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*भारत में सरहद पार की निशानियाँ*

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बी.आर.चोपड़ा, प्राण, आनंद बख्शी, रामानंद सागर, गुलजार वगैरह सब शरणार्थी ही थे। इनका संबंध पंजाब से था। ये मुंबई में पहुंचे और इन्होंने शानदार काम करके अपनी इबारत लिखी।

        ~ सुधा सिंह 

     भीष्म साहनी ने अपनी अमर रचना ‘तमस’ में देश के बंटवारे के बाद फैली नफरत का शिकार हुए ‘सुखो’ में हुये कत्लेआम की दिल-दहलाने वाली कहानी सुनाई है। सुखो रावलपिंडी के करीब एक छोटा सा कस्बा है। सुखो से बड़ी तादाद में रिफ्यूजी दिल्ली आए तो उन्होंने वेस्ट दिल्ली के जनकपुरी में सुखो खालसा हायर सेकेंडरी स्कूल खोला।

      सुखो में यूं तो सब धर्मों के लोग बंटवारे से पहले रहा करते थे। पर इनमें सिखों की तादाद सर्वाधिक थी। वे सब धनी-संपन्न थे। बिजनेस करते थे। पर बंटवारे के कारण वे सड़कों पर आ गए। फिर भी, वे पराये शहर दिल्ली में आकर अपने सुखो को भूलने के लिए तैयार नहीं थे।  सुखो उनके दिलों में बसता था।

     कुछ स्थापित होने के बाद सुखो वालों ने जनकपुरी में 1954 में स्कूल स्थापित कर दिया। इसमें अपने सुखो का नाम भी जोड़ दिया। पंजाबी केसशक्त कवि और खालसा कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. हरमीत सिंह कहते हैं कि सुखो वालों ने भूखे–पेट रहकर सुखो खालसा स्कूल स्थापित किया था।

        दरअसल राजधानी दिल्ली में आपको जगह-जगह बंटवारे की निशानियां मिलती हैं। सरहद के उस पार से आए लोगों ने यहां अपने शहर को  नामों में जिंदा रखा। आखिर जिस शहर या गांव में आपकी पुश्ते रही होती हैं, उसे आप कैसे भूल सकते हैं। वो आपका हिस्सा बना रहता है।

 बहरहाल, क्वेटा यानी पाकिस्तान के बलूचिस्तान सूबे की राजधानी। आपको साउथ दिल्ली के ईस्ट निजामउद्दीन में मिलेगा क्वेटा डीएवी स्कूल। ईस्ट और वेस्ट निजामउद्दीन, भोगल, जंगपुरा वगैरह में 1950 के दशक में बीसियों परिवार क्वेटा और बलूचिस्तान के दूसरे शहरों से आकर बसे थे।

       ये अधिकांश आर्य समाजी थे। ये नए शहर में जमने लगे तो इन्होंने इधर अपना स्कूल स्थापित किया 1956 में। नाम रखा क्वेटा डीएवी स्कूल। क्वेटा में इसी नाम से एक स्कूल पहले से चल रहा था। क्वेटा के साथ-साथ बलूचिस्तान के कुछ दूसरे शहरों जैसे ग्वादर,चमन,किला अब्दुल्ला से आए परिवारों के बच्चे भी ‘अपने’ इसी स्कूल में पढ़ते थे।

       बलूचिस्तान से इधर आकर बसे परिवारों की माली हालत में गुणात्मक सुधार हो चुका है। निजामउद्दीन के समाजसेवी शेख जिलानी भी इसी स्कूल में पढ़े हैं। वे कहते हैं कि इधर कभी किसी बच्चे के साथ धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होता।

*गुरुद्वारा रिफ्यूजी सिंह सभा :*

       हरेक दिल्ली वाले का कभी ना कभी करोल बाग से सटे देशगुप्ता रोड में आना-जाना रहता है। यहां पर आपने गुरुद्वारा रिफ्यूजी सिंह सभा को अवश्य देखा होगा। जैसे कि इसके नाम से ही साफ है कि इसका निर्माण भी शरणार्थियों ने ही करवाया था। आप गुरुद्वारा रिफ्यूजी सिंह सभा के अंदर बैंकर कुलबीर सिंह कुलबीर सिंह के साथ जाते हैं।

      उनका सारा बचपन और जवानी इसके पीछे बने एक घर में गुजरा। वे बताते हैं कि गुजरांवाला, लाहौर, मियांवाली वगैरह के सिखों और हिंदुओं ने इसे बनवाया था। ये सब करोल बाग,  अजमल खान रोड, आनंद पर्वत वगैरह में रहते थे। जब इस गुरुद्वारे का नाम रखने का प्रश्न आया तो इसके संस्थापकों जैसे हजूर सिंह, हरनाम सिंह चावला, ज्ञानी आसा सिंह वगैरह की राय थी कि इसके नाम में रिफ्यूजी शब्द आए ताकि आने वाली पीढ़ियों को इसकी पृष्ठभूमि की जानकारी मिलती रहे।

        आपक दिल्ली में सैकड़ों गुरुद्वारे मिलेंगे, पर नाम के स्तर पर देशबंधु रोड का गुरुद्वारा विशेष है। जब ये 1950 में बना तब देशबंधु रोड को ओरिजनल रोड कहा जाता था।

*कहां-कहां रावलपिंडी :*

        आपको मलकागंज मेन रोड पर एक स्कूल के बाहर लगे बोर्ड को देखकर हैरानी अवश्य होगी। स्कूल का नाम है रावलपिंडी सनातन धर्म स्कूल। दिल्ली से करीब 800 किलोमीटर दूर पाकिस्तान का शहर रावलपिंडी। वहां से आए शरणार्थियों ने इसे 1956 में स्थपित किया था।

       मतलब ये कि जो फटेहाल थे वे यहां स्कूल कॉलेज खोल रहे थे। वे समझते थे कि शिक्षा से बढ़कर जीवन में कुछ भी नहीं है। रावलपिंडी से दिल्ली यूनिवर्सिटी के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज ( एआरएसडी) का ऱिश्ता सच में बहुत आत्मीय और कहें कि भावुक करने वाला है।

       एआरएसडी कॉलेज की नींव में रावलपिंडी की मिट्टी मिलाई गई थी। ये बातें 1960 के दशक के आरंभ की हैं। इसे यहां पर रावलपिंडी की सनातन धर्म सभा से जुड़े लोगों ने स्थापित किया था। सनातन धर्म सभा रावलपिंडी में 1882 में स्थापित हो गई थी। वह वहां पर डिग्री कॉलेज, हाई स्कूल, दो मिडिल स्कूल व चार प्राइमरी स्कूल चला रही थी। देश के विभाजन के बाद सनातन धर्म सभा 1952 में दिल्ली में रजिस्टर की गई थी।

       जाहिर है,देश बंटा तो रावलपिंडी की सनातन धर्म सभा खत्म हो गई। उससे जुड़े अधिकतर लोग दिल्ली आ गए। उनके घर, कॉलेज और सब कुछ उस शहर में रह गया जिससे उनका सैकड़ों बरसों का नाता था। वे दिल्ली आकर कुछ संभले तो उन्होंने सनातन धर्म कॉलेज फिर से शुरू किया।

       ये पहले आनंद पर्वत की एक रेंट की बिल्डिंग से चला। फिर 1963-64 में धौला कुआँ शिफ़्ट हुआ था। तब धौला कुआँ लगभग जंगल था। वहां तब,बड़े आकार का गोल सा चौराहा था,जिसमें बीच की घास पर जा कर बैठा जा सकता था।

      रेलवे बोर्ड के आला अफसर रहे और एआरएसडी कॉलेज के पूर्व छात्र डॉ. रविन्द्र कुमार कहते हैं कि उनके कॉलेज की मैनेजमेंट में अब भी रावलपिंडी वालों का असर रहता है।

आपको दिल्ली में पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब के मियांवाली, बेहड़ा, मुल्तान नगर, लाहौर वगैरह के नामों पर कॉलोनियां और शो-रूम मिलेंगे। हाल ही में करप्शन के आरोप सिद्द होने पर जेल भेज दिए गए पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान मियांवाली से ही चुनाव लड़ते थे।

      आमतौर पर माना जाता रहा है कि बंटवारे के बाद सिर्फ पंजाबी शरणार्थी ही यहां अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर बिठाने के लिये आए थे। ये जानकारी सही नहीं है। तब या उसके कुछ सालों के बाद, यहां पूर्वी बंगाल ( मौजूदा बांग्लादेश) के भी शरणार्थी दिल्ली आये।

      पूर्वी बंगाल के चटगांव से सैकड़ों बुद्ध शरणार्थी दिल्ली आये। ये सब अपना सरनेम बरूआ लिखते हैं। कुछेक सरनेम तालुकदार तथा चौधरी भी हैं। ये राजधानी के अलग-अलग भागों में रहते हैं। नोएडा में भी हैं। ये अधिकतर 1947 के बाद ही दिल्ली आए, कुछ पहले से यहां थे। जो पहले यहां पर थे वे सरकारी विभागों में नौकरी करते थे। ये लगभग सब बुद्ध धर्मावलम्बी ही हैं।

      चटगांव से आए लोगों ने जब संत नगर में बुद्ध विहार का निर्माण का काम चालू किया तो यह सारा एरिया बियाबान था। लाजपत नगर और कालकाजी बसने शुरू ही हुए थे। बाकी गांव थे।

*लखनऊ में सिंध- पंजाब :*

       नफासत के शहर लखनऊ का आलमबाग। आप हमेशा गुलजार रहने वाले आलमबाग में सिंध साड़ी हाउस के बोर्ड को देखकर समझ जाते हैं कि इसका रिश्ता सिंध प्रांत से होगा। लखनऊ में आपको कई दुकानों के बाहर सिंध शब्द पढ़ने को मिलेगा। यानी सिंध जिंदा है उन लोगों की सांसों में जो वहां से आए थे।

       ये विभाजन के कारण अपने घरों- शहरों से विस्थापित हुए तो लखनऊ ने  इन्हें ससम्मान अपनाया। कौन सा पढ़ने-लिखने की दुनिया से संबंध रखने वाला लखनऊ वाला होगा जिसके दिल में हजरतगंज में दशकों तक राम आडवाणी बुक शॉप वाले राम आडवाणी के लिए आदर का भाव ना हो।

      वे बेशक लखनऊ के सबसे मशहूर सिंधी थे। उन्होंने लगभग सात दशकों तक अपनी किताबों की दुकान लखनऊ में चलाई। उनके 2017 में निधन के बाद उनकी दुकान के शटर भी गिए गए थे,पर 95 साल के आडवाणी जी के प्रति लखनऊ कृतज्ञता का भाव रखता है।

       वरिष्ठ कवि सुशील शुक्ल  कहते हैं कि लखनऊ और कानपुर में 1947 के बाद लाखों शरणार्थी आए थे। ये जल्दी ही इन दोनों शहरों की मुख्यधारा का हिस्सा बन गए। सरकार ने इनके लिए चंदन नगर, आदर्श नगर, आलमबाग और लाजपत नगर में क़ॉलोनियां विकसित कीं। इन्होंने आलमबाग को मिनी पंजाब ही बना दिया।

एक दौर में आलमबाग को लखनऊ का लाहौर भी कहा जाने लगा था। शरणार्थियों को लखनऊ में कई तरह के नए अनुभव हुए। उदाहरण के तौर पर पंजाब और सिंध से आई महिलाएं तो पर्दा करती नहीं थी। पर लखनऊ वाली महिलाएं बुर्का या साड़ी के पल्लू से सिर ढका करती थीं। हालांकि वक्त गुजरा तो दोनों ने एक-दूसरे से कुछ लिया-दिया।

      लखनऊ में भी शरणार्थियों ने नौकरी की तुलना में बिजनेस करने को प्राथमिकता दी। कहने वाले कहते हैं कि आज लखनऊ के बाजारों में 50 फीसद तक शो-रूम पंजाबी और सिंधियों के हैं। पंजाबियों की मोहन मार्केट अमीनाबाद, सदर बाजार, गुरु नानक मार्केट,चारबाग और आलमबाग में खासा असर है।

       लखनऊ  में फिल्मों कै शैदाई हजरतगंज में स्थित मेफेयर पिक्चर हॉल को नहीं भूल सकते। इसे एक सिंधी ठडानी परिवार ने शुरू किया था। यहां पर आमतौर पर अंग्रेजी फिल्में रीलिज होती थीं। लखनऊ ने पाकीजा भी इधर ही देखी थी। दिल्ली के विपरीत आमतौर पर पंजाबी और सिंधी परिवारों ने  अब हिंदी को ही अपना लिया है।

      यूपी की रणजी ट्रॉफी टीम से बरसों तक खेले अशोक बांबी Ashok Bambi  का परिवार स्यालकोट से लखनऊ में आकर बसा था। वे कहते हैं कि अब हमारी नौजवान नस्ल तो हिंदी ही बोलती है। वैसे भी जुबान तो धरती की होती है ना कि जाति या धर्म की। शरणार्थियों ने लखनऊ में आकर कई मंदिरों और गुरुद्वारों के निर्माण में खासा योगदान दिया। सिंधियों का हरि ओम मंदिर लाल बाग में है।

*मुंबई में शरणार्थी कहां-कहां :*

       मुंबई के सांता क्रूज एरिया का गुरुद्वारा धनपोठवार। यहां सुबह-शाम संगत आ-जा रही होती है सबद कीर्तन सुनने के लिए। बेशक, ये मुंबई में भारत के विभाजन का बड़ा प्रतीक है। दरअसल सरहद पार से मायानगरी में बसे सिख शरणार्थियों ने अपने शहर के नाम पर इस गुरुद्वारे का नाम रखा था।

      धन पोठवार रावलपिंडी के करीब बसा एक शहर है। देश बंटा तो पेशावर के बहुत सारे हिंदू- सिख फ्रंटियर मेल पकड़कर मुंबई आ गए। इनके पास कुछ भी नहीं था। जरा सोचिए कि पेशावर की ठंडी जलवायु से ये उमसभरी मुंबई में एक उम्मीद के साथ आए थे। मुंबई ने इन्हें आगे बढ़ने के तमाम अवसर दिए। इन्हें शुरू में मौजूदा गुरु तेग बहादुर नगर के पास कोलीवाड़ा में बसाया गया।

        ये छोटे- छोटे झुग्गीनुमा घरों में रहने लगे। शरणार्थियों के आने से पहले कोलीवाड़ा की पहचान मछुआरों की बस्ती के रूप में थी। शुरूआती दिनों में शरणार्थी ट्रेनों में घरेलू सामान बेचने से लेकर  टैक्सी ड्राइवर वगैरह का काम करने लगे थे।

        अगर बात मुंबई के शरणार्थियों की होगी तो सिंधियों को कैसे इग्नोर कर सकते हैं। मुंबई में सिंधी बंटवारे के तुरंत बाद नहीं आए थे। कारण ये था कि सिंध दिसंबर 1947 तक शांत रहा था। पर 6 जनवरी, 1947 को कराची में हुए कत्लेआम के बाद सिंध से हिंदू मुंबई आने लगे। एक सिंधी परिवार से आने वाली लेखिका साज अग्रवाल कहती हैं कि मुंबई में करीब दस लाख सिंधी कराची, हैदराबाद, लरकाना वगैरह से आकर बसे थे।

        दोनों शहरों का गहरा संबंध था। कराची और मुंबई के लोगों का बिजनेस के सिलसिले में एक-दूसरे शहरों में आना-जाना लगा रहता था। विभाजन के बाद कराची के हिंदुओं के पास समुद्री रास्ते से मुंबई आने  का बेहतर विकल्प मौजूद था। दोनों शहरों के बीच समुद्र मार्ग से 589 नाटिकल मील की ही दूरी है। मुंबई में इन्होंने रीयल एस्टेट, फिल्म और शिक्षा के क्षेत्र में शानदार उपलब्धियां दर्ज करवाई। हीरानंदानी मुंबई के सबसे बड़े बिल्डरों में से एक बने।

        जी.पी. सिप्पी और उनके पुत्र रमेश सिप्पी ने बालीवुड में झंडे गाढे। जी.पी. सिप्पी ने शोले फिल्म बनाई थी और उनके पुत्र रमेश इसके डायरेक्टर थे। जी.पी. सिप्पी कराची से मुंबई पहुंचे थे अपने परिवार को लेकर। चर्चगेट पर स्थित मशहूर के. सी. कॉलेज भी एक सिंधी परिवार ने खोला। इसका पूरा नाम किशनचंद चेलाराम क़ॉलेज है। इसे मुंबई के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों में माना जाता है।

 दरअसल, मुंबई समेत समूचे महाराष्ट्र में शरणार्थियों के लिए 31 कॉलोनियां विकसित की गईं थीं। 

     अगर बात मुंबई की करें तो अब भी सिओन कोलीवाड़ा, कुर्ला, चैंबूर,ठक्कर बापा कॉलोनी और मुलंड की मुलुंड कॉलोनी में हजारों शरणार्थी परिवार रहते हैं। बॉलीवुड को पंजाबी शरणार्थियों ने खासा समृद्ध किया।  बी.आर.चोपड़ा, प्राण, आनंद बख्शी, रामानंद सागर, गुलजार वगैरह सब शरणार्थी ही थे। इनका संबंध पंजाब से था। ये मुंबई में पहुंचे और इन्होंने शानदार काम करके अपनी इबारत लिखी।

Ramswaroop Mantri

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