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300 रुपए के लिए सीवर में उतरता है पति; दो दिन तक उससे सड़ी बदूब आती है

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बनारस

‘ये बोल रहे थे कि ड्यूटी है, जाना जरूरी है। ठेकेदार उन्हें फोन कर रहा था कि सीवर ओवरफ्लो हो गया है। पानी सड़क पर आ गया है। उस दिन उनके पास काम पर जाने के लिए भी पैसे नहीं थे। मुझसे सौ रुपया लेकर गए थे, यह कहकर कि शाम तक कुछ कमा कर लौटूंगा। शाम को फोन आया कि एक्सीडेंट हुआ है, हॉस्पिटल जल्दी आओ। हम लोग दौड़ते-भागते गए तो सामने मट्टी (लाश) रखी थी। हमको झटका लगा। ठेकेदार ने बताया कि इसे गैस लग गया है।’

ये कहानी पिंकी सुना रही हैं। जिस व्यक्ति के बारे में बता रही हैं वो उनके पति हैं। घटना सुनाने के क्रम में एक बूंद भी आंसू दिखाई नहीं देते। उनकी आंखें नम भी नहीं होतीं। एक बार तो ऐसा लगता है कि जैसे इस घटना के बारे में उन्हें किसी ने कंठस्थ करवाया हो।

मैं 27 साल की पिंकी की तरफ एक टक देख रहा हूं। वो शायद मेरे मन की बात समझ जाती हैं। कहती हैं, ‘अब रोना नहीं आता। आंखें पथरा गई हैं। दो बेटियां हैं। उनकी देखभाल करनी है। ढाई हजार रुपए कमरे का किराया है वो देना है। ऐसे में रोने बैठते तो बाकी समस्या का समाधान कौन ढूंढता।’

आज ब्लैकबोर्ड की कहानी ऐसी ही दलित बस्तियों से, जहां 45 साल से अधिक उम्र के लोग ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे।

बनारस के सबसे चहल-पहल इलाके में बसी है सिगरा दलित बस्ती। यहां रहने वाले परिवारों के मुखिया सीवर साफ करते हैं। कम उम्र में ही सीवर के भीतर घुसकर उसकी सफाई करने की वजह से ये लोग 40- 45 की उम्र तक ही जी पाते हैं। पिंकी से मिलने मैं यहां आया हूं। 2019 में पति के जाने के बाद अब सिर्फ पिंकी की मां हैं, जो बच्चों की देखभाल करती हैं।

पति की कहानी सुनाते वक्त पिंकी काफी देर तक नहीं रोईं। आंखें तक नम नहीं हुईं। जैसे ही उनकी बेटियां कमरे से बाहर गईं वो फफक पड़ीं।

मैं पिंकी के दरवाजे पर पहुंचता हूं। सिंथेटिक की पीली साड़ी में ‘सूना माथा’ लिए एक कम उम्र की महिला दरवाजा खोलती है। मुझे देख उन्हें एक बार लगा कि कोई सरकारी कर्मचारी उनकी मदद के लिए आया है। हाथ जोड़कर नमस्ते करने के बाद पिंकी ने अपने एक कमरे के घर में मुझे बिठाया।

मैंने अपना परिचय दिया। पता चला कि फिलहाल पिंकी मुआवजे के पैसे से अपना घर खर्च चला रही हैं। एक बेटी तीसरी में पढ़ती है, दूसरी के हाथ में झाड़ू थमा दिया है।

मुआवजे में कितने पैसे मिले थे?

मेरे सवाल के जवाब में वो कहती हैं, ‘3 लाख। अब मेरे पास सिर्फ छह महीने खर्च चलाने का पैसा बचा है।

मैं काम करती थी। पति की मौत पर क्षतिपूर्ति के लिए सफाई कर्मचारी की नौकरी दी गई थी। फिर ठेकेदार ने मुझे पिछले साल दिसंबर में ही निकाल दिया। आप बताएं भइया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी हमारे यहां से चुनाव लड़ते हैं और हम ही दुखी हैं।’

ठेकेदार ने क्यों निकाला काम से?

‘मैं बीमार हो गई थी। इसी का बहाना बनाकर मुझे काम से निकाला गया।’

पिंकी के मायके और ससुराल में हर व्यक्ति सफाई कर्मचारी है। उनकी मां नगर निगम के लिए सड़क पर झाड़ू लगाती हैं। उनका भाई भी सीवर सफाई का काम करता है।

वो कहती हैं, ‘हमारी बस्ती का दुर्भाग्य है यहां कोई बड़ा-बुजुर्ग मर्द नहीं है। सीवर साफ करने वाले पुरुषों के लिए 50 की उम्र यहां अधिकतम है। मेरे ससुर भी सीवर-सफाई करते थे। वो भी अपनी जवानी में ही चल बसे।’

पिंकी से मुलाकात के बाद इस काम को करने वाले कुछ युवाओं और उनके परिजनों से मैं मिलता हूं। बनारस में दुर्गाकुंड के ऐतिहासिक मंदिर के ठीक बगल की इस दलित बस्ती में नालियां बजबजा रही हैं। जहां-जहां पानी सड़क के ऊपर आ गया है, वहां बीमारी भगाने वाले सफेद चूने जैसे केमिकल का छिड़काव किया गया है।

बस्ती की सभी गलियां साफ हैं। इसमें सबसे पहला घर ही किशन का है। जब हम पहुंचे तो पता चला किशन सीवर साफ कर अभी-अभी घर आएं हैं। वहीं उनके बड़े भाई इस वक्त इसी काम को करने गए हैं।

ये किशन हैं। इन्हें दुख इस बात का है कि ऊंची जाति वाले इन्हें इंसान तक नहीं समझते। सबको लगता है कि दलित बस्ती के लोगों का काम ही हमारी गंदगी साफ करना है।

25 साल की उम्र, गुटखे से खराब हो चुके दांत और आगे के हिस्से का बाल रंगाए किशन अपने काम से खुश हैं, मगर पैसों से नहीं। कहते हैं, ‘हम लोग ठेकेदारी पर काम करते हैं। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक की ड्यूटी रहती है। एक दिन का 300 रुपया मिलता है। सीवर में घुसने के लिए कभी-कभी 400 रुपए भी मिल जाता है। वैसे तो हम लोग का एक दिन का 1000 रुपया बनता है, लेकिन ठेकेदार सारा पैसा रख लेता है हमें कम ही देता है।’

आप लोगों ने शिकायत नहीं की?

किशन कहते हैं, ‘अरे भइया, तुरंत बोरिया-बिस्तर बांध देगा। मेरा भी पेट है, कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या? ये काम बहुत रिस्क वाला है। सब कोई नहीं कर पाता। हम ही लोग है जो अपनी जिंदगी को पॉकेट में लेकर चलते हैं। अभी आप से बातें कर रहे हैं, कल ड्यूटी पर गए और शाम को लौटे ही नहीं। यही जीवन है हम लोगों का।

सीवर के बाहर खड़े लोगों को लगता है कि मजदूर आदमी है। यही काम करेगा। उन्हें बस अपने काम से मतलब है। उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि अंदर उतरने पर गैस निकलती है, आदमी छटपटा के मर सकता है। कई लोग मरे भी हैं, लेकिन हमें कोई इंसान नहीं न समझता।’

हमने किशन से अंदर उतरने और सीवर साफ करने का तरीका जानना चाहा।

किशन बातने लगे, ‘हम लोगों को ठेकेदार बुलाता है कि नाला चोक हो गया है। सड़क वाले सीवर के लिए कम से कम पांच लोगों की जरूरत पड़ती है। सबसे पहले हम लोग ढक्कन हटाते हैं। दस मिनट इंतजार करते हैं कि गैस निकल जाए। फिर कमर में रस्सी बांध कर अंदर जाते हैं। ज्यादा गहरा होता है तो संबल लेकर जाते हैं, उसके सहारे जमीन का अंदाजा लगाते हैं।

कई बार घुटने भर और कई बार कमर भर कचड़े में खड़े होकर पहले उन कचरों को बाल्टी में भर-भरकर बाहर निकालकर फेकते हैं। आप सोचो कि एक इंसान किस तरह इंसान की गंदगी मल-मूत्र और कचड़े से भरे नाले के अंदर खड़ा रहता होगा।

इसके बाद हम लोग फिर संबल से खोदकर फ्लो बनाते हैं। जब नाली के अंदर की गंदगी बहने लगती है तो कमर में बंधी रस्सी हिलाकर ऊपर खींचने का इशारा करते हैं। जो लोग बाहर खड़े हैं, वो सीवर के अंदर मौजूद मजदूर को ऊपर खींच लेते हैं।’

मैंने बीच में टोककर जानना चाहा कि क्या सीवर के अंदर उतरते वक्त आप लोगों की सुरक्षा का ख्याल नहीं रखा जाता। जैसे- सेफ्टी बेल्ट और दस्ताने आदि।

किशन का जवाब था, ‘भइया, जो ठेकेदार हमें एक हजार में केवल 300 रुपए देता है, उससे आप बेल्ट और दस्ताना क्या मांगिएगा। हां, इतना जरूर है कि गाली-गलौज करने में कोई कंजूसी नहीं करता। भर-भरके हमारे पूरे खानदान को देता है। बहुत दया आती है तो वो ज्यादा से ज्यादा हमें सीवर में उतरने के बदले 400 रुपए देता है।’

मजदूरों ने अपने परिवार के मुखिया को सीवर साफ करने की वजह से ही खो दिया है। इसके बावजूद वो रोजाना बड़ी हिम्मत के साथ इसी काम को करने निकलते हैं।

मैंने किशन से पूछा कि क्या कभी उनके सामने किसी की सीवर में उतरने की वजह से जान गई है?

किशन की आंखों में ऐसी चमक आती है जैसे हमने कोई ऐसा सवाल पूछ दिया जिसका जवाब देने के बदले उन्हें कोई इनाम मिलेगा। उनकी आंखों को देखकर मैं सोच में पड़ जाता हूं कि दो जून रोटी के लिए किस तरह इनके लिए जान की कीमत नहीं रही। इन्हें बस इसी बात की परवाह है कि काम मिल जाए ताकि परिवार भूखा न सोए।

वो बताते हैं, ‘हम पांच लोग उस दिन काम करने गए थे। बनारस चौक की बात है। ठेकेदार एक लड़के को सीवर में उतरने का 500 रुपया दे रहा था। वो लड़का पैसे की लालच में आकर सीवर में उतरने के लिए मान गया।

हम सब लोगों ने दस मिनट गैस निकलने का इंतजार किया। इसके बाद वो लड़का नीचे गया। हम सबको लगा कि काम खत्म होते ही रस्सी ऊपर खींचने का सिग्नल देगा। कुछ देर तक हमने इंतजार किया और फिर रस्सी खींचा तो देखा कि मर चुका था। उसकी लाश निकालने के बाद यह भी पता चला कि उस सीवर में पहले से एक आदमी मरा हुआ था।’

15 साल की उम्र से सप्ताह में कम से कम दो बार सीवर साफ कर रहे किशन के दो बच्चे हैं। एक कमरे के घर में वो अपने भाई के परिवार के साथ रहते हैं। कुल नौ लोगों के इस परिवार में सभी चार वयस्क, सफाई कर्मचारी हैं। नगर निगम के साथ काम करते हैं।

इस परिवार से मिलने के बाद मैं राकेश से मिलने पहुंचता हूं। वह उस वक्त सीवर साफ करने गए हैं। उनकी पत्नी सीता से मुलाकात होती है। वो सड़क पर झाड़ू लगाती हैं। सीता के चार बच्चे हैं और पति-पत्नी मिलकर महीने का 18,000 रुपए कमाते हैं।सीता के पति राकेश सीवर साफ करते हैं। वो भी लोगों के शौचालय और निजी सेप्टिक टैंक भी साफ करती हैं।

मैं सीता के पति राकेश से मिलने बनारस के दूसरे छोर मंडुवाडीह पहुंचता हूं। राकेश ने हमारी बात सुनी फिर धीरे से कहा, हमारे साथ सुपरवाइजर साहब है, अभी बात करने पर ठेकेदार को कह देंगे। आपको हम बाद में फोन कर लेंगे।

राकेश ने ही हमें पास की एक और दलित बस्ती के बारे में बताया, जहां कुछ और लोग सीवर सफाई का काम करते हैं।

हमें इस जगह को ढूंढने में बिल्कुल भी समस्या नहीं हुई। बनारस में हाल ही में बने भाभा कैंसर हॉस्पिटल के ठीक सामने सड़क के फुटपाथ पर कुछ तिरपाल तने थे। लगभग 10 परिवारों की यह बस्ती पिछले तीन साल से यहां तिरपाल डाल कर बसी हुई है।

यहां हमारी मुलाकात वीणा से हुई। 60 साल की वीणा के पति तकरीबन 20 साल पहले सीवर सफाई के दौरान ही चल बसे। वीणा सड़क पर झाड़ू लगाती हैं और उन्हें 6000 रुपए महीने के मिलते हैं। 15 दिन पहले बरसात में फिसलने से उनका हाथ टूट गया था।

वो बताती हैं, ‘हम झाड़ू लगा रहे थे तभी पानी बहुत तेज बरसने लगा। हम सोचे कि भाग कर पेड़ के नीचे छिप जाएंगे तब तक पैर फिसल गया। हाथ के बल ही गिर गए। कमर में चोट है, झुकने में दिक्कत होती है।’

मैंने पूछा, ‘अम्मा सुना है इस बस्ती के लोग ज्यादा उम्र तक जी नहीं पाते हैं?

वीणा कहती हैं, ‘कैसे जिएंगे बेटा। जिंदगी को दांव पर लगाकर कमाने जो जाते हैं। रोज भले ही सीवर के अंदर न उतरे। एक दिन तो ऐसा आता ही है जब पैसे की जरूरत जान की कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है।

मुझे से ज्यादा इस दर्द को कौन समझ सकता है। मैंने भी अपने पति को इस काम की वजह से खोया है। 43-44 उम्र रही होगी उस वक्त इनकी जब हमें छोड़कर ये गए। बेटा भी सीवर सफाई का काम करता है। उसके लिए अंदर ही अंदर डर बना रहता है। क्या कर सकती हूं। बस बाबा विश्वनाथ हम सब पर दया करें।’

जिस दिन मैं उनसे मिलने पहुंचा था, उस दिन शाम के 5 बजे तक उनका बेटा घर नहीं लौटा था।

मैंने वीणा की बहू सोनी से बात करने की कोशिश की। वो कैमरे पर आने को तैयार नहीं थीं। फिर उन्होंने खुद ही मुझसे लेकर माइक लगाया और कहने लगीं, ‘जिस दिन ये सीवर में उतरते हैं, उस दिन घर लेट से ही आते हैं। आज सुबह ठेकेदार आया था, कह रहा था कि भदैनी ( असि नदी के तट का स्थानीय इलाका) पर सीवर चोक हो गया है। वही गए हैं ये।वीणा 60 साल की हैं। इनके पति 20 साल पहले सीवर साफ करने के दौरान गुजर गए। बेटा भी यही काम करता है। उसकी चिंता रोजाना इन्हें लगी रहती है।

मैंने पूछा, रोज कब आते हैं?

‘पांच बजे तक आ जाते हैं, लेकिन आज सीवर के लिए गए हैं तो हो सकता है कि दारू पीकर कहीं सो गए हों। जिस दिन उतरते हैं उस दिन पीते ही हैं।

ऐसा कोई नियम है?

‘नहीं, नहीं। लेकिन बिना दारू पिए सीवर का काम हो ही नहीं सकता है। आपको नहीं न पता भइया, इतनी तेज गंध रहती है और अंदर से आंच निकलती है कि बिना दारू पिए एक इंसान क्या जानवर भी अंदर घुस ही नहीं सकता।’

कुछ सेकेंड चुप रहने के बाद कहती हैं, ‘जिस दिन सीवर साफ कर आते हैं, पूरी देह गंधाती (बदबू आना) है। कितना भी साबुन से नहा लो, दो दिन तक उनके पास से सड़ी बदबू आती रहती है। इस वजह से मेरा एकदम उल्टी जैसा मन हुआ रहता है, लेकिन मेरे पति हैं तो हमको साथ रहना ही है।

इतना ही नहीं। सीवर में घुसने के बाद हाथ-पैर में घाव हो जाते हैं। बीमार हो जाते हैं। डॉक्टर इन्फेक्शन बताता है। कई बार कुछ जहरीले कीड़े-मकौड़े काट लेते हैं। इन सब के बाद सप्ताह भर काम पर ये जा नहीं पाते हैं।

इसके बाद ठेकेदार धमकी देता है कि जल्दी आओ नहीं तो रजिस्ट्रेशन कैंसिल कर देंगे। हमारे दर्द को कोई नहीं समझता।’

सुनवाई न होने की यह बात बनारस की सीवर सफाई करने वाले हर व्यक्ति और उनके परिजन के जुबान पर थी। किसी ने दबी जुबान में तो किसी ने रोते हुए, यह दुख साझा किया। हमारे देश में साल 2013 में ही हाथ से मैला ढोने या मैले से जुड़े किसी भी काम को हाथ से करने को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके बावजूद सच आपके सामने है।

द हिंदू की एक रिपोर्ट बताती है कि प्रतिबंध के बावजूद देश के 766 जिलों में से सिर्फ 508 जिलों ने ही खुद को मैला ढोने से मुक्त घोषित किया है। यह आंकड़ा केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के ओर से जारी किया गया है।

एक और आंकड़ा बता दें कि पिछले 5 साल में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 339 लोगों की मौत हुई है। लोकसभा में एक सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता केंद्रीय राज्य मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि 2023 में इन घटनाओं में नौ लोगों की मौत हुई। 2022 में 66, 2021 में 58, 2020 में 22, 2019 में 117 और 2018 में 67 लोगों की मौत हुई। यानी हर साल औसतन 70 लोग सीवर की सफाई में अपनी जान गवां रहे हैं।

अब आप खुद सोचिए इनकी जिंदगी के बारे में। हमारे आसपास कई ऐसे पेशे हैं जिनमें मौत का रिस्क रहता है, लेकिन बहुत कम ऐसे पेशे हैं जहां आपकी गंदगी साफ करने के बदले उन्हें चंद पैसे, ज्यादा गाली और मौत मिलती है।

Ramswaroop Mantri

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