत में है और कौन सा नेपाल में।
शकील कहते हैं, ‘ये मदरसा और मस्जिद 50 साल से ज्यादा समय से है। समय-समय पर गांव के लोग रुपए मिलाकर इसकी रिपेयरिंग कराते रहते हैं। करीब 150 से ज्यादा बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। गांव के ज्यादातर युवा काम के लिए बाहर जाते हैं। कोई मुंबई, तो कोई केरल जाता है। गांव में काम नहीं है।’
यहीं हमें अनवर अली मिले। अनवर सिक्योरिटी के नाम पर SSB की रोक-टोक से परेशान हैं। वे कहते हैं, ‘हम अपने खेतों में खाद भी SSB वालों से पूछे बिना नहीं डाल पाते हैं। इसे आजादी थोड़ी न कहते हैं। यह तो गुलामी की ही तरह है।’
क्या इस इलाके में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है? जवाब में अनवर अली कहते हैं, ‘मैं अपने खानदान की पांचवी पुश्त का हूं। मेरी उम्र भी 66 साल है। अब बताइए कि गांव छोड़कर कहां चले जाएं।’
नेपाल बॉर्डर पर बसा बहराइच का आखिरी गांव सीतापुरवा, हिंदू आबादी बिल्कुल नहीं
श्रावस्ती से निकलकर हम 100 किमी दूर रूपईडीहा पहुंचे। ये नेपाल बॉर्डर पर बसा बहराइच जिले का आखिरी कस्बा है। कुछ साल पहले ही केंद्र सरकार ने यहां हाईवे बनवाया है। इसलिए आसानी से रूपईडीहा होते हुए नेपाल जा सकते हैं। रूपईडीहा से करीब 7 किमी दूर है बॉर्डर का आखिरी गांव सीतापुरवा। नटों के इस गांव में कोई हिंदू परिवार नहीं रहता। यहां सिर्फ मुस्लिम आबादी है।
गांव के पीरगुलाम बताते हैं, ‘इस गांव को नटबाजों का गांव तो कहा जाता है, लेकिन यह कला अब खत्म हो चुकी है। अब लड़कों को बाहर मजदूरी करने जाना पड़ता है।’
गांव में घूमने पर पता चला कि कई गांव वाले आज भी प्रधानमंत्री आवास के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। वे बताते हैं कि रोजाना का खर्च चलाने के लिए मजदूरी और जंगल से लकड़ियां काट कर लाते हैं। उसे बेचकर ही गुजारा हो पाता है।

सीतापुरवा गांव में रह रहे लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, ज्यादातर के पास पक्के घर भी नहीं हैं।
रूपईडीहा में ही लोकल जर्नलिस्ट सुरेंद्र मदेशिया मिल गए। वे बताते हैं, ‘ये सही है कि रूपईडीहा में नेपाल बॉर्डर पर मुस्लिमों की आबादी बढ़ी है, लेकिन सीमा सुरक्षा बल इस बात से परेशान नहीं होता है कि उनकी आबादी बढ़ रही है। वे इस बात से परेशान होते हैं कि उनके बीच कहीं कोई विदेशी तो नहीं आ गया है। नो मैंस लैंड पर कहीं अतिक्रमण होता है, तो उसे SSB के जवान ही हटाते हैं।’
यूपी के तीन जिले लखीमपुर, श्रावस्ती और बहराइच से सटे नेपाल बॉर्डर की स्थिति जानने के बाद हम यूपी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण राज्यमंत्री दानिश अंसारी के पास लखनऊ पहुंचे। उन्होंने नेपाल बॉर्डर पर मुस्लिम आबादी बढ़ने के सवाल पर जवाब नहीं दिया।
हालांकि मदरसों के बारे में वे बताते हैं कि जब से यूपी में BJP की सरकार आई है, मदरसों का हाल सुधारने में लगे हुए हैं। हमने मदरसों में दीनी तालीम के अलावा दूसरे सब्जेक्ट भी पढ़ाना शुरू किया है। स्पोर्ट्स एक्टिविटी भी शुरू की है।’
तीनों जिलों में घूमने और लोगों से बातचीत से पता चला कि बॉर्डर पर मुस्लिम आबादी तो बढ़ रही है, लेकिन इसकी वजहें सामाजिक हैं। आबादी बढ़ी है, इसलिए मस्जिद और मदरसे भी बढ़े हैं। गांव वाले इस बात से अनजान थे कि शहरों में उनकी आबादी को लेकर भी चर्चा हो रही है। हालांकि वे अपनी रोजी-रोटी के लिए जरूर फिक्रमंद हैं।





