राजेश चौधरी

सुप्रीम कोर्ट ने जजों को अदालती फैसलों में महिलाओं के लिए पूर्वाग्रह भरे शब्दों से परहेज करने को कहा है। इसके लिए हैंडबुक जारी की गई है। चीफ जस्टिस ने कहा है कि जेंडर स्टिरियोटाइप (घिसे-पिटे या रूढ़िवादी) शब्दों का उपयोग अदालती कार्रवाई में होता रहा है, जिन्हें पहचान कर हटाने और उनके बदले वैकल्पिक शब्दों का इस्तेमाल करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह एक प्रगतिशील पहल हुई है। वैसे सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर अपने फैसलों के जरिए भी स्टिरियोटाइप अवधारणा को खत्म करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब इस मामले में एक हैंडबुक जारी कर चीफ जस्टिस ने जजों से कहा है कि वह ऐसे शब्दों और वाक्यों से परहेज करें।
गलाम नहीं हैं महिलाएं
- ऐसे जेंडर स्टिरियोटाइप शब्दों के पीछे रूढ़िवादी सोच होती है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कई उदाहरणों के जरिए स्पष्ट किया है।
- एक रूढ़िवादी सोच है कि महिलाएं पुरुष के अधीन हैं। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि भारत का संविधान सभी जेंडर के लोगों को समान अधिकार की गारंटी देता है तो फिर महिलाओं को पुरुषों के अधीन मानने की क्या वजह हो सकती है?
- महिलाएं ही घर का सारा काम करें, यह भी एक रूढ़िवादी सोच है जिसे हैंडबुक में उजागर किया गया है।
- पति के पैरंट्स की देखभाल करना महिला की जिम्मेदारी मानना भी रूढ़िवादी विचारों की श्रेणी में आता है। यह जिम्मेदारी परिवार के सभी सदस्यों की है कि वे ओल्ड पैरंट्स की देखभाल करें।
- यह सोचना भी गलत है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले शारीरिक तौर पर कमजोर होती हैं। किसी की शारीरिक स्ट्रेंथ उसके खानपान, फिजिकल फिटनेस और जीन पर निर्भर है।
- यह भी रूढ़िवादी विचारधारा है कि हर महिला बच्चे चाहती है। यह अपनी व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर है।
- महिलाओं के कैरेक्टर के बारे में अक्सर उनके कपड़ों और उनकी सेक्शुअल हिस्ट्री से अवधारणा बनाई जाती है, जो गलत है।
- यह निहायत रूढ़िवादी सोच है कि जो महिलाएं परंपरागत कपड़े न पहनें, वे सेक्सुअल संबंध बनाने की इच्छा रखती हैं और अगर ऐसी महिला को कोई पुरुष उसकी सहमति के बगैर टच करता है तो उसमें महिला की गलती है क्योंकि उसने कथित तौर पर उत्तेजक या गैर परंपरागत कपड़े पहन रखे हैं।
- यह भी स्टिरियोटाइप सोच है कि कोई महिला शराब या सिगरेट पीती है तो वह आसपास मौजूद किसी पुरुष या पुरुषों को उसे छूने आदि के लिए इनवाइट कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस रूढ़िवादी अवधारणा को गलत बताते हुए कहा है कि अगर महिला अन्य लोगों की तरह सिगरेट या अल्कोहल का सेवन करती है तो उसके कई कारण हो सकते हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उनकी मर्जी के बिना कोई उन्हें टच करे।
सुप्रीम कोर्ट ने हैंडबुक जारी कर जजों को अदालती फैसलों में ऐसे स्टिरियोटाइप सोच वाले शब्दों के बदले वैकल्पिक शब्दों और वाक्यों के इस्तेमाल की सलाह दी है। मिसाल के तौर पर रखैल शब्द के बदले शादी से बाहर महिला का किसी और पुरुष से रोमांटिक रिश्ता जैसे शब्द इस्तेमाल करने को कहा गया है। ऐसे ही वेश्या को सेक्स वर्कर, उत्तेजक कपड़े को ड्रेस, बहकाने वाली महिला के बदले महिला, व्यभिचारिणी शब्द के बदले सिर्फ महिला, बिन ब्याही मां के बदले सिर्फ मां, परपुरुषगामिनी के बदले शादी से बाहर दूसरे पुरुष से संबंध, नाजायज औलाद के बदले वैसे बच्चे जिनके पैरंट्स की शादी न हुई हो, अफेयर के बदले शादी से बाहर के संबंध, छेड़छाड़ के बदले गलियों व सड़कों पर सेक्शुअल हरासमेंट और हाउस वाइफ के बदले होम मेकर शब्द प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
पहले के जजमेंट
सुप्रीम कोर्ट अपने जजमेंट के जरिए भी इस तरह के संदेश देता रहा है।
- केरल हाईकोर्ट में 24 साल की एक लड़की के पैरंट्स ने अर्जी दाखिल कर कहा था कि उनकी लड़की गायब है, उसे पेश किया जाए। तब केरल हाईकोर्ट ने फैसले में कहा था कि वह कमजोर लड़की खतरनाक स्थिति में है, जो कई तरह से प्रताड़ित हो सकती है। यह भी कि उसकी शादी का महत्वपूर्ण फैसला उसके पैरंट्स ही ले सकते हैं। लेकिन 2017 के हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया।
- शफीन जहां के इस बहुचर्चित केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हाईकोर्ट ने 24 साल की लड़की को कमजोर करार दिया और इस बात को नजरअंदाज किया कि लड़की बालिग है, अपने जीवन के बारे में फैसला ले सकती है। उसे संविधान इसकी इजाजत देता है।
- सुप्रीम कोर्ट बेवफाई को अपराध की श्रेणी से बाहर कर चुका है। एडल्टरी कानून (बेवफाई) को गैर संवैधानिक करार देते हुए उसने कहा था कि यह कानून महिला को एक तरह से पति का गुलाम और उसकी संपत्ति बना देता है। लेकिन शादी के बाद महिला को गुलाम या जागीर नहीं समझा जा सकता। उसकी सेक्शुअल अटॉनमी शादी के बाद भी बनी रहेगी।
- सुप्रीम कोर्ट टू फिंगर टेस्ट को भी खारिज कर चुका है। सेक्शुअल हिस्ट्री जानने के लिए टू फिंगर टेस्ट किया जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विक्टिम की गरिमा पर विपरीत असर डालता है। सेक्शुअल हिस्ट्री से रेप का कोई लेना देना नहीं है।
नहीं रही मजबूरी
साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे तमाम फैसलों के जरिए रूढ़िवादी सोच और रवैये को खारिज करता रहा है। फिर भी, उसका ताजा कदम विशेष अहमियत रखता है। अदालती फैसलों में वेश्या या रखैल जैसे शब्दों से असहजता महसूस होती रही है, लेकिन अब तक उसे मजबूरी के रूप में स्वीकार किया जाता था। अब हैंडबुक जारी कर इन शब्दों का विकल्प दे दिया गया है, जिसके बाद इन शब्दों के प्रयोग पर पूरी तरह रोक लगने की उम्मीद की जा सकती है।





