~ डॉ. विकास मानव
ऋग्वेद के अनुसार यम पितरों और देवों के साथ रहते हैं तथा पितृपति कहे जाते हैं। वेदों में यमलोक, यमदूत, यमराज और उनके कुत्तों का वर्णन है। कुत्ते दो हैं, चार आँखों वाले हैं, चितकबरे हैं और भीषण हैं। यमदेव सूर्य के पुत्र और यमी के भाई हैं। वेद में अग्नि से प्रार्थना की जाती है कि आप मृतक के शरीर को पूरा समाप्त न कर दें ताकि वह पुनः जन्म ले इसे पितरों के पास भेज दें।
शव को चिता पर रखने के बाद भूमि से प्रार्थना की जाती है। कि इसने बहुत दक्षिणा दी है अतः कष्ट न पावे लिखा है कि जो शूर युद्ध में मरते हैं अथवा जो सहस्रदक्षिणा देते हैं वे देवों के पास जाते हैं। दक्षिणा देने वाले स्वर्ग में देवों से मिलते हैं, अद्भुत सुख, अमृत और तेज पाते हैं तथा उन पर आकाश से मधुवृष्टि होती है। वहाँ वैवस्वत यम का वास है और गीतों का नाद है।१.
अतिद्रव सारमेयौ श्वानौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा।
अथा पितृन्त्सुविदत्रानुपेहि यमेन सधमादं मदन्ति।।
~ऋग्वेद (१०।१४।१०)
२.
यौ ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षुसौ।
ताभ्यामेनं परिदेहि राजन् स्वस्ति चास्मा अनमीवं च धेहि।।
(ऋ०१०।१४।११)
३.
उरूणसावसुतृपा उदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु।
तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्।।
(ऋ०१०।१४।१२)
४.
मैनमग्ने विदहो माभि शोचो मास्यं त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्।
यदा शृतं कृणवो जातवेदोथमैनं प्रहिणुतात् पितृभ्यः।।
(ऋ० १०।१६।१)
५.
सूर्यं चक्षुर्गच्छतु वातमात्मा द्यां च गच्छ पृथिवीं च धर्मणा।
अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रतितिष्ठा शरीरैः।।
(ऋ० १०।१६ । ३)
६. यास्ते शिवास्तन्वोI
जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्।।
(ऋ० १०।१६ । ४)
७.
अवसृज पुनरग्ने पितृभ्यो… आयुर्वसान संगच्छतां तन्वा।
(ऋ० १० । १६ । ५)
८.उपसर्प मातरं भूमिं … दक्षिणावत एषा त्वा पातु ।।
(ऋ०१०।१८। १०)
९.तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः।।
(ऋ०१ । १५४ ।२)
१०.
ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः।
ये वा सहस्रदक्षिणास्तरिचदेवापि गच्छतात्।।
(ऋ० १।१४४।३ )
प्रथम मन्त्र में सारमेय, श्वान, चतुरक्ष और शबल शब्द आये हैं। सारमेय और श्वान का एक ही अर्थ है पर यहाँ वे दोनों विशेष्य-विशेषण हैं। महर्षि दयानन्द ने यहाँ दिन और रात को ही दो स्थान माना है। यमराज को सूर्य का पुत्र (वैवस्वत) कहा जाता है। दिन-रात भी सूर्यपुत्र हैं। उन्होंने सारमेय का अर्थ सरमा (उषा) की पुत्री किया है। ये चार आँखों वाले चतुरक्ष है अर्थात् चारों ओर देखते हैं। उनकी गति तीव्र है इसलिए वे श्वान हैं। वे काले-गोरे होने से शक्ल है और मनुष्य की आयु को कम करते हैं।
ऋग्वेद में दक्षिणा का बहुत महत्त्व है। स्वर्गसुख का वह मुख्य साधन है। अश्व, गज, सुवर्ण, रत्न, दासी, अन्न, शग्मा आदि का दान देने वाले स्वर्ग में उच्च पद पाते हैं, यमलोक में सूर्य के साथ रहते हैं, अमर हो जाते हैं और दीर्घायु होते हैं (देखिए आगे दक्षिणाप्रकरण) ऋग्वेद में कबूतर और उल्लू को यमदूत कहा है (देखिए शकुन प्रकरण)
१. अनस्थाः पूताः पवेनन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम्।
नैषां शिश्नं प्रदहति जातवेदाः स्वर्गे लोके बहुस्वैणमेषाम्।।
(ऋ० ४। ३४।२)
२. विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनानवर्तिः सचते कदाचन।
आस्ते यम उपयाति देवान् स गन्धर्वमंदते सोम्येभिः ।।
(ऋ०४।३४।३)
३.
विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् यमः परिमुष्णाति रेतः।
रथी ह भूत्वा रथयान ईयते पक्षी ह भूत्वातिदिवः समेति।।
(ऋ०४।३४।४)
४.
एतास्त्वाधारा उपयन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत्पित्न्यमानाः।।
(ऋ०४।३४।५)
५. घृतह्रदा मधुकूलाः सुरोदकाः क्षीरेण पूर्णा उदकेन दाना।।
(ऋ०४।३४।५)
६. इममोदनं निदधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजित स्वर्गम्।
क्षेष्ट स्वधया पिन्वमानो विश्वरूपाधेनुः कामदुधा में अस्तु।।
(ऋ०४।३४।८)
जो यजमान उपर्युक्त विधि से पका कर ब्राह्मण को ओदन (भात) देते हैं वे शुद्ध और शुचि होकर शुद्ध शुचि लोक में जाते हैं। स्वर्गलोक में बहुत सी स्वियों है। वहीं शिश्नदाह नहीं होता। इस ओदन को पकाने वाले दरिद्र नहीं होते। वे यम के पास जाते हैं और गन्धर्थों तथा देवों के साथ प्रसन्न रहते हैं।
यम उनके रेतस को नहीं चुराते। वे रथ पर चलते हैं और पक्षी होकर स्वर्ग में पहुँच जाते हैं। स्वर्ग में मधु की धाराएँ मिलती है। तुम्हें स्वर्ग में वे मृत के सरोवर तथा मधु, सुरा, क्षौर, जलदधि आदि की धाराएँ प्राप्त हो। मैं यह ओदन ब्राह्मणों में रखता हूँ। यह धेनु मेरे लिए कामदुधा हो।
ऋग्वेद में नरक की यातनाओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं है पर यम यमदूत और पृथ्वी के नीचे गर्त एवं अन्धकार का • उल्लेख है। वाजसनेयिसंहिता ३०/५ में नारकाय वोरहण’ वाक्य आया है।
४०/२ में लिखा है कि हत्या करने वाले पापी लोग मरने के बाद अन्धकार से आवृत असुर लोकों में जाते है अतः किसी का धन मत लूटो।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृत्ताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महतो जनाः।।
तैत्तिरीय आरण्यक में विसप, अविसप, विषादी और अविषादी नामक चार नरकों का वर्णन है पर यातनाओं का पैराणिकवर्णन नहीं है। अथर्ववेद में कुछ है।
पैराणिक स्वर्ग, पितृलोक और नरक :
प्रायः हर धर्म के पुराण स्वर्ग और नरक को आकाश में मानते हैं और वहाँ मरने के बाद ही पहुँचा जाता है पर हमारे पुराणों में भूमि पर भी स्वर्ग-नरक का वर्णन है।
देवीभागवत (३/१३) में भी लिखा है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्रादि देव सुमेरु पर्वत पर रहते हैं किन्तु भास्कराचार्य ने पितृलोक चन्द्रमा के ऊपर वाले भाग पर माना है। यह भी पुराणों का हो मत है।
चकार ब्रह्मलोकं च मेरुशृंगे मनोहरम्।
शिवोपि परमंस्थानं कैलासाख्यं चकरह।।
वैकुण्ठ भगवान् विष्णू रमारमणमुत्तमम्।
स्वर्गस्त्रिविष्टपो मेरुशिखरोपरि कल्पितः।
तच्च स्थानं सुरेन्द्रस्य नानारत्नोपशोभितम् (देवीभागवत )।।
विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्तः स्वाधः सुधादीधितिमामनन्ति (भास्कर)।।
भागवत, गरुड़पुराण आदि पुराणों ने वैतरणी को पीब, रक्त आदि से भरी भीषण नदी कहा है पर महाभारत वनपर्व (अध्याय ८३) में लिखा है कि त्रिविष्टप में जाओ, वहाँ पुण्य नदी वैतरणी में नहाओ और शिव की पूजा करो तो परम गति पाओगे। यह ग्रन्थ भी व्यास का ही लिखा है।
ततः त्रिविष्टपं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी॥
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम्।
सर्पपापविशुद्धात्मा लभते परमां गतिम् ॥
गरुड़पुराण में स्वर्ग, नरक और वैतरणी :
वेदों में शंख चक्र गदाधारी विष्णु का और उनके वाहन गरुड़ पक्षी (टिटिहिल) का वर्णन नहीं है। वहाँ आलंकारिक भाषा में परमात्मा को ही दिव्य सुपर्ण और गरुत्मान् कहा है किन्तु पुराणों में विष्णु गरुड़ से बात करते हैं। वहीं वार्तालाप गरुड़पुराण है। उसके स्वर्ग नरक भागवत के विपरीत हैं, आकाश में हैं।
लिखा है कि मरते समय यम के दो नंगे, खड़े बालों वाले, काले कलूटे तथा दण्डपाशधारी भोषण दूत आते हैं। ये दाँतों को कटकटाते रहते हैं और अंगुष्ठ मात्र मृत पुरुष को बुरी तरह मारते-पीटते आकाश में ले जाते हैं।
उस समय दस दिनों तक जो पिण्ड दिये जाते हैं उन्हीं से मृतक का नया शरीर बनता है। किस पिण्ड से कौन अंग बनता है, इस विषय में पुराणों में मतभेद है।
पाशदण्डधरी नग्नौ दन्तैः कटकटायती।
ऊर्ध्वकेशी काककृष्णा वक्रतुण्डी नखायुधी ॥
प्रथमेऽहनि यो पिण्डस्तेन मूर्धा प्रजायते।
ग्रीवास्कन्धी द्वितीयेन दशमेन क्षुधातृषा ।।
मृतक को मार्ग में क्रूर, आपत्ति, कष्ट, स्दन, शीत और सन्तप्त आदि नामों वाले १६ भीषण पर मिलते हैं और वह ८६००० योजन चलने के बाद धर्मराज के यहाँ पहुँचता है। उस मार्ग में वह काँटे, छुरे की धार, जलते अंगार और त्रिशूलों पर, जोंकों से भरी खौलते कीचड़ में, विषैले घुये में तथा साँप, बिच्छू, गोध, बाघ, काक आदि के समूहों में होकर छटपटाता हुआ जाता है।
उस मार्ग के बीच उसको रक्त, पीब, विष्ठा और मूत्रादि से भरे अनेक लम्बे-लम्बे ताल मिलते हैं और ८०० मोल चौड़ी वह वैतरणी नदी मिलती है जो पौब, रक्त, हड्डी, मांस, मन्ना, केश, जॉक, मछली, मगर, काले साँप और बिच्छू आदि अनेक भीषण जन्तुओं से भरी है। उन जन्तुओं के मुख सुई सरीखे होते हैं नदी के ऊपर अनेक गोध, कौवे आदि मँडराया करते हैं। वहाँ न वृक्ष की छाया है, न पीने को पानी है, न खाने को अन्न है।
बारह सूर्य तपते रहते हैं और लोग छटपटाते रहते हैं। यात्री को कहीं बाप और कुत्ते नोचते हैं, तो कहाँ कौवे और गौध शरीर खोदते हैं। कहाँ अंगार और पत्थर को वर्षा होती है तो कहीं रक्त, पीब, कीचड़ और जलते पानी की (गरुडपुराणसार २)।
कण्टकैर्विध्यते क्वापि क्वचित् सर्वैर्महाविषैः।
वृश्चिकैर्दश्यते क्वापि क्वचिद्दाति चाग्निना॥
भक्ष्यते स श्वभिर्व्याधयति सन्तप्तकर्दमे।
क्वचिदंगारवृष्टिश्च विष्ठापूर्णा ह्रदाः क्वचित्॥
शतयोजनविस्तीर्णा घोरा वैतरणी नदी।
अस्थिवृन्दतटा दुर्गा मांसशोणितकर्दमा॥
अगाधा क्वथते सा च कटाहन्तर्धृतं यथा ।
काकैर्गृधैर्वज्रतुण्डैः सेविता कृष्णपन्नगैः॥
वैतरणी का पानी कढ़ाहे में रखे घी की भाँति खौलता रहता है। नदी के बिच्छू यात्री को डंक मारते हैं, काले साँप हँसते हैं, नदी के भंवर पाताल में ले जाते हैं और बाद में समदूत बाहर निकाल कर उनके नाक-कान में फन्दा डाल कर घसीटते हैं।
तब से उल्टी करते हैं, उसी को खाते हैं और विलाप करते हैं कि हाय हाय हमने न गंगा स्नान किया, न उपवास द्वारा शरीर सुखाया, न पुराणों की कथा सुनी, न ब्राह्मणों के चरण पूजे स्विय बिलखती हैं कि पिछले जन्मों के पापों के कारण अनेक कष्ट देने वाला यह नारो शरीर मिला पर हमने न तो पति को पर्याप्त सेवा की न विधवा होने पर चिता पर शरीर जलाया।
नासाग्रपाशकृष्टाश्च कर्णपाशैस्तथा परे।
वमन्तो रुधिरं वक्वात् तदेवाश्नन्ति ते पुनः॥
न पूजिता विप्रगणाः सुरापगाः श्रुतं पुराणं न सुरा न पूजिताः।
पतिव्रतं नैव कदापि पालितं वह्निप्रवेशों ने कृतो मृते पती॥
वैधव्यामासाद्य तपो न सेवितं व्रतोपवासेन विशोषिता तनुः॥
गोदान : नरक और वैतरणी के कष्ट से बचने के लिए गरुड़ पुराण में अन् मोक्ष आदि के दान का आदेश है। लिखा है कि मनुष्य जन्म से लेकर मरण तक रात में, दिन में प्रातः, सायंकाल में और पिछले जन्मों में जितने भी मानसिक, वाचिक और शरीरिक पाप किये रहता है, उन सब को यह गोदान समाप्त कर देता है।
चूँकि ब्राह्मण की दी गयी गाय वैतरणी से पार कर देती है, तार देती है, इसलिए वैतरणी कही जाती है। दान का विधान यह है कि पहले एक लम्बा गड्डा खोदो और उसे वैतरणी नदी समझ लो उसमें ईख की एक नौका बना कर डाल दी।
उस पर ताँबे के पात्र में यमराज को सोने की मूर्ति रखो। पात्र में वस्त्र बिछा हो और यमराज के हाथ में डन्डा हो। एक ऐसी काली या पटा (लालश्वेत) गाय मंगाओ जो सुलक्षणा हो, दूध देने वाली हो और बछड़े के साथ हो। गाय को माला आदि से अलंकृत करो, उसको सींगों को सोने से, खुरों को चाँदी से और शरीर को दो वस्त्रों से की।
गले में घण्टा बाँध दी और दुहने के लिए काँ की एक बाल्टी मँगा लो। काँसे के पात्र में भी भर कर तथा दान की अन्य सामग्री नाव पर रखो और नाव को पट्टसूत्र से बैंक दो गाय की पूँछ पकड़ो, ब्राह्मण को आगे करो, वैतरणी पार हो जाओ, चन्दन, पुष्प, माला आदि से ब्राह्मण को पूछे और प्रार्थना करो कि हे देव! आप साक्षात् विष्णु हैं, जगन्नाथ हैं, शरणागतवत्सल हैं और भवसागर में निमग्न दुखियों के है अतः कृपया मुझे बचा लें।
महाघीर सममार्ग में पड़ने वाली ८०० मील चौड़ी भीषण वैतरणी नदी को पार करने के लिए मैं आप को यह गाय दे रहा हूँ। इसके बाद गाय से प्रार्थना करो कि हे माता! तुम यहाँ मेरो प्रतीक्षा करना और मुझे पार कर देना। इसके बाद गाय और ब्राह्मण को प्रदक्षिणा करके सारी सामग्री एवं दक्षिणा ब्राह्मण को दे दो। ऐसा करने पर मनुष्य सुखपूर्वक धर्मराज के यहाँ पहुँच जाता है और वैतरणी उसके मार्ग में दीखती ही नहीं।
इसलिए केवल मरणकाल में ही नहीं बल्कि गंगादि तीथों में, ब्राह्मणों के घरों में सूर्य-चन्द्र ग्रहण में संक्रान्ति में, अमावास्या में दोनों अपनों के आरम्भ में, युगादि में, मन्वादि में व्यतीपात में और अन्य पुण्य कालों में इसी प्रकार ब्राह्मण को गाय देते रहो तो तुम्हें भरने पर नरक और वैतरणी का दर्शन नहीं होगा।
गौरियं तोर्यते यस्मात्तस्माद् वैतरणी स्मृता।
कृष्णां व पाटलां वापि धेनु कुर्यादलंकृताम्।
स्वर्णभृंगीं रौप्य कांस्यपात्रशेपदोहिनीम्। कृष्णवस्वयुगच्छन्नां कण्ठघण्टासमन्विताम्॥
नावमिक्षुमयीं कृत्वा पट्टसूत्रेण वेष्टयेत्।
यमं हैमं न्यसेत्तत्र लोहदण्डसमन्वितम्॥
सालंकाराणि वस्त्राणि ब्राह्मणाय प्रकल्पयेत्।
पूजां कुर्याद विधानेन तस्य पुष्पाक्षतादिभिः॥
प्रार्थयेत्त्वं जगन्नाथः शरणागतवत्सलः।
विष्णुरूप द्विजश्रेष्ठ मामुद्धर महीसुर॥
यममार्गे महाघोरे तां नदीं शतयोजनाम्।
कामोददाम्ये तुभ्यं वैतरणी नमः।
धेनुके मां प्रतीक्षस्व यमद्वारे महापथे॥
चन्द्रसूर्योपरागेषु संक्रान्ती च युगादिषु।
अन्येषु पुण्यकालेषु कुर्याद् गोदानमुत्तमम्॥
जलते सवाल :
(१) मरने के बाद भी यदि शरीर रहता है तो पिण्डदान द्वारा नया शरीर क्यों बनवाया जाता है?
(२) क्या भात के पिण्डों से नया शरीर बन सकता है?
(३) जिन जातियों, धर्मों में पिण्डदान नहीं होता उनके पितर क्या शरीरहीन रहते हैं?
(४) किस दिन के पिण्ड से शरीर का कौन सा अंग बनता है, इस विषय में गरुड़पुराण और प्रेतमंजरी आदि ग्रंथों में मतभेद क्यों है?
(५) किसी पोथी में मृतक का शरीर अंगुष्ठमात्र और किसी में हाथ भर का क्यों लिखा है?
(६) गरुड़पुराण के मत से प्रथम दिन के पिण्ड से सिर, दूसरे से कन्धा, तीसरे से हृदय और दसवें दिन के पिण्ड से भूख-प्यास बनते हैं तो हृदय और भूख-प्यास आदि से विहीन शरीर हमारी पूजा कैसे लेता है और अपना काम कैसे करता है?
(७) वह यममार्ग में कैसे चलता है और कैसे यातनाएँ भोगता है?
(८) पुराणादिकों का कथन है कि मरने के बाद भी सूक्ष्म शरीर रहता है, समाप्त नहीं होता तो क्या वह कथन झूठा है?
(९) यममार्ग में बारह सूर्य तपते हैं और अग्नि, शस्त्र, विष आदि की सर्वदा वर्षा होती रहती है तो मृतकों की खाने वाले कुत्ते, गीध, कौवे आदि वहाँ जीवित कैसे रहते हैं?
(१०) जो यमराज पापियों को मरने के बाद इतना कष्ट देते हैं वे मरने के पहले ही कष्ट देते तो संसार में सुख और शान्ति का साम्राज्य स्थापन हो जाता। कोई पाप करता ही नहीं। वे ऐसा क्यों नहीं करते?
(११) गरुड़पुराण में लिखा है कि कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं। बिना भोगे वे कोटिकल्पों में भी समाप्त नहीं होते। तो कोई भी पूजा भक्ति, कर्म कांड क्यों?
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृत कर्म शुभाशुभम्॥
तो फिर वे गंगा में नहाने यानी शरीर धो लेने से और ब्राह्मण को गाय आदि देने से कैसे समाप्त हो जाते हैं?
(१२) क्या एक गाय ८०० मौल चौड़ी खौलते पानी वाली वैतरणी को पार कर जायेगी ?
(१३) नदी में रहने वाले भीषण जन्तु उसे क्यों नहीं खायेंगे?
(१४) गोदान करने वाले को यह वैतरणी दिखाई क्यों नहीं देती?
(१५) बार-बार गोदान करने पर भी परिवर्तित न होने वाली आँखे क्या मरने पर बदल जाती हैं?
(१६) एक पुराण कहता है कि गाय वैतरणी पार कर देती है। दूसरा कहता है कि वैतरणी अदृश्य हो जाती है। हम किसकी बात मानें?
(१७) राजा सगर के पुत्र शरीर भस्म होने पर कपिलाश्रम के पास पड़े रहे और लाखों वर्ष बाद गंगा के आने पर तरे। यमदूतों ने उन्हें इतने दिनों तक वहाँ कैसे रहने दिया?
(१८) राजा त्रिशंकु अनेक यज्ञ करने के बाद भी अभी आकाश में टैंगे हैं। यमदूत उन्हें कहीं ले क्यों नहीं गये?
(१९) कोई मनुष्य सदेह स्वर्ग नहीं जा सकता तो विश्वामित्र सदृश महाज्ञानी ने त्रिशंकु को स्वर्ग पहुँचाने का प्रयास क्यों किया? क्या वे इस विधान से अनभिज्ञ थे?
V (२०) राजा दशरथ कैकेयी सहित तथा रथ और घोड़ों सहित इन्द्र की सहायता के लिए अनेक बार स्वर्ग कैसे चले गये?
(२१) सात सौ से अधिक नारियों से विवाह करने वाले तथा एक तपस्वी के घातक दशरथ को इन्द्र ने स्वर्ग में कैसे घुसने दिया?
(२२) अध्यात्मरामायण और वाल्मीकिरामायण का कथन है कि राजा दशरथ वहाँ एक बहुत बड़ी सेना लेकर गये थे।
पुरा देवासुरे युद्धे राजा दशरथः स्वयम्।
जगाम सेनया सार्धं त्वया सह शुभानने॥
तो देवों ने उन सैनिकों को स्वर्ग में क्यों घुसने दिया?
(२३) दशरथ के घोड़े आकाश में कैसे उड़ते रहे और इतनी दूर कैसे पहुँच गये?
(२४) दोनों रामायणों में लिखा है कि राजा दशरथ के रथ धुरा टूट गया या धुरे को कील टूट गयो तो दशरथ को पता नहीं लगा पर कैकेयी ने उसमें हाथ डाल कर संभाल लिया। यह कैसे संभव है?
(२५) राजा ने पहले से रथ को जाँच क्यों नहीं करायी ?
(२६) उन्हें पता क्यों नहीं लगा?
(२७) वे पत्नी को राक्षस युद्ध में क्यों ले गये?
(२८) पत्नी रथ के साथ कैसे दौड़ रही थी? उसके पैर कहाँ चलते थे?
(२९) घूरे या कौल के स्थान में हाथ कैसे काम करता रहा?
(३०) राजा धुरा, कौल, बाण आदि अतिरिक्त सामग्री साथ में क्यों नहीं ले गये?
(३१) राजा दशरथ इन्द्र से बली थे तो यज्ञों में (इन्द्राय स्वाहा क्यों करते थे?
(३२) अर्जुन कई बार इन्द्र की सभा में कैसे पहुँच गये?
(३३) उर्वशी रात को अर्जुन के पास कैसे आ गयी? इस स्वर्ग कथा में ऐसी ही अन्य अनेक शंकाएँ हैं।





