~ कुमार चैतन्य
‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’ उपन्यास में 1890 से लेकर 1930 तक की घटनाओं का चित्रण हुआ है. इस उपन्यास की लगभग सारी प्रमुख घटनाएं जिस शहर में घटित हुईं उसका कोई नाम ही नहीं है. उस शहर को ‘डिस्ट्रक्ट ऑफ़ वाइसरायज़’ का नाम दिया गया है।

यह शहर एक दरिया के किनारे बसा हुआ है. वहां एक बंदरगाह भी है. ‘इस उपन्यास के तीन प्रमुख पात्र हैं- जो सभी अपनी ज़िंदगी के सात दशक बिताने के बाद आठवें दशक में पदार्पण कर चुके हैं.
डॉक्टर जुवेनिल उरबिनो शहर का सबसे प्रतिष्ठित डॉक्टर है. जब शहर में हैज़ा फैला, तो डॉक्टर उरबिनो ने घर-घर जाकर मरीज़ों का केवल उपचार ही नहीं किया, अपितु उसने शहर की सड़कों और नालियों की ख़ूब सफ़ाई करवाई और शहर को हैज़े से मुक्त करवाने में सफलता प्राप्त की. यह जोशीला डॉक्टर, वृद्धावस्था में अपनी पत्नी पर आश्रित है, जो उसकी एक बच्चे की भांति देखभाल करती है.
72 वर्षीय फ़रमीना डाज़ा की बादामी आंखों की खूबसूरती और उसका किसी नवयौवना जैसा नख़रा अभी भी बरक़रार है. उनका वैवाहिक जीवन सुखी और स्थिर है.
डॉक्टर उरबिनो को एक दिन यह ख़बर मिलती है कि उसके मित्र जेरेमी ने आत्महत्या कर ली है। अपने घर आकर डाक्टर अपने पालतू तोते को देखने के लिए, उसके पिंजरे के पास गया. तो पिंजरा देखकर डॉक्टर उरबिनो हैरान हो गया. नौकरानी कहीं अनजाने में पिंजरा बंद करना भूल गई थी और तोतों उड़कर आम के पेड़ पर बैठ गया. तोते को पकड़ने के लिए डॉक्टर सीढ़ी पर चढ़ा, सीढ़ी अचानक नीचे से खिसक गई और वह ज़मीन पर गिर कर मर गया।
डॉक्टर उर्बिनो की मृत्यु से सारे शहर में शोक व्याप्त हो गया। अगले दिन डॉक्टर उरबिनो की मृत देह को जब दफनाया गया, तो चर्च में लोगों का अथाह जमघट था. उस भीड़ में रिवर कंपनी का प्रधान फ़्लोरेंतिनो अरीज़ा भी शामिल था.
शाम के समय भी डॉक्टर उरबिनो के घर अफ़सोस करने वालों का आवागमन बरक़रार था. बैठक में एक दीवार के सहारे खड़े बुज़ुर्ग फ़्लोरेंतिनो अरीजा ने हमेशा की भांति काला सूट पहना हुआ था और उसकी आंखों पर मोटे शीशों वाला चश्मा था. जब वह अकेली कमरे में रह गई, तो फ़्लोरेंतिनो अरीज़ा ने अपना हैट उतार कर अपने बग़ल में रखा और फ़रमीना डाज़ा के आगे झुक कर कहा- ‘मैंने आधी सदी से भी अधिक समय तक इस अवसर की प्रतीक्षा की है. हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारे प्रति अपने प्यार की वफ़ादारी की सौगंध एक बार फ़िर दोहराना चाहता हूं” ऐसी अजीब-सी बात सुन कर फ़रमीना डाज़ा हतप्रभ हो गई । उसने गुस्से में तिलमिलाते हुए कहा – ‘दफ़ा हो जाओ मेरे घर से – अभी – इसी वक़्त और फिर जिंदगी भर अपनी सूरत मत दिखाना.’ फ़रमीना डाज़ा यह बिल्कुल नहीं जानती थी कि जो नाटक उसने अपनी जिंदगी के 19वें वर्ष में शुरू किया था, वह अब ज़िंदगी की आखिरी सांस तक चलने वाला है।
फ़रमीना डाज़ा ने 51 साल 9 महीने और 4 दिन पहले फ़्लोरेंतिनो अरीज़ा के प्यार को ठुकरा दिया था. उस दिन से लेकर आज तक वह कभी फ़्लोरेंतिनो से नहीं मिली थी. फरमीना और फ़्लोरेंतिनो की 51 साल पहले की कहानी यह है कि फ़्लोरेंतिनो ग़रीबी में पला बढ़ा था और दसवीं पास करने के बाद जब वह स्थानीय टेलिग्राफ़ दफ़्तर में घर-घर जाकर टेलिग्राम पहुंचाने वाले हरकारे के रूप में नौकरी करने लगा था , एक दिन जब वह फरमीना डाज़ा के घर टेलिग्राम देने गया तो वहां फ़रमीना डाज़ा की बादामी आंखों में एक अजीब-सी कशिश थी, जिन्हें देखते ही 19 वर्षीय फ़्लोरेंतिनो अपने होश खो बैठा था. वह दिन-रात फ़रमीना के घर के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहता. फ़रमीना की बत्तख जैसी कोमल चाल को देख कर वह मदहोश हो जाता. वह अपनी दीवानगी में उसे हर रोज़ पत्र लिखता और फ़िर उसे अपने पास ही रख लेता. वह अपनी बेपनाह मुहब्बत का इज़हार नहीं कर पाया था. अंतत: वह बीमार पड़ गया. उसकी भूख मर गई।
डॉक्टर ने निरीक्षण के बाद बताया कि यह तो प्रेम-रोग है. हैजे और प्रेम-रोग के लगभग एक समान लक्षण होते हैं. फ़्लोरेंतिनो दिल-ही-दिल में ख़ुश था कि वह मुहब्बत में शहीद हो रहा था । एक दिन अवसर पाकर वह फ़रमीना डाज़ा के घर में दाखिल हुआ और उसके हाथ में उसने अपना प्रेम-पत्र सौंप दिया. फ़रमीना ने कांपते हाथों से वह पत्र पकड़ा और कहा ‘अब तुम जाओ. मैं जब बुलाऊं, तभी मेरे घर आना.’ बस फ़िर क्या था. पत्रों का सिलसिला शुरू हो गया. दोनों तरफ़ प्यार का बुख़ार ज़ोरों पर था । दो वर्षों तक उन्हें कभी भी मिलने का अवसर नहीं मिला और वे पत्र आदान-प्रदान में ही अपने दिल की बातें करते रहे. एक पत्र में फ़्लोरेंतिनो ने फ़रमीना से विवाह की पेशकश की. फ़रमीना यह पेशकश पढ़ कर घबरा गई, परंतु उसकी बुआ एस्कोलास्टिका ने उसे मशविरा दिया, ‘उसे ‘हां’ कह दे।
इंकार करके तुम्हें उम्र भर पश्चाताप रहेगा. ‘हां’ करने के बाद तुम्हें अगर पश्चाताप होगा, तो वह तुम सहन कर लोगी.’ फ़रमीना ने 3 महीने सोचने के बाद फ़्लोरेंतिनो को एक छोटा-सा पत्र लिखा – ‘मैं तुम्हारे साथ विवाह इस शर्त पर करूंगी कि तुम मुझे कभी भी बैंगन की सब्जी खाने के लिए विवश नहीं करोगे.. फ्लोरेंतिनो अब सातवें आसमान पर था और ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था, परंतु उसकी ख़ुशी और चाव की उम्र बहुत कम निकली. एक दिन फ़रमीना के पिता ने अचानक उसका ट्रंक खोला और उसमें पत्रों का एक भारी बंडल देख कर आश्चर्यचकित हो गया. पहले उसने अपनी बेटी को समझाया और फिर धमकाया, परंतु जब वह नहीं मानी तो उसे उसके ननिहाल भेज दिया. दो वर्षों के बाद जब फ़रमीना वापस आई, तो वह बिल्कुल बदल चुकी थी और प्यार का भूत उसके सिर से उतर चुका था. वह अब 20 वर्ष की हो गई थी।
फ़्लोरेंतिनो ने एक दिन उसे बाज़ार में घूमते हुए देखा और उसे देखकर उसकी ओर बढ़ कर कुछ कहने ही वाला था कि फ़रमीना ने अपना हाथ हवा में लहरा कर हमेशा-हमेशा के लिए उसे अपनी जिंदगी से विदा कर दिया. उसने कहा ‘मैं कुछ भी सुनना नहीं चाहती. बेहतर है कि तुम सब भूल जाओ.’ दोपहर के समय उसने अपनी नौकरानी के द्वारा फ़्लोरेंतिनो को दो पंक्तियों का एक पत्र भेजा. ‘आज मैंने जब तुम्हें देखा, तो मुझे एहसास हुआ कि हमारे बीच जो कुछ भी था, वह एक भ्रम था, महज़ एक सम्मोहन था.’ फ़रमीना का पत्र पढ़कर उसके सपनों का सुनहरा महल ताश के पत्तों के समान पल में ढेर हो गया।
28 वर्षीय डॉक्टर उरबिनो बीमार फ़रमीना का उपचार करने के लिए उसके घर आया पर वह अपना दिल फ़रमीना को ही दे आया था. फ़रमीना उससे शादी करना नहीं चाहती थी. पर उसका पिता इस रिश्ते को गंवाना नहीं चाहता था।
अंतत: फ़रमीना और डॉक्टर उरबिनो की शादी हो गई. उनका एक बेटा और एक बेटी थे. बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बना और उनकी बेटी ओफीलिया 3 बच्चों की मां बनी. डॉक्टर उरबिनो और फ़रमीना का दांपत्य जीवन बहुत सुखमय था.
उधर फरमीना की शादी की ख़बर सुनते ही फ़्लोरेतिनो बहुत उदास हुआ था । उसकी भूख-प्यास मिट गई और वह हर समय रोता रहता. उसकी ऐसी हालत देखकर उसकी मां ने ‘रिवर कंपनी के मैनेजर से फ़्लोरेतिनो को अपनी कंपनी में नौकरी देने की सिफारिश की. इस कंपनी का मालिक फ़्लोरेतिनो का चाचा था सो फ़्लोरेतिनो अपने गांव पर ही रहकर ‘रीवर कंपनी’ में क्लर्क बन गया।
वह कमर्शियल पत्र भी प्रेम-पत्रों की भांति बड़े काव्यमयी ढंग से लिखता था. प्रेम-पत्र लिखने में उसने इतनी निपुणता हासिल कर ली कि उसने एक बृहत आकार वाली पुस्तक ‘लवर्स कंपेनियन’ की रचना कर डाली. वह तरक़्क़ी करता करता ‘रिवर कंपनी’ का प्रधान बन गया किंतु उसके भीतर का ख़ालीपन और प्रेम में खाई मात का दंश उसे सदैव उद्वेलित रखता।
वह अपने भीतर के इस ख़ालीपन और अवसाद को दूर करने के लिए ज़िंदगी भर अनेक महिलाओं के संपर्क में रहा. परंतु शारीरिक भूख की पूर्ति कभी उसे आत्मिक संतुष्टि प्रदान नहीं कर पाई और वह 76 वर्ष की आयु तक बेचैनी में अपने प्यार के लिए तड़पता ही रहा.
अपने प्रेम की ऐसी एकांत साधना की भनक उसने कभी फ़रमीना को नहीं होने दी, ताकि उसके वैवाहिक जीवन पर कोई आंच न आने पाए पर, 51 साल, 9 महीने और 4 दिन तक फ़रमीना के प्यार को पाने का बड़ा लंबा इंतज़ार करने के बाद उसके निवेदन को फ़रमीना ने न केवल अस्वीकार किया वरन उसको अपमानित करके घर से दुत्कार कर एक तरह से भगा दिया।
फ़्लोरेंतिनो जब फरमीना के घर से निकला, तो बहुत उदास था, परंतु वह निराश नहीं था , हार नहीं नहीं मानी। उधर फ़रमीना धीरे धीरे अपने अकेलेपन के दंश से परेशान होने लगी। उसने अपने पति के स्टड़ी-रूम में सिलाई मशीन रख ली और सिलाई-कढ़ाई कर अपना समय बिताने लगी। उसका बेटा और बेटी अपने-अपने परिवारों में सुखी थे। बाह्य स्तर पर फ़रमीना भले ही सामान्य दिखती थी, लेकिन अकेलेपन की त्रासदी से वह इतना तंग थी कि वह कभी-कभी मौत की कामना करने लगती थी.
इस बीच फ़्लोरेंतिनो ने फ़रमीना को एक पत्र भेजा. पत्र पढ़ कर फ़रमीना ने प्रत्युत्तर में एक बहुत ही कठोर पत्र भेजा पर पत्र तो फरमीना का लिखा था। फ़्लोरेंतिनो ने फ़रमीना के कठोर पत्र को भी बार-बार चूमा. उसने एक और पत्र फ़रमीना को लिखा और यह पत्र वह 12 दिनों में पूरा कर पाया. इस पत्र में न प्यार का कोई विवरण था और न ही अतीत की यादों का कोई उल्लेख. वह एक दार्शनिक स्तर का पत्र था, जिसमें उसने ज़िंदगी, मौत, अकेलेपन का दुखांत, संवादहीनता और बुढ़ापे से जुड़ी प्राकृतिक मुसीबतों के संबंध में अपने गूढ़ विचार प्रकट किए. उसने ऐसे पत्रों का सिलसिला निरंतर बनाए रखा और नित्य-प्रति एक नियम की भांति फ़रमीना को पत्र भेजता रहा. फ़रमीना ने कभी भी उसके किसी पत्र का उत्तर नहीं भेजा और अपनी कोई प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की.
डॉक्टर जुवेनिल उरबिनो की पहली बरसी के अवसर पर, यद्यपि फ़्लोरेंतिनो को बुलाया भी नहीं गया था, परंतु फ़िर भी वह स्वयं गिरजाघर में पहुंच गया। प्रार्थना के बाद फ़रमीना डाज़ा आए हुए अतिथियों का धन्यवाद करती हुई जब फ़्लोरेंतिनो के पास पहुंची, तो उसने कहा- मैं तुम्हारा हार्दिक धन्यवाद करती हूँ कि तुम्हारे पत्रों ने मुझे जीने के लिए नया उत्साह दिया है। फरमीना के ये शब्द फ़्लोरेंतिनो के कानों में बिथोविन के मीठे संगीत के समान लगे । वह बहुत खुश हुआ।
अचानक एक दिन वह हिम्मत करके फरमीना से मिलने के लिए उसके घर पहुँच गया. फ़रमीना ने कहा – जब भी तुम्हारा दिल करे तुम निःसंकोच आ सकते हो, मैं तो हमेशा अकेली ही रहती हूँ। बस फिर क्या था. फ़्लोरेंतिनो की तो बाछें खिल गई और वह फरमीना के घर आने-जाने लगा. हर मंगलवार वह फरमोना के घर शाम के 5 बजे पहुंच जाता वे इकठ्ठे बैठ कर चाय पीते , ताश खेलते, कभी मौसम की बातें करते और कभी अतीत की यादों में खो जाते।
फरमीना हर मंगलवार बड़े चाव से फ्लोरेतिनों का इंतजार करती जो उसके लिए त्योहार जैसा होता और वह पूरा दिन फुदकती रहती. फरमीना का बेटा उरविनों डाजा भी डॉक्टर था. वह अपनी मां की जिंदगी में आईं नई बदलावों को देखकर बहुत खुश था. वह फ़्लोरेंतिनो का तहेदिल से आभारी था, फ़्लोरेंतिनो डॉक्टर अरबिनों को अपने घर का ही एक सदस्य लगने लगा था. एक दिन उसने फ्लोरेतिनों को दोपहर खाने पर बुलाया और धन्यवाद करते हुये कहा – बुजुर्गों की सबसे बड़ी समस्या अकेलापन हैं. उनके पास बैठकर अगर कोई बातचीत नहीं करता तो वे अपने आपको फ़ालतू समझने लगते हैं. मैं चाहता हूं कि आप उनसे इसी प्रकार मिलते-जुलाते रहें ताकि वह सदैव प्रसन्नचित रहें।
फ्लोरोसिनो बहुत खुश था पर इस बीच उसे चोट लग गयी , दोनों का मिलना नहीं हो पा रहा था। इस दौरान जस्टिस नामक एक अखबार में फरमीना के पति के चरित्र से संबंधित कुछ दुर्भाग्यपूर्ण लेख छपे, जिन्हें पढ़कर फरमीना बहुत उदास और दुखी हुई। लेख फ़्लोरतिनों ने भी पढ़े थे और उन लेखों का उचित शब्दों में जवाब फ़्तोरीतिनो ने संपादक को भेज दिया था। दो महीनों के बाद स्वस्थ होते ही जब फ़्लोरतिनों फरमीना से मिला, वह गहरे अवसाद में थी और उसके भीतर जीवन-लालसा लुप्त हो चुकी थी । फ़्लोरेतिनों ने फरमीना की सुझाव दिया कि व आपना मन बहलाने के लिए शहर से दूर शांत और सुंदर स्थान पर रहे और ऐसी स्थिति में समुद्री यात्रा उसके लिए और भी अधिक लाभदायक सिद्ध होगी. फ़रमीना ने फ़्लोरोतिनों के सुझाव को स्वीकृति दे दी.
फ़्लोरेंतिनो और फ़रमीना के बीच बढ़ती आत्मीयता के सम्बंध में फ़रमीना की बेटी ओफीलिया ने अपनी भाभी को अपनी चिंता बताई, जिसे फ़रमीना ने भी सुन लिया. ओजीलिया कह रही थी – प्यार करना तो हमारी उम्र में भी हास्यास्पद है, परंतु इन बूढ़ों का प्यार देखकर तो वितृष्णा होती है । फरमीना अपनी बेटी के ऐसे कटु शब्द को सुनकर भड़क उठी और अपनी बेटी को फटकारते हुए बोली – ‘मुझे दुख इस बात का है कि अब मुझमें तुम्हें छड़ी से पीटने की हिम्मत नहीं रहीं, वरना तुम्हें सीधा कर देती. बेशर्मी से ऐसी बातें करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम अभी इसी समय मेरे घर से निकल जाओ और फिर मेरे जीते जी इस घर में फिर कभी कदम मत रखना.”
ओफीलिया के जाने के बाद उसने अपनी बहू से कहा- “आधी सदी पहले – ज़िंदगी ने उस बेचारे का और मेरा कचूमर निकाल दिया था, क्योंकि उस समय हमें यह समझाया गया था कि हमारी उम्र प्यार करने की नहीं है. अब भी हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार हो रहा है, क्योंकि अब हम बूढे हैं और हमारी उम्र प्यार करने योग्य नहीं रही.” अपने दिल की भड़ास बहू पर निकालते हुए फ़रमीना ने कहा- मुझे किसी की भी चिंता नहीं, विधवा होने का कम से कम एक लाभ तो अवश्य है कि उसे आदेश देने वाला, उस पर प्रतिबंध लगाने वाला कोई नहीं होता.”
जब फ्लोतिनो ने जहाज-यात्रा के लिए फरमीना से दोबारा कहा, तो उसने उत्तर दिया ‘मैं सचमुच इस घर से बाहर जाने की इच्छुक है और मैं चाहती हूं कि बस चलती ही रहूँ चलती रहूँ , चलती ही रहूँ और कभी वापस न आऊँ।
फ़्लोरेंतिनो अब जहाज कंपनी का मालिक था. उन्होंने न्यू फिडेलिटी’ नामक जहाज पर यात्रा करने का फैसला किया, जहाज में ‘राष्ट्रपति’ के लिए सुरक्षित कमरे में फ़रमीना डाज़ा रही. तीन राष्ट्रों के राष्ट्रपति इसमें यात्रा कर चुके थे. इस कमरे में आराम करने के लिए सभी साधन मौज़ूद थे. फ़्लोरेंतिनो खुद फ़र्स्ट क्लास के एक अलग केबिन में था. जब उसने इस जहाज़ में ‘प्रेजीडेंट सूएट की अत्याधुनिक ढंग से तैयारी करवाई थी, तब उसका सपना था कि वह अपनी प्रेयसी फ़रमीना के साथ इस कमरे में कभी एक रात गुज़ारे. उसका सपना हक़ीक़त बनने जा रहा था. यह यात्रा 11 दिनों की थी.
जहाज़ के कप्तान ने बड़ी गर्मजोशी के साथ अपनी कंपनी के मालिक का स्वागत किया. यात्रा के पहले दिन फ़रमीना डाज़ा अपने कमरे में अकेली ही बैठी गहरी सोच में डूबी रही. शाम के समय वह जहाज़ के ‘प्राइवेट डेक’ पर आकर बैठ गई. वह सिगरेट के धुएं के छल्ले हवा में उड़ा रही थी और साथ ही यादों के घोड़े भी दौड़ा रही थी. फ़्लोरेंतिनो ने उससे पूछा – क्या तुम अकेले ही रहना चाहती हो?”
‘अगर ऐसी बात होती, तो फ़िर मैं तुम्हारे साथ आती ही न.
फ़्लोरेंतिनो ने बड़े प्यार से फ़रमीना का हाथ पकड़ा. इस हाथ की हड्डियां कमज़ोर हो चुकी थीं और हाथ की बाहरी चमड़ी भी ढीली पड़ चुकी थीं. फ़्लोरेंतिनो ने भावातिरेक में उसके गालों को चूमना चाहा, तो फ़रमीना ने कहा ‘अभी नहीं. अभी मेरे शरीर से एक ‘बूढ़ी औरत’ की महक आ रही है.।’
फ़रमीना डाज़ा रात भर उसी स्थान पर बैठी रही और ख़ूब सोचती रही. दूसरे दिन फ़्लोरेंतिनो का अंदाज़ और अदा बिल्कुल ही बदली हुई थी. उसने काले कपड़े उतार दिए, जो उसने शोक में पहनने शुरू कर दिए थे. उसने अपने बाल आज कुछ इस ढंग से संवारे हुए थे कि उसका गंजापन नज़र न आए. उसकी आंखों में जवानी की चमक झलक रही थी. उसने गुलाबी रंग की स्कर्ट पहनी हुई थी. वे दोनों सारा दिन डैक पर बैठ कर बतियाते रहे और दिल खोल कर हंसते रहे. रात को जब फ़्लोरेतिनो उससे विदा होने लगा, तो वह फ़रमीना को चूमने के लिए आगे बढ़ा. फ़रमीना ने बड़े प्यार से पहले बायीं तरफ़ का और फ़िर दाईं तरफ़ का चुंबन दिया. फ़्लोरेंतिनो उसके होठों को चूमना चाहता था और फ़रमीना 16 वर्ष की एक अल्हड़ के समान शर्मा रही थी और नखरा भी कर रही थी. अंतत: फ़रमीना ने स्वयं ही उसे अपनी बांहों में लेकर अपना मुंह उसके मुंह पर रख दिया. उनकी यात्रा की तीसरी रात रोमांस से भरपूर थी. फ़रमीना ने कई वर्षों के बाद वाइन पी.
फ़्लोरॅतिनो ने अपनी बांह उसकी गर्दन के पीछे घुमाई. फ़रमीना के सारे शरीर पर इस उम्र में हड्डियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था. फ़्लोरेंतिनों के स्पर्श से उसके शरीर में सिहरन हुई और वह सिर-से-पांव तक गुदगुदा गई. वह सरूर में थी। दोनों ने लाइट बुझा कर एक ही पलंग पर पड़े-पड़े बातें करते रहे. वे दोनों ही इस बात पर हैरान थे कि कैसे संयोगवश वे दोनों आज इस जहाज़ के ख़ूबसूरत केबिन में एक ही पलंग पर आलिंगनबद्ध होकर पड़े हुए हैं, जबकि यह तो क़ब्र में दफ़न होने की उम्र है, परंतु भगवान का लाख लाख शुक्र है कि वे आज एक दूसरे की बांहों में समाए हुए थे.
फ़्लोरेंतिनो ने कहा ‘ ‘मैं तुम्हारी ख़ातिर अभी तक कुंवारा ही रहा । फ़रमीना इस बात पर यक़ीन नहीं कर पाई, क्योंकि इस दृष्टि से तो वह शहर में बदनाम था, परंतु जिस प्रामाणिकता से उसने ऐसा कहा था, वह उसे बहुत अच्छा लगा. फ़्लोरेंतिनो की तो वह ‘पहली सुहागरात’ थी और उधर फ़रमीना भी इस ‘दांपत्य सुख’ से पिछले 20 वर्षों से वंचित थी. आज दो चिरपिपासितों ने अपनी प्यास बुझाई और आनंद की अनुभूति प्राप्त की. इस तिलस्मी रात के बाद वे दोनों प्रेमी बहुत संतुष्ट दिखाई दे रहे थे, क्योंकि वे अब साथ-साथ थे. जिस साथ के लिए 5 दशकों से भी अधिक समय बीत चुका था.
11वें दिन उनका जहाज़ डोगडा पहुंच गया, जो इस जहाज़ का अंतिम पड़ाव था. जहाज़ के अन्य यात्री शीघ्रता से उतर गए, परंतु दोनों प्रेमी अपने केबिन में ही बैठे रहे. जहाज़ के कैप्टन ने अर्थपूर्ण दृष्टि से फ़्लोरेंतिनो की ओर देखा और समझ गया कि इनका मन यहां उतरने का नहीं है. बंदरगाह पर जहाज़ अधिक देर तक खड़ा रखना मुनासिब नहीं था. ऐसा एक ही सूरत में संभव था, अगर जहाज़ पर पीला झंडा टांग कर यह संकेत दिया जाता कि इस जहाज़ में ‘कॉलरा’ से पीड़ित यात्री हैं.
‘जहाज़ चलाओ और चलाते ही रहो.’ फ़्लोरेंतिनो ने आदेशात्मक स्वर में कहा. ‘क्या तुम सचमुच वही चाहते हो, जो तुम कह रहे हो?’ कप्तान ने पूछा. ‘मैंने जन्म से लेकर आज तक वही बात अपने मुंह से निकाली है, जिस पर मेरा भरोसा हो.
कप्तान ने अपने मालिक फ़्लोरेंतिनो की ओर देखा जिसके उत्साह और जज़्बे से यह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था कि ‘ज़िंदगी मौत से कहीं अधिक असीम है और जीने की प्रबल लालसा, मौत के ख़ौफ़ से कहीं अधिक बलवान है.’
‘आपके विचार में यह यात्रा कब तक जारी रहेगी?’ कप्तान ने पूछा. ‘हमेशा-हमेशा. यह यात्रा कहीं स्थगित नहीं होगी, बस चलते रहो.’
फ़्लोरेंतिनो के दिमाग़ में ऐसा उत्तर 53 वर्ष 7 महीने और 11 दिनों से लंबित पड़ा था।
*मेरा अभिमत :*
उपन्यास की कहानी प्यार, उम्र बढ़ने और मृत्यु के विषयों का इलाज करती है।
इस उपन्यास के संबंध में लेखक मार्खेज़ ने स्वयं अपने एक साक्षात्कार के दौरान जी मार्टिन को बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी दी कि इस उपन्यास की रचना करते समय मैं अपनी ज़िंदगी के भयानक दौर में से गुज़र रहा था।
नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद मैं कई बार यह सोच कर उदास हो जाता था कि मैं मृत्यु के निकट हूं. मेरी ऐसी सोच के पीछे ऐसा कुछ अवश्य था, जो बहुत उदास करने वाला था. मेरे अंतर्मन में बहुत कोलाहल था.
मैं अशांत था. इस उपन्यास को लिखने में व्यस्त रहना मेरे लिए एक थैरेपी सिद्ध हुआ.’ स्पष्ट है कि मार्खेज उस समय ‘गैरेंटोफोबिया’ नामक मानसिक बीमारी से ज़रूर पीड़ित था।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रंथि का शिकार आदमी बुढ़ापे से इस प्रकार डरता है, जैसे पागल कुत्ते का काटा आदमी पानी से भयभीत होता है । तुर्गनेव और फ़्लॉबेयर जैसे महान उपन्यासकार भी इसी प्रकार बुढ़ापे से भयभीत थे.
इस कहानी में नायक फ्लोरेन्तीनो अपने प्यार का 51 वर्ष से ज़्यादा इंतज़ार करता है। फ्रेंच लेखक रोलां बार्थ सच्चे प्रेमी के सम्बंध में कहते हैं कि : ‘मैं प्रेमी हूं, क्योंकि मैं ही एकमात्र व्यक्ति हूं, जो प्रतीक्षा करता है।’ यदि प्रेम एक सवाल है, तो प्रतीक्षा, उसका जवाब खोजने में मददगार कुंजी।
इसी तड़प को साहिर लुधियानवी
ने लिखा ‘हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक, खुदा करे कि कयामत हो और तू आए।’
कई प्रतीक्षाएं महज इसलिए दम तोड़ देती हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आता, समय कैसे काटा जाए? यहाँ नायक फ्लोरेन्तीनो टूटकर बिखर चुका है पर वह तय करता है कि वह अपने प्यार के प्रति वफादार रहते हुए उसके लौट आने की प्रतीक्षा करेगा।
उसके अवसाद को देखकर उसकी मां, उम्र में बड़ी एक स्त्री को उसके पास भेज देती है। उस स्त्री से मिले शारीरिक सुख के कारण फ्लोरेन्तीनो के जीवन और सोच में चमत्कारी परिवर्तन आता है। उसे महसूस होता है कि शारीरिक सुख, हृदय के दर्द को दूर करने में पेनकिलर दवाओं से भी अधिक कारगर है।
वह इन शारीरिक सुख रूपी पेनकिलर दवावों का खूब सेवन करता है और उन्हे कहीं से गलत नहीं मानता। आहिस्ता आहिस्ता वह सफल व्यक्ति बन जाता है पर विवाह नहीं करता। इस पूरे अंतराल में उसकी उम्मीद बरकरार है कि एक रोज फरमीना उसके प्यार को कबूल करेगी।
और सच में ऐसा वक्त आता है जब फरमीना उसके प्यार को क़ुबूल करती है , प्रेम-संबंध बनता है और 51 वर्ष बाद वृद्धावस्था में दोनों साथ हो जाते हैं।
चुटीली भाषा, मजाकिया लेकिन दार्शनिक अंदाज, गुदगुदाते हुए-से दृश्य इसे अविस्मरणीय किताब बना देते हैं और यही मार्खेज की जादुई कलम की ताकत है कि उपन्यास को पढ़ने के दौरान ज्यादातर पाठक फ्लोरेन्तीनो अरीसा के पक्ष में खड़े हो जाते हैं।
बेहद बारीकी से मार्खेज हमारे सामने प्रेम के अमर प्रश्नों को रख देते हैं। मार्खेज यहाँ दिखाते हैं कि शारीरिक प्रेम अलग होता है और आत्मिक प्रेम अलग। अगर उसकी आत्मा किसी एक से जुड़ी हुई है, तो वह उसी एक की प्रतीक्षा करता रहेगा ।अमृता प्रीतम ऐसे ही आत्मिक प्रेम की खूब बातें करती है।
एक दिल के भीतर कई कमरे हो सकते हैं, लेकिन पूरे दिल की मिल्कियत किसी एक के पास होती है।
महामारी को पृष्ठभूमि बनाकर बीसवीं सदी में कई महान उपन्यास रचे गए, जिनमें अल्बेयर कामू का ‘प्लेग’ और मार्खेज का ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा’ निश्चित ही विशिष्ट हैं। कामू के यहां प्लेग, जीवन के दुखों का प्रतीक है।
चूहों द्वारा फैलाया प्लेग किसी को मारे या न मारे, खुद इंसान के भीतर का दुख प्लेग बनकर उसे मार देता है। इसके उलट, मारकेज के उपन्यास में कॉलरा, प्रेम-रोग का प्रतीक है। शहर में कॉलरा फैला हुआ है, लेकिन फ्लोरेन्तीनो के भीतर एक दूसरा रोग जड़ जमाए बैठा है।
इसलिए 51 बरस, नौ महीने, चार दिन तक अपना जीवन फ्लोरेन्तीनो ने एक रोगी की तरह गुजारा? पर यहाँ तो प्रेम एक औषधि भी है? तमाम दूसरी स्त्रियों के साथ किए गए सम्बंधों ने अवसाद में डूबे फ्लोरेन्तीनो की जान बचाई।
मेरे बहुत अज़ीज़ थे प्रोफ़ेसर वारिस किरमानी साहब ( पूर्व विभागाध्यक्ष अलीगढ़ यूनी )। उम्र के सातवें दशक में जब उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी थी , वह मुझ से दूसरी शादी करने की इजाज़त माँगते रहे , मैं मना करता रहा। उन्होंने कहा मेरी उम्र बढ़ जायेगी पर मैं सहमत नहीं हुआ। उन्होंने शादी नहीं की पर जल्दी ही अलविदा कर लिया। ग़र मैंने मार्खेज का यह उपन्यास तब पढ़ा होता , उनसे कहता ज़रूर शादी करो और शायद वह लम्बे समय पर हमारे साथ होते।
ऐसा नहीं है कि मार्खेज ने इस उपन्यास में जो लिखा है वह सत्यता से परे सिर्फ़ ख़याली है। मेरे दो मित्र अपनी शादी शुदा और बच्चों वाली प्रेमिका के लिये तड़पते रहे। एक तो क़रीब तीस वर्ष बाद प्रेमिका को छोटे बच्चे की हरकतों से नाराज़ जल्दी ही पसीजती मां की तरह आत्मसमर्पण कराने में सफल हुये तो दूसरे साथी की प्रेमिका की शादी को क़रीब बीस साल हो रहे हैं , जेल भी काट आये है और जेल से लौटने के बाद क्वीन फ़िल्म की कंगना रानौत की तरह पिछले दिनों ही अकेले सुहागरात मनायी है।
सो प्यार का रोग बहुत विशिष्ट होता है , तरह तरह के दांव पेंच दिखाता है।
इस उपन्यास की पांडुलिपि जब मार्खेज ने अपनी साहित्यिक एजेंट कार्मन बैलसेल्स को भेजी तो वह दो दिन लगातार रोती ही रही. यह उपन्यास हर वर्ग के पाठकों को बहुत पसंद आया. लेखक मार्खेज के ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड’ को पढ़ कर पाठक मार्खेज का सत्कार करने लगे थे, परंतु ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’ उपन्यास को पढ़ने के बाद उसे हार्दिक प्यार करने लगे थे.
‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अपनी समीक्षा में लिखा- ‘यह अचंभित करने वाली बड़ी ही मीठी और रोचक प्रेम कहानी है.
प्रसिद्ध आलोचक और लेखक थॉमस पिकर ने उपन्यास पढ़ कर कहा – ‘मैंने अभी तक ऐसी विलक्षण प्रेम-कहानी नहीं पढ़ी. उपन्यास पढ़ते हुए ऐसे महसूस होता है कि जैसे हम नाव में बैठे प्यार की मीठी शहनाई सुन रहे हैं।’





