शशिकांत गुप्ते
कर्ज ऐसा मर्ज बन गया कि, आदमी दवाई छोड़ के विष पीने लगा।
एक ओर खैरातीलाल खैरात बांटने में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
दूसरे ओर लोन देने वाले की दुकानें हर गली मोहल्ले यहां तक कि सड़क किनारे भी सज रही है।
लोन के दुकानदार,कहते है हमसे लो,न। सस्ता लोन देंगे, कम interest लेंगे।
कर्ज देने के विज्ञापन में शून्य प्रतिशत interest का लुभावना शब्द,लालची लोगों को कर्ज प्राप्त के लिए लालायित करता है।
यहां interest का मतलब होता दिलचस्पी बढ़ना।
इसी दिलचस्पी (interest) की लालच में ब्याज की रकम दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ाती है।
सोने से घड़ाई महंगी वाली कहावत चरितार्थ होती है। लोन चुकाने में असमर्थ होने पर,ब्याज के बोझ से दबा हुआ व्यक्ति अपने स्वयं के दिल की धड़कन,को स्वयं ही हमेशा के लिए बंद करने के लिए,विषपान करता है,साथ ही अपनी अर्धांगिनी के साथ अबोध संतानों के भी हलक में गरल उड़ेलता है। गरल पीने का कारण कर्ज वसूली के लिए तैनात Boencer बाउंसर भी है।
आए दिन ऐसी खबरें दिमाग को झकझोर देती है।
एक ओर स्वयं के द्वारा स्वयं को ही परलोक ले जाने का मानसिकता रोग संक्रमित हो रहा है।
दूसरी ओर हम विश्व गुरु बनने के सपने संजो रहे हैं।
अपने कथित Stetus अवस्था को छद्म रूप से श्रृंगारित करने के लिए अपनी औकात से ज्यादा खर्च करने की प्रवृत्ति मतलब चादर के बाहर पांव पसारने की मानसिकता ही आत्म घाती है।
उपर्युक्त स्थिति आमजन की है।
देश के धन कुबेर बैकों से ऋण लेकर विदेश पलायन कर सकते हैं।
आम आदमी की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय होने के लिए विकराल रूप लेती डायन के उपाधि से विभूषित मंहगाई भी मुख्य कारण है।
इनदिनों अन्य सब्जियों के साथ टमाटर भी सुर्ख हो रहे हैं,और आमजन का सब्जियों के भाव मात्र सुनकर खून सुख रहा है।
देशवासी लुभावने जुमले सुनकर, बहुत हुई महंगाई की मार,अच्छे दिन,विकास, विश्वास,आदि के
साथ अमृतकाल को याद कर स्वयं को ठगा महसूस कर रहे हैं।
शायर जावेद अख़्तर का ये शेर एकदम प्रासंगिक है।
तख़्त की ख़्वाहिश लूट की लालच कमज़ोरों पर ज़ुल्म का शौक़
लेकिन उन का फ़रमाना है मैं इन को जज़्बात लिखूँ
आज व्यवस्था के द्वारा आमजन की भावनाओं के साथ खेल ही तो हो रहा है।
यह खेल वैसा ही जैसा बिल्ली चूहे के साथ खेलती है।
बिल्ली चूहे के पहले अपने पंजे में दबोचती है,उसे घायल करती है, छोड़ देती है,चूहा भागने की कोशिश करता है,पुनः पंजे में जकड़ती है,इस तरह चूहे के साथ कपट कर छल करती है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





