रीता चौधरी
लड़कियाँ हमेशा कोई न कोई बहाना
ढूँढ़ ही लेती हैं बिगड़ जाने का!
कभी वे मोबाइल से तो कभी फटी जींस से,
तो कभी एक्स्ट्रा लो-राइज़ जींस और
स्लीवलेस नाभिदर्शना शर्ट से बिगड़ जाती हैं।
कभी शॉर्ट्स पहनकर, तो कभी ब्रा के स्ट्रैप्स दिखाकर,
या बस्टलाइन दिख जाने की लापरवाही से
बिगड़ जाती हैं ।
बिगड़ जाने पर एकदम उतारू लड़कियाँ
खुलेआम सिगरेट या बियर तक पीकर
बिगड़ जाती हैं, बाइक पर पीछे से लड़के को
कसकर पकड़े हुए बिगड़ जाती हैं,
सरेआम ‘ठी-ठी-ठी-ठी’ करके,
दोस्तों के साथ
मटरगश्ती करके बिगड़ जाती हैं लड़कियाँ
और डेटिंग वगैरह करके,
जाति-धर्म को गोली मारकर शादी करके
या लिव-इन रिलेशनशिप में जाकर
या ‘कंसेसुअल सेक्स’ करके
या अम्मा-बाबूजी-भइया और दोस्तों को
अपने लेस्बियन, बाइसेक्सुअल या
एसेक्सुअल होने के बारे में बताकर
तो इस हद तक, इस हद तक बिगड़ जाती हैं
ये लड़कियाँ कि साक्षात् सृष्टिकर्ता भी
फिर उन्हें नहीं सुधार सकते।
इतनी मग़रूर है ये लड़कियाँ कि अपनी
निजता के स्पेस में किसी की भी दख़लअंदाज़ी को नाक़ाबिले-बरदाश्त बताती हैं
और बेशर्म इतनी कि अपने बॉयफ्रेंड को भी
बता सकती है कि वे ‘वर्जिन’ नहीं है!
अब तो हालात इतने संगीन हो चले हैं
कि धरना-प्रदर्शन-हड़तालों में हिस्सा लेकर,
क्रान्तिकारी संगठन तक बनाकर
और हँसती-खिलखिलाती
पुलिस वैनों में ठुँसकर जेल जाती हुई
लड़कियाँ भयंकर डरावने ढंगों से
बिगड़ती जा रही हैं!
कभी लड़कियाँ सिर्फ़ रोज़ सुबह
नहाकर पूजा-पाठ न करने से,
साइकिल चलाने से, बाल्कनी में खड़ी रहने से
या दिन-रात ट्रांजिस्टर पर गाना सुनने से
बिगड़ा करतीं थीं।
अब उन्होंने बिगड़ने के हज़ारों रास्ते
ईजाद कर लिए हैं और ऐसे-ऐसे
भयंकर रास्ते ईजाद किए हैं कि
क्रुद्ध शेषनाग के विचलित फनों पर टिकी
धरती काँपती रहती है
और ऐसे अशालीन सपनों से
विष्णु जी की नींद डिस्टर्ब होती रहती है
जिन्हें वह लक्ष्मी जी को बता भी नहीं सकते।
मैं भी इतने तरीकों से इतनी बार
बिगड़ी कि याद भी नहीं।
अब रोज़-रोज़ उन्हीं पुराने तरीकों से बिगड़ना
बोरियत भरा काम लगता है, इसलिए तमाम
महाबिगड़ैल लड़कियों की तरह
बिगड़ने के नये-नये तरीके
ईजाद करने पड़ते हैं।
अपने ज़माने में जिन लड़कियों को बिगड़ने का
मनचाहा मौक़ा नहीं मिलता है
और जो ‘सुशील कन्या’ की
छवि में क़ैद घुटती रह जाती हैं,
वे ही ढलती उम्र में वो आण्टियाँ बन जाती हैं
जो लड़कियों के बिगड़ने पर
सबसे अधिक स्यापा करतीं हैं,
छाती पीटती है और कोसती-सरापती हैं।
ये आण्टियाँ मर्दों से भी ज्यादा मर्द होती हैं।
ये अँधेरे की इसक़दर आदी हो चुकी हैं
कि इनके तंग घोंसले में रोशनी की
एक लकीर भी चली जाये
तो आँखों में जैसे सुई घुस जाती है और
ये ‘चीं-चीं’ करने लगती हैं।
वैसे, जैसा कि
एक पक्षत्यागी-दलघाती आण्टी ने ही बताया,
ज़्यादातर आण्टियों के बिगड़ जाने की अपनी
गुप्त फंतासियाँ हुआ करती हैं और दुर्भाग्य से
वे ज़रा बीमार किस्म की हुआ करती हैं।
लड़कियाँ बिगड़ती हैं
तभी यह दुनिया सुधरती है।
लड़कियाँ तमाम बदनामी झेलकर,
तमाम जोखिम उठाकर न सिर्फ़ साँस लेने के लिए,
बल्कि इस दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए
और गतिमान करने के लिए बिगड़ती हैं।
अगर झुँझलाहट होती है तो सिर्फ़ इस बात पर कि
लड़कियाँ और अधिक बड़े पैमाने पर,
और अधिक तेजी के साथ,
और अधिक भयंकर तरीकों से
क्यों नहीं बिगड़ जातीं!





