आबिद खान गुड्डू
भारतीय समाज में यही तो विचित्र स्थिति है कि किसी एक उदाहरण से पूरी जाति या समुदाय को ठीक उसी तरह का घोषित कर दिया जाता है । किसी की बीवी सिविल सर्विस में जाकर अपने सफाई कर्मचारी पति को छोड़ देती है तो इसका मतलब यह नहीं कि सब औरतें ऐसी ही होगी । आस पास नजर घुमाओगे तो पता चलेगा कि बहुत से पुरुषों की जिंदगी बहुत शानदार ढंग के कट रही है क्योंकि उनकी बीवी सरकारी नौकरी में है , बढ़िया रॉयल इनफील्ड पर सफर करते हैं और गाड़ी की ए.सी. कभी बन्द नहीं होती , चश्मा कभी उतरता नहीं , और हर साल बढ़िया अच्छी जगह घूमने भी जाते हैं जिसमें पति-पत्नी बड़े खुश नजर आते हैं । हर औरत बेवफा नहीं होती , हम उसी समाज में जी रहे हैं जहां औरत को देवी का दर्जा प्राप्त है , असल में देवी कहलाने जैसें कार्य करके दिखाएं हैं , समाज में घूमने फिरने वाले इंसान उसी औरत के पैदा किए हुए हैं , परिस्थियां हर बार एक समान नहीं रहती । परिवार को चलाने वाला मेहनती पुरुष कई बार अपने बच्चों औऱ बीवी की जिंदगी जहन्नुम बना देता हैं , तो वहीं दूसरी ओर तकरीबन पुरुष पूरी जिंदगी खुद का पेट खाली रखकर अपनी बीवी और बच्चों के लिए मेहनत करता है । घर जहां गृहिणी के बगैर खण्डर है तो वहीं एक पुरुष के बगैर औरत की जिंदगी भी खत्म है , किसी विधवा से पूछें कि उसकी जिंदगी में उसके पति की क्या अहमियत थी , तो किसी मर्द को पूछें कि उसकी बीवी के इंतकाल के बाद या उसकी बीवी के बगैर उसकी जिंदगी क्या है ? औरत प्रेम का दूसरा नाम है , तो वहीं प्रेम की परिभाषा देने के लिए मर्द का होना आवश्यक है । अपवाद होते हैं , अपवादों के बगैर जिंदगी शून्य है , समाज सन्तुलन बनाए हुए हैं ,इसे बने रहने दीजिए , किसी एक औरत या मर्द के गलत होने पर सबको गलत घोषित करने की कोशिश ना करें , यहां तक कि हमें तो यह भी हक़ नहीं है कि कौन गलत है और कौन सही , आम तौर पर जो दिखता है वैसा होता नहीं है ।





