भोपाल। गंभीर और बड़े घपले घोटालों की जांच का जिम्मा संभालने वाली प्रदेश सरकार की दोनों प्रमुख जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू व लोकायुक्त के पास मामलों की जांच के लिए पर्याप्त संख्या में जांच अधिकारी न होने से भ्रष्टाचार के आरोपियों पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है। हालत यह है कि ईओडब्ल्यू के साथ ही लोकायुक्त में भी डीएसपी, निरीक्षक के स्वीकृत पदों से आधे अधिकारी भी पदस्थ नहीं हैं। जांच में देरी होने की वजह से ईओडब्ल्यू में लगातार मामलों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है।
अगर मौजूदा हालातों पर नजर डालें तो ईओडब्ल्यू में फिलहाल विभिन्न तरह के 4000 से अधिक मामलों की जांच लंबित हैं। इनकी जांच के लिए ईओडब्ल्यू के पास महज 230 विभिन्न स्तर के अधिकारी-कर्मचारियों का ही अमला मौजूद है, जबकि स्वीकृत पदों की संख्या 275 है। खास बात यह है कि इसमें भी जांचकर्ता अफसरों की संख्या महज 40 है। वर्तमान में प्रदेश में ईओडब्ल्यू की सात संभागीय इकाईयां हैं। यह इकाईयां भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, सागर, जबलपुर तथा रीवा में काम कर रही हैं। इनके तहत प्रदेश के सभी 52 जिले आते हैं। इसकी वजह है उन पर जांच का बोझ हमेशा बना रहता है। फिलहाल जिन मामलों की जांच लंबित हैं उनमें भ्रष्टाचार के मामलों में शामिल आय से अधिक संपत्ति, पद का दुरुपयोग, संदेहास्पद लेन-देन जैसे मामलों की संख्या वर्तमान में 3000 है। अधिकारियों की माने तो ईओडब्ल्यू में आने वाली हर शिकायत की जांच में कम से कम एक सप्ताह का समय लगता है। अगर इस हिसाब से देखा जाए, तो एक साल में एक अफसर सिर्फ 50 शिकायतों की ही जांच कर पाता है। फिलहाल ब्यूरो में अभी डीएसपी और निरीक्षक स्तर के महज 40 अफसर ही मौजूद हैं। यह अफसर अगर दर्ज हो चुकी शिकायतों की जांच करते हैं तो फिर अन्य आने वाली शिकायतों की जांच के लिए अफसर ही नहीं रह जाते हैं। सूत्रों की माने तो ब्यूरो में आने वाली शिकायतों की जिस तरह शिकायतों की हर साल संख्या बढ़ रही है, उस अनुपात में जांच के लिए कम से कम पांच सौ निरीक्षक-डीएसपी स्तर के अफसरों की जरुरत है। इसकी वजह है अपराध, शिकायतों की जांच का जिम्मा इन्हीं अफसरों पर रहता है।
इनके ऊपर पदस्थ एसपी, एआईजी, एडीजी के पास सिर्फ मामलों की निगरानी का जिम्मा होता है। इसी तरह से उप निरीक्षकों को सिर्फ जमीन पर अवैध कब्जा, भूखंड खरीदी के नाम पर धोखाधडी, अड़ीबाजी जैसे मामलों की ही जांच दी जाती है। एजेंसी में पदस्थ प्रधान आरक्षक और आरक्षक का काम समंस, वारंटों की तामीली कराने का ही रहता है।
यह है लोकायुक्त संगठन के हालात
प्रदेश में फिलहाल लोकायुक्त संगठन की सात संभागीय इकाईयां कार्यरत हैं, इनके लिए निरीक्षक स्तर के 51 पद स्वीकृत हैं, लेकिन उपलब्ध सिर्फ इससे आधे ही हैं। यही हाल डीएसपी पद के अफसरों के भी हैं। संगठन में फिलहाल डीएसपी के 32 पदों की तुलना में महज 16 अधिकारी ही पदस्थ हैं। संगठन में भ्रष्टाचार की शिकायतों के अलावा संदिग्ध लेन-देन, पद के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति तथा ट्रेप (रिश्वत) के हर साल करीब पांच सौ मामले जांच में आते हैं, लेकिन अफसरों की कमी की वजह से समय पर इनकी जांच पूरी नहीं हो पाती है। दरअसल पुलिस विभाग में अभी 260 डीएसपी के और 750 निरीक्षकों के पद रिक्त बने हुए हैं। इस वजह से लगातार मांग के बाद भी दोनों ही जांच एजेंसियों को अधिकारी ही नहीं दिए जा रहे हैं।
भोपाल इकाई के हालात बेहद खराब
ईओडब्ल्यू की भोपाल की संभागीय इकाई के हालात इस मामले में सर्वाधिक खराब है। यहां शिकायत, जांच, अपराधों की विवेचना, संदेहास्पद लेन-देन के मामलों की जांच के लिए महज दो डीएसपी और 6 निरीक्षक ही पदस्थ हैं। इस इकाई के पास अभी करीब 550 मामलों की जांच लंबित हैं। यही नहीं राजधानी होने के वजह से यहां पर सर्वाधिक मामले भी आते हैं। हालत यह है कि नए अफसर पदस्थ किए बगैर पुराने पदस्थ अफसरों का तबादला किए जाने से अब स्थानांतरित निरीक्षकों को कार्यमुक्त तक नहीं किया जा रहा है।





