*सुसंस्कृति परिहार
आजकल चुन-चुन कर गंगा जमुनी तहजीब पर हमलों की बाढ़ आ गई। हालांकि ये दुर्भावना आज़ादी के पहले से साफ साफ़ नज़र आने लगी थी। पाकिस्तान निर्माण की शुरुआत में हमारे देश के उन दरिंदों का हाथ था जो अंग्रेजों की गोद में खेल रहे थे।जब देश का विभाजन स्वीकार किया गया तो गांधी जी की क्या हालत हुई इसे तमाम दुनिया जानती है। गांधी की यह पीड़ा अंग्रेजों के ज़रखरीद गुलाम पचा नहीं पाए और उन्होंने षड्यंत्र पूर्वक बापू की हत्या कर दी। उन्हें लगा अब देश हिंदु राष्ट्र आसानी से बन जाएगा लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री बल्लभभाई पटेल ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।बल्लभ भाई पटेल ने इनके संगठन पर रोक लगाने की सिफारिश की। मंत्रीमंडल ने इस पर रोक भी लगा दी। तत्कालीन भारत सरकार तब इन घरु आतंकवादियों के बीच भारी मुश्किलात से निपटती रही और दूसरी तरफ गंगा -जमुनी तहजीब के लिए लगातार कोशिश करती रही क्योंकि यह सनातन परम्परा थी जिससे दुनिया में भारत का मान इतिहास की विरासत था। डिस्कवरी ऑफ इंडिया नेहरू जी के गहन अध्ययन की निशानी है।
बहरहाल इस परम्परा का निर्वहन 2013 तक कांग्रेस वा अन्य दलों के प्रधानमंत्रियों ने किया।भाजपा के अटल बिहारी बाजपेयी भी इसमें शामिल रहे। गुजरात दंगे के वक्त प्रधानमंत्री की हैसियत से अटल ने गुजरात के तत्काल मुख्यमंत्री मोदीजी को फटकार लगाई थी तुमने राजधर्म का पालन नहीं किया।तब मुख्यमंत्री मोदी प्रधानमंत्री से बिना संकोच यह कह दिए मैं राजधर्म का पालन ही कर रहा था।यह एक ऐसा कड़वा सच था जो आज तक जब वे एक दशक से प्रधानमंत्री हैं स्पष्ट दिखाई दे रहा है।हाल ही में मणिपुर में कूकी के विरुद्ध मैतेई को संघ की एक सैकड़ा शाखाओं में पढ़ाई का असर देखने मिला। नफ़रत का ये ज़हर उनके अंदर इतना था कि मोदी की अन्तर्रात्मा ने उन्हें बोलने से रोका इसलिए वे सहानुभूति के दो शब्द नहीं बोल पाए।।

नफ़रत की यह दूकान मोदी काल में खूब पनपी। चारों ओर संघ की टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्यों ने कितना कहर बरपाया ये सबको याद है कैसे जे एन यू के कन्हैया कुमार और साथियों को पाकिस्तान समर्थक बताने की कोशिश की गई।जेल में डाला गया वगैरह वगैरह।आज जे एन यू कितना पिछड़ गया यह सब इन्हीं घटनाओं से हुआ है ।इससे पूर्व डा नरेन्द्र दाभोलकर,एम एम कलबुर्गी, कामरेड पानसरे और गौरी लंकेश जैसे महान व्यक्तित्व को इनकी एक टुकड़े टुकड़े गैंग ने गोलियां दागकर मार डाला ।कितने पहलू खान गौमांस की भेंट चढ़ाएं गए। इससे पहले गुजरात के 2002 दंगों में 3000 मुसलमान मारे गए उनकी महिलाओं के साथ जिस तरह घृणित और क्ररतम दुष्कृत्य हुए उसकी जीती जागती मिसाल बिल्किस बानो आज भी आजीवन जेल की सजा काट रहे अपराधियों को आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ पर अच्छे आचरण के कारण छोड़ दिए जाने पर मामला प आज भी न्याय की गुहार लगा रहा है अदालत की शरण में हैं।
आश्चर्यजनक बात यह है कि ये सिर्फ मुसलमानों से नफ़रत नहीं करते अल्पसंख्यक ईसाई भी इनके निशाने पर हैं। जो आज तक जब वे एक दशक से प्रधानमंत्री हैं स्पष्ट दिखाई दे रहा है।हाल ही में मणिपुर में कूकी के विरुद्ध मैतेई को संघ की एक सैकड़ा शाखाओं में पढ़ाई का असर देखने मिला को मिला। नफ़रत का ये ज़हर इस कदर भरा गया कि कूकी ईसाई हैं और मैतेई हिंदू। तीन माह से मणिपुर जल रहा है और पी एम बेखबर चैन की बंशी बजा रहे है।मेवात हरियाणा में हिंदू मुस्लिम भाई चारा बिगाड़ने वहां की सरकार ने जिन अपराधियों को संरक्षण देकर नूंह में बवाल किया वह भी इस सत्य की पुष्टि करता है कि जहां जहां डबल इंजन की सरकार हैं वह मोहब्बत से रह रहे लोगों के बीच अलगाव पैदा कर हिंदुवादी सोच का विस्तार कर अपनी रोटी सेकना है।
नागरिकों के मूल अधिकार हड़ताल, प्रदर्शन, सत्याग्रह के विरुद्ध भी इनकी दृष्टि अब सामने आ चुकी है। लेकिन इसके विरुद्ध एकजुटता से सीसीए आंदोलन,किसान आंदोलन बहुत दम खम से चला हालांकि फरेबी सरकार ने इनके हित में अभी तक कोई महत्वपूर्ण फैसला नहीं लिया है। टालमटोल जारी है ।
पिछले कुछ माह पूर्व की एक घटना भी इस बात का संकेत करती है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश से छीनी जा रही है ।देश का नाम अपनी मेहनत की बदौलत दुनिया में रोशन करने वाली महिला पहलवान , जो कुश्ती संघ अध्यक्ष बृजभूषण सिंह के यौन शौषण के विरुद्ध उठ खड़ी हुई थीं उनकी आवाज़ को कुचलने। दिल्ली पुलिस ने जिस तरह भारत सरकार के इशारे पर क्लीन चिट जारी की है यह बताता है कि सरकार की नफ़रत की शिकार ये महिला पहलवान भी है।
मतलब सरकार का रवैया साफ़ है जोअपराध करने वाले उसके साथ है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। राजनीति में साम दाम दण्ड भेद को चरितार्थ इस सरकार ने किया है। कांग्रेस से नफ़रत का तो दौर तो आज़ादी बाद से ही चला जो 2013 से ज़ोर पकड़ रहा है। कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना ही लोकतंत्र विरोधी है। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते।देश में विकास की बुनियाद रखने वाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के साथ उनका पूरा परिवार उन्हें रास नहीं आता। जबकि राहुल गांधी का बचपन से लेकर 55 साल तक जीवन संघर्षों से घिरा रहा उन्होंने अपनी राह खुद बनाई है।ऐसे व्यक्ति से नफ़रत जो देश को एकजुटता और मोहब्बत का पैगाम दे रहा है जो देश वासियों को कतई रास नहीं आ रहा है।
राहुल की कथित मोहब्बत की दूकान पर निरंतर नफ़रत के हमले साजिशन हो रहे हैं किंतु अब आमजन सोशल मीडिया के ज़रिए नफरतियों को पहचान गई है।आने वाला कल मोहब्बत करने वालों का होगा ।ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद।तू सलामत है सलामत रहेगी।




